पूनम शर्मा
तीन तरफा संकट: केरल, असम और गठबंधन
2026 के चुनावी चक्र में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक “चक्रव्यूह” में फंसी नजर आ रही है। पार्टी केवल भाजपा जैसे बाहरी प्रतिद्वंद्वियों से ही नहीं लड़ रही, बल्कि अपने अस्तित्व के संकट से भी जूझ रही है। केरल और असम के हालिया घटनाक्रम और इंडिया गठबंधन में मची खींचतान यह संकेत दे रही है कि राहुल गांधी के नेतृत्व पर अब उनके अपने ही सवाल उठा रहे हैं।
1. केरल में मणिशंकर अय्यर का ‘बम’
गांधी परिवार के करीबी रहे मणिशंकर अय्यर ने केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की तारीफ करके कांग्रेस की चुनावी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि विजयन ही राजीव गांधी के पंचायती राज के सपने को पूरा कर रहे हैं। इस बयान ने कांग्रेस के आधिकारिक स्टैंड (UDF की जीत) को कमजोर कर दिया है। जब पवन खेड़ा ने पार्टी का बचाव करना चाहा, तो अय्यर ने उन्हें “कठपुतली” कहकर खारिज कर दिया, जो पार्टी के पुराने और नए नेताओं के बीच की गहरी खाई को दर्शाता है।
2. असम में भगदड़: भूपेन बोरा का इस्तीफा
असम में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा का 16 फरवरी 2026 को इस्तीफा देना कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका है। 32 साल तक पार्टी की सेवा करने वाले नेता का चुनाव से ठीक पहले यह कहना कि “पार्टी में तानाशाही और पक्षपात चल रहा है,” राहुल गांधी की टीम की विफलता को दर्शाता है। इससे यह संदेश जा रहा है कि जमीनी नेताओं की आवाज दिल्ली के गलियारों में नहीं सुनी जा रही।
3. टीएमसी की चुनौती: ममता बनाम राहुल
इंडिया गठबंधन के अंदर भी राहुल गांधी की स्वीकार्यता कम होती दिख रही है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने स्पष्ट कर दिया है कि वे राहुल गांधी को एक “नकारा” नेता के रूप में देखते हैं जो भाजपा का मुकाबला करने में सक्षम नहीं हैं। ममता बनर्जी को गठबंधन का चेहरा बनाने की मांग असल में राहुल गांधी के नेतृत्व को दरकिनार करने की एक सोची-समझी रणनीति है।
निष्कर्ष
राहुल गांधी आज एक ऐसे मोड़ पर हैं जहाँ उन्हें “भारत जोड़ो” के नारों से आगे बढ़कर “पार्टी जोड़ो” पर ध्यान देना होगा। यदि केरल और असम जैसे राज्यों में आंतरिक कलह शांत नहीं हुई, तो 2026 के चुनावों में कांग्रेस की स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।