ममता बनर्जी और ‘इंडिया’ गठबंधन

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!

पूनम शर्मा
भारतीय राजनीति में कुछ विचार समय की धूल फांकते रहते हैं, तो कुछ अचानक ज्वालामुखी की तरह फूटते हैं।। — “एक ऐसा विचार, जिसका समय आ गया है।” यह विचार है ममता बनर्जी को विपक्षी ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन की कमान सौंपना।

यह माँग  ऐसे समय में उठी है जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की दहलीज पर खड़ा है। राज्य की राजनीति में ‘दीदी’ की साख दांव पर है, लेकिन दिल्ली के गलियारों में उनकी भूमिका को लेकर छिड़ी यह बहस महज चुनावी पैंतरा नहीं, बल्कि विपक्ष के भीतर मची गहरी छटपटाहट का संकेत है।

 राहुल-खड़गे मॉडल बनाम ममता मॉडल

सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह के सफल मॉडल को राहुल गांधी-मल्लिकार्जुन खड़गे की जोड़ी के जरिए दोहराने की कोशिशें राष्ट्रीय स्तर पर वह परिणाम नहीं दे पाईं, जिसकी विपक्ष को उम्मीद थी।

ऐतिहासिक संदर्भ: बंगाल का राष्ट्रीय प्रभाव

भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि बंगाल ने हमेशा देश को नई दिशा दी है। “जो बंगाल आज सोचता है, भारत कल सोचता है” की कहावत को चरितार्थ करने की कोशिश में TMC लंबे समय से ममता को दिल्ली की गद्दी के दावेदार के रूप में देखती आई है।

1998 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी राह चुनने वाली ममता बनर्जी का सफर संघर्षों की दास्तां है। सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलनों से वामपंथ के 34 साल के किले को ढहाने वाली ममता ने बार-बार साबित किया है कि वह चुनावी राजनीति की सबसे कुशल खिलाड़ियों में से एक हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में भी जब गठबंधन की सुगबुगाहट शुरू हुई थी, तब ममता के नाम पर काफी शोर मचा था, लेकिन कांग्रेस के साथ सीटों के तालमेल और नेतृत्व की महत्वाकांक्षाओं ने उस समय इस विचार को ठंडे बस्ते में डाल दिया था।

चुनौतियां और कांग्रेस का रुख

हालांकि, यह राह कांटों भरी है। एक तरफ जहां मणिशंकर अय्यर जैसे नेता एम.के. स्टालिन को गठबंधन को जोड़ने वाला “सबसे उपयुक्त व्यक्ति” बता रहे हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी अभी भी राहुल गांधी के इर्द-गिर्द अपनी बिसात बिछाए हुए है। कांग्रेस के लिए अपनी अग्रणी भूमिका छोड़ना आसान नहीं होगा, विशेषकर उन राज्यों में जहां वह मुख्य विपक्षी दल है।

इसके अलावा, पश्चिम बंगाल में भाजपा ने ‘संदेशखाली’ और ‘आरजी कर मेडिकल कॉलेज’ जैसे मुद्दों को उठाकर ममता सरकार की घेराबंदी तेज कर दी है। गृह मंत्री अमित शाह की हालिया रैलियों और ईडी (ED) की सक्रियता ने बंगाल के चुनावी समर को “करो या मरो” की स्थिति में ला खड़ा किया है।

क्या दिल्ली दूर है

सवाल यह है कि क्या विपक्षी दल अपने व्यक्तिगत अहम को त्यागकर एक ऐसी महिला के पीछे खड़े होंगे जिसने बार-बार मोदी-शाह की जोड़ी को अपने गढ़ में चुनौती दी है?

अगर ममता बनर्जी को वाकई ‘इंडिया’ गठबंधन का चेहरा बनाया जाता है, तो यह भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत होगा—एक ऐसा बदलाव जहां क्षेत्रीय अस्मिता और महिला नेतृत्व राष्ट्रीय राजनीति के नए ध्रुव बनेंगे। फिलहाल, बंगाल की जनता का फैसला और विपक्षी दलों की आंतरिक सहमति ही यह तय करेगी ।

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!
Leave A Reply

Your email address will not be published.