पूनम शर्मा
भारतीय राजनीति में चुनावी नतीजों का मिजाज अक्सर हैरान करने वाला होता है। अभी हाल ही में हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार जैसे राज्यों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ‘विजय रथ’ ने जिस तरह से अपनी रफ्तार दिखाई, उसे देखकर लग रहा था कि तेलंगाना में भी कुछ वैसा ही चमत्कार होगा। लेकिन, तेलंगाना के मिनी म्यूनिसिपल और कॉर्पोरेशन चुनावों के जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, उन्होंने पूरे देश के राजनीतिक विश्लेषकों को उलझा कर रख दिया है। एक तरफ जहाँ करीमनगर और निजामाबाद से भाजपा के लिए जश्न की खबरें हैं, वहीं राज्य के समग्र आंकड़ों ने पार्टी के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।
ओवैसी के गढ़ में सेंध और करीमनगर का ‘ऐतिहासिक’ कमल
तेलंगाना की राजनीति में कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जिन्हें अभेद्य किला माना जाता है। करीमनगर और निजामाबाद जैसे इलाकों में भाजपा ने इस बार जो किया, उसे ‘चमत्कार’ से कम नहीं कहा जा सकता। करीमनगर में भाजपा की जीत ऐतिहासिक है क्योंकि यह पहली बार है जब पार्टी वहां निगम का नेतृत्व करने जा रही है। 66 सीटों में से कांग्रेस को 14 और बीआरएस को महज 9 पर समेटते हुए भाजपा ने अपनी धाक जमाई है। यह सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केंद्रीय गृह राज्य मंत्री बंदी संजय का क्षेत्र है, जिनका योगदान तेलंगाना में भाजपा को खड़ा करने में अतुलनीय रहा है।
इसी तरह निजामाबाद और आदिलाबाद में भी भाजपा ने कांग्रेस और ओवैसी की पार्टी (AIMIM) को कड़ी टक्कर देते हुए बढ़त बनाई है। यह उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो मानते थे कि तुष्टिकरण की राजनीति के सामने कमल नहीं खिल सकता।
आंकड़ों का मायाजाल: प्रचंड जीत या करारी हार?
खबरों की दुनिया में दो खिड़कियां दिख रही हैं—एक तरफ लिखा है “भाजपा को झटका” और दूसरी तरफ “भाजपा का चौंकाने वाला प्रदर्शन”। सच क्या है? जब हम 2800 से अधिक वार्डों के नतीजों को देखते हैं, तो तस्वीर थोड़ी धुंधली हो जाती है। शाम 7:30 बजे तक के आंकड़ों के अनुसार, कांग्रेस ने 1500 से अधिक सीटों पर कब्जा जमाया है, जबकि बीआरएस 700+ पर है। वहीं भाजपा महज 285 सीटों के आसपास सिमटती दिख रही है।
जहाँ लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा ने 17 में से 8 सीटें जीतकर कांग्रेस की बराबरी की थी, वहां स्थानीय चुनावों में तीसरे नंबर पर खिसक जाना किसी बड़े झटके से कम नहीं है। बीआरएस, जो लोकसभा में शून्य पर थी, वह भी स्थानीय चुनावों में भाजपा से काफी आगे नजर आ रही है। यह स्थिति बताती है कि ज़मीनी स्तर पर संगठन और नेतृत्व में कहीं न कहीं कोई बड़ी चूक हुई है
भविष्य का सबक: गुजरात जैसा उदय या झारखंड जैसी गिरावट?
भाजपा के लिए तेलंगाना हमेशा से एक उम्मीद की किरण रहा है। याद कीजिए 1984 का वह दौर जब पूरे देश में भाजपा को सिर्फ दो सीटें मिली थीं—एक गुजरात के मेहसाणा से और दूसरी तेलंगाना (तब आंध्र प्रदेश) के हनमकोंडा से। आज गुजरात भाजपा का अभेद्य किला है, लेकिन तेलंगाना में पार्टी अभी भी संघर्ष कर रही है। झारखंड में रघुवर दास को हटाने के बाद जो हश्र हुआ, क्या वही कहानी तेलंगाना में बंदी संजय को किनारे करने के बाद दोहराई जा रही है?
यह नतीजे भाजपा नेतृत्व के लिए आत्ममंथन का विषय हैं। केवल कुछ शहरों में ‘प्रचंड जीत’ से पूरे राज्य का मिजाज नहीं बदला जा सकता। अगर पार्टी को दक्षिण भारत के इस द्वार को पूरी तरह खोलना है, तो उसे अपनी रणनीतियों और स्थानीय नेतृत्व पर फिर से विचार करना होगा। यह चुनाव ‘खतरे की घंटी’ भी है और ‘सुधार का अवसर’