पूनम शर्मा
बांग्लादेश के हालिया चुनाव परिणामों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। ऐसे नेताओं की जीत, जिन पर पहले आतंकवाद और युद्ध अपराधों के गंभीर आरोप लगे थे, भारत के लिए चिंता का विषय है। यह बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि रणनीतिक दिशा में संभावित परिवर्तन का संकेत है।
1. कट्टरपंथी राजनीति और भारत की सुरक्षा
भारत और बांग्लादेश की सीमा 4,000 किलोमीटर से अधिक लंबी है। ऐसे में ढाका की राजनीतिक दिशा सीधे तौर पर नई दिल्ली की सुरक्षा को प्रभावित करती है
यदि संसद में भारत-विरोधी विचारधारा वाले नेताओं का प्रभाव बढ़ता है, तो पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा चुनौतियां फिर से उभर सकती हैं। विकास और दुश्मनी साथ-साथ नहीं चल सकते। यदि राजनीतिक विमर्श में भारत-विरोध एक साधन बनता है, तो द्विपक्षीय संबंधों पर सीधा असर पड़ेगा।
2. पाकिस्तान का प्रभाव और क्षेत्रीय समीकरण
दक्षिण एशिया की राजनीति में पाकिस्तान की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अतीत में पाकिस्तान की “डीप स्टेट” पर आरोप लगते रहे हैं कि वह बांग्लादेश में भारत-विरोधी तत्वों को प्रोत्साहित करती रही है।
यदि नई सरकार में कट्टरपंथी ताकतें प्रभावशाली रहती हैं, तो इस तरह के बाहरी प्रभावों के लिए जमीन तैयार हो सकती है। भारत पहले से पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर दबाव झेल रहा है। ऐसे में पूर्वी सीमा पर अस्थिरता रणनीतिक चुनौती को कई गुना बढ़ा देगी । एक अस्थिर या शत्रुतापूर्ण पड़ोस भारत की आर्थिक और सैन्य रणनीति पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है।
3. भारत की नीति में संतुलन और सख्ती
भारत ने बांग्लादेश में बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, और कनेक्टिविटी परियोजनाओं में भारी निवेश किया है। व्यापारिक संबंध भी तेजी से बढ़े हैं। लेकिन अब समय है कि नई दिल्ली अपनी नीति का पुनर्मूल्यांकन करे। बिना शर्त आर्थिक सहयोग जारी रखना क्या उचित होगा, यदि राजनीतिक वातावरण भारत के प्रति कठोर रुख अपनाए? सहयोग पूरी तरह रोकना समाधान नहीं, लेकिन शर्तों के साथ जुड़ा हुआ सहयोग आवश्यक हो सकता है। सुरक्षा आश्वासन, आतंकवाद-रोधी प्रतिबद्धता और पारदर्शिता को प्राथमिकता देनी होगी। भारत को केवल सरकार से नहीं, बल्कि बांग्लादेश के नागरिक समाज, उद्योग और युवाओं से भी संबंध मजबूत करने होंगे।
कट्टरपंथियों की जीत शुभ संकेत नहीं है। यदि यह रुझान स्थायी बनता है, तो भारत को अपनी बांग्लादेश नीति अधिक सतर्क, संतुलित और रणनीतिक बनानी होगी। दक्षिण एशिया में स्थिरता भारत के लिए विकल्प नहीं, आवश्यकता है। और जब पड़ोस बदलता है, तो नीति भी बदलनी पड़ती है।