समग्र समाचार सेवा
असम,गुवाहाटी 12 फरवरी:असम के गुवाहाटी में स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने भूजल से 99 प्रतिशत आर्सेनिक को प्रभावी रूप से हटाने में सक्षम एक कम लागत वाली प्रणाली विकसित की है, जो विशेष रूप से आर्सेनिक-प्रभावित क्षेत्रों के लिए एक सस्ता और व्यवहारिक समाधान साबित हो सकती है।
भूजल में आर्सेनिक की उपस्थिति वैश्विक स्तर पर एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है। यह जहरीला तत्व प्राकृतिक रूप से चट्टानों से या खनन और कृषि जैसी मानवीय गतिविधियों के कारण जल में प्रवेश करता है। लंबे समय तक आर्सेनिक के संपर्क में रहने से अंगों को क्षति, कैंसर और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती हैं।
शोध में उपयोग की गई तकनीक इलेक्ट्रोकोएग्युलेशन (EC) पर आधारित है। इसमें पानी में डाले गए लोहे के इलेक्ट्रोड्स से विद्युत धारा के माध्यम से धातु आयन उत्पन्न होते हैं, जो आर्सेनिक और अन्य संदूषकों से चिपककर बड़े क्लस्टर बनाते हैं। इन क्लस्टरों को पानी से अलग किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में बाहरी रसायन जोड़ने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे यह संचालन में सरल और लागत-प्रभावी बनता है।
परंपरागत इलेक्ट्रोकोएग्युलेशन तकनीकों में स्थापित इलेक्ट्रोड्स की वजह से प्रक्रिया धीमी और कम प्रभावी हो सकती है। IIT टीम ने इस समस्या का समाधान करने के लिए एक घूमने वाला एनोड और स्थिर कैथोड वाला डिजाइन तैयार किया है। घूमते इलेक्ट्रोड बेहतर मिश्रण और आयन उत्पादन सुनिश्चित करते हैं, जिससे आर्सेनिक बांधने की क्षमता बढ़ती है। साथ ही इस प्रक्रिया में उत्पन्न सूक्ष्म गैस के बुलबुले हटा दिए गए संदूषकों को सतह तक उठाकर अलग करना आसान बनाते हैं।
शोध के प्रमुख, प्रोफेसर मिहिर पुरकैत का कहना है कि यह प्रणाली कुछ ही मिनटों में दूषित पानी से आर्सेनिक हटाने में सक्षम है और इसे चलाने के लिए महंगी मशीनरी या जटिल रसायनों की आवश्यकता नहीं है।
लागत के संदर्भ में यह प्रणाली परंपरागत प्रणालियों की तुलना में बहुत सस्ती है। छोटे समुदाय स्तर पर (10-50 किलोलिटर प्रतिदिन) प्रणाली की लागत लगभग ₹8-15 लाख जबकि पारंपरिक प्रणालियाँ ₹12-20 लाख तक होती हैं। मध्य-स्तर क्षमता (100-500 किलोलिटर प्रतिदिन) पर लागत ₹30-80 लाख के बीच है, जबकि RO-आधारित प्रणालियाँ ₹1-2 करोड़ से अधिक में आती हैं।
टीम अब वास्तविक भूजल स्थितियों में इस तकनीक का परीक्षण करना चाहती है और अन्य संदूषकों जैसे फ्लोराइड और लोहा के साथ उसकी दीर्घकालिक क्षमता का मूल्यांकन करेगी। इसके साथ ही असम के काकाटी इंजीनियरिंग प्रा. लिमिटेड के साथ निर्माण और संस्थापन के लिए बातचीत चल रही है, जिससे आगे इसे व्यावसायिक रूप से लागू करने का मार्ग तैयार हो सके।