गोगोई दंपती पर देशद्रोह के आरोप: गिरफ्तारी होगी या सियासत चलेगी?

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पूनम शर्मा
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी पर पाकिस्तान से कथित संबंधों के आरोपों ने राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा—दोनों मोर्चों पर भूचाल ला दिया है। ऐसे आरोप किसी आम राजनीतिक बयान से कहीं आगे जाते हैं। जब देश की संवैधानिक व्यवस्था में बैठे किसी मुख्यमंत्री की ओर से “राष्ट्रीय सुरक्षा” जैसा गंभीर शब्द इस्तेमाल होता है, तो स्वाभाविक है कि जनता सवाल पूछेगी—क्या अब गिरफ्तारी होगी? अगर नहीं होगी, तो क्यों?

इस बहस का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि समानता का सिद्धांत क्या वाकई लागू होता है। पिछले साल यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा की गिरफ्तारी का उदाहरण लोगों के जेहन  में ताज़ा है। उन पर पाकिस्तान को संवेदनशील जानकारी देने का आरोप लगा और राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के तहत कार्रवाई हुई। ऐसे में आम नागरिक पूछ रहा है—अगर कानून सबके लिए बराबर है, तो फिर एक सांसद और उसकी पत्नी पर लगे आरोपों पर वही पैमाना क्यों नहीं?

लेकिन कानून का रास्ता भावनाओं से नहीं चलता, सबूतों से चलता है। किसी पर सार्वजनिक मंच से आरोप लगना और किसी को कानूनी तौर पर दोषी ठहराना—ये दो अलग बातें हैं। गिरफ्तारी से पहले जाँच  एजेंसियों को ठोस साक्ष्य चाहिए। सिर्फ राजनीतिक आरोपों या प्रेस कॉन्फ्रेंस के आधार पर किसी सांसद को हिरासत में लेना न तो कानूनी तौर पर आसान है, न ही लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप। संसद सदस्य होने के कारण कुछ संवैधानिक प्रक्रियाएं भी लागू होती हैं—हालांकि यह भी सच है कि अगर सबूत पुख्ता हों, तो कानून किसी पद या रसूख को नहीं देखता।

इस पूरे विवाद में एक और परत है—राजनीतिक समय। चुनावी माहौल में इस तरह के आरोपों का आना अपने आप में संदेश देता है। समर्थक इसे “राष्ट्रहित में सच सामने लाना” कह रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे “चुनावी रणनीति” बता रहा है। सवाल यह नहीं कि आरोप क्यों लगे, सवाल यह है कि इसके बाद क्या हुआ—या क्या होना चाहिए था। अगर जांच एजेंसियां सक्रिय हैं, तो जनता को भरोसा दिलाने के लिए पारदर्शी प्रक्रिया और समयबद्ध कार्रवाई जरूरी है। खामोशी संदेह को जन्म देती है।

केंद्र और राज्य के रिश्तों का संदर्भ भी अहम है। मुख्यमंत्री की पार्टी केंद्र में सत्ता में है और गृह मंत्रालय सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों से जुड़ा है। ऐसे में लोग मानते हैं कि अगर वाकई गंभीर तथ्य मौजूद हैं, तो कार्रवाई में देरी क्यों? दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का पहलू भी इस बहस को और जटिल बनाता है। भारत-बांग्लादेश संबंध, क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन और वैश्विक राजनीति—इन सबके बीच किसी भी बड़े कदम का असर सीमाओं से परे जा सकता है। सरकारें अक्सर ऐसे मामलों में बहुत नपी-तुली चाल चलती हैं, ताकि आंतरिक सुरक्षा के साथ-साथ विदेश नीति पर अनचाहा दबाव न पड़े।

यह भी सच है कि “देशद्रोह” या “राष्ट्रीय सुरक्षा” जैसे शब्दों का इस्तेमाल राजनीति में बेहद संवेदनशील हथियार बन चुका है। अगर आरोप सच साबित होते हैं, तो दोषियों पर कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए—यह लोकतंत्र की मजबूती का संकेत होगा। लेकिन अगर आरोप बेबुनियाद निकलते हैं, तो यह राजनीतिक नैतिकता पर बड़ा सवाल खड़ा करेगा। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर लगा दाग अदालत में बरी होने के बाद भी पूरी तरह नहीं धुलता।

अंततः जनता की अपेक्षा सीधी है—न दोहरा मापदंड, न राजनीतिक संरक्षण। या तो ठोस सबूतों के साथ कानूनी कार्रवाई हो, या फिर जांच की स्थि

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