पूनम शर्मा
अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों से चला आ रहा तनाव एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गया है। ओमान की राजधानी मस्कट में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर नई वार्ता शुरू हुई है। यह बातचीत ऐसे समय में हो रही है जब डोनाल्ड ट्रंप खुले तौर पर सैन्य कार्रवाई और “रेजिम चेंज” जैसी धमकियां दे चुके हैं। दूसरी ओर, ईरान के भीतर हाल के महीनों में व्यापक जनप्रदर्शन हुए हैं, जिन्हें सरकारी बलों ने कठोरता से दबाया है।
कूटनीति बनाम सैन्य धमकी: दोहरी अमेरिकी नीति
विशेषज्ञ इस स्थिति को “विरोधाभासी” मानते हैं। एक ओर अमेरिका बातचीत की पहल करता है, दूसरी ओर युद्ध की धमकी देता है। प्रोफेसर अरंग केशावरज़ियन के अनुसार, यह रणनीति ईरान की राजनीति को और जटिल बनाती है। सैन्य धमकियां ईरान के भीतर कठोर रुख रखने वाले तत्वों को मजबूत करती हैं और सुधार की संभावना को कमजोर करती हैं। बातचीत का उद्देश्य अगर केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित रहेगा, तो ईरान के आंतरिक संकट और जनाकांक्षाओं की अनदेखी होती रहेगी।
ईरान के भीतर जनआंदोलन और दमन
ईरान में हालिया आंदोलन महंगाई, बेरोज़गारी, राजनीतिक दमन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मुद्दों से जुड़े रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार हजारों लोग मारे गए, घायल हुए या गिरफ्तार किए गए। सरकार इन प्रदर्शनों को विदेशी साजिश बताती रही है, लेकिन स्वतंत्र रिपोर्टिंग से संकेत मिलता है कि यह आंदोलन ज़मीनी और व्यापक असंतोष का परिणाम हैं। प्रदर्शनकारियों के लिए सबसे बड़ा खतरा यही है कि विदेशी हस्तक्षेप की बातें सरकार को और अधिक दमन का बहाना दे देती हैं।
इतिहास की छाया और भविष्य की राह
1953 में ईरान की निर्वाचित सरकार को हटाने में अमेरिकी भूमिका आज भी ईरानी समाज की सामूहिक स्मृति में दर्ज है। यही कारण है कि सरकार के विरोधी होने के बावजूद कई ईरानी अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ हैं। उनका मानना है कि बाहरी ताकतें उनकी लड़ाई को कमजोर कर सकती हैं। शांति समर्थकों का तर्क है कि दुनिया को दो सच्चाइयों को साथ लेकर चलना चाहिए—एक ओर ईरानी जनता के अधिकारों का समर्थन, दूसरी ओर युद्ध और कठोर प्रतिबंधों का विरोध। दीर्घकालिक समाधान केवल संवाद, कूटनीति और मानवाधिकार आधारित दबाव से ही संभव है।
आज की वार्ता तत्काल किसी बड़े समझौते की गारंटी नहीं देती, लेकिन यह संवाद का रास्ता जरूर खोलती है। असली परीक्षा यह होगी कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय परमाणु मुद्दे से आगे बढ़कर ईरानी जनता की स्वतंत्रता और गरिमा को भी वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाता है या नहीं।