पूनम शर्मा
डॉ. निशिकांत दुबे का भाषण केवल एक राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि यह भारत के आत्म-सम्मान में आए बदलाव का एक दस्तावेज था। उन्होंने 1980 के दशक का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि कैसे एक समय था जब भारत को अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुकना पड़ता था। दुबे ने कटाक्ष करते हुए कहा कि आज स्थिति बदल चुकी है। आज व्हाइट हाउस खुद भारत और पीएम मोदी के साथ प्रगाढ़ संबंधों की बात करता है। यह “जी हुजूरी” वाले कूटनीतिक दौर के अंत का संकेत है।
चुनाव आयोग और ‘सुविधाजनक’ लोकतंत्र
विपक्ष द्वारा चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठाए गए सवालों को दुबे ने “ऐतिहासिक पाखंड” करार दिया। उन्होंने कुछ कड़वे सवाल पूछे:
एम.एस. गिल का उदाहरण: उन्होंने याद दिलाया कि कैसे एक मुख्य चुनाव आयुक्त कार्यकाल के बाद कांग्रेस के मंत्री बन गए। क्या तब पारदर्शिता की चिंता नहीं थी?
नवीन चावला का मुद्दा: उन्होंने आरोप लगाया कि अतीत में नियुक्तियाँ व्यक्तिगत वफादारी और विदेशी लॉबी के प्रभाव में की जाती थीं।
ईवीएम: जीत आपकी, तो मशीन सही?
महाराष्ट्र चुनाव और ईवीएम विवाद पर दुबे ने आंकड़ों के साथ हमला किया। उन्होंने अकोला वेस्ट, नागपुर वेस्ट और मालेगांव जैसी सीटों का उदाहरण दिया जहां कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और एनसीपी (शरद पवार) ने जीत दर्ज की। उनका सीधा सवाल था: “अगर ईवीएम में खराबी है, तो आप इन सीटों पर कैसे जीते?” दुबे का तर्क है कि जब विपक्ष जीतता है तो ईवीएम महान हो जाती है, और जब हारता है तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है।
निष्कर्ष
निशिकांत दुबे का यह भाषण विपक्ष की उस रणनीति पर प्रहार है जो संस्थानों को अपनी हार का बलि का बकरा बनाती है। उन्होंने साफ कर दिया कि महाराष्ट्र की जनता के जनादेश का अपमान करना बंद होना चाहिए। उनका लहजा स्पष्ट था—यह वह भारत है जो अब दुनिया के सामने नजरें झुकाकर नहीं, बल्कि मिला कर बात करता है।