आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 का संदेश: गुणवत्ता नियंत्रण आदेश ज़रूरी हैं, लेकिन समझदारी के साथ
QCOs पर आर्थिक सर्वेक्षण की दो-टूक: अंधाधुंध सख्ती नहीं, रणनीतिक संतुलन जरूरी
पूनम शर्मा
आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने एक दिलचस्प लेकिन अहम संदेश दिया है—गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (Quality Control Orders या QCOs) काम करते हैं, लेकिन तभी जब वे समझदारी से, चुनिंदा तौर पर और आर्थिक हकीकत को ध्यान में रखकर लागू किए जाएं।
यह बात ऐसे समय आई है जब सरकार ने हाल ही में चुपचाप 69 गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों को निलंबित कर दिया। इनमें केमिकल्स, पॉलिमर, फाइबर इंटरमीडिएट्स और स्टील से जुड़े इनपुट्स शामिल थे, जो देश के कई उद्योगों के लिए कच्चा माल हैं। पहली नज़र में यह फैसला सरकार की ‘क्वालिटी फर्स्ट’ नीति से पीछे हटने जैसा लगा।
लेकिन आर्थिक सर्वेक्षण इस पूरे घटनाक्रम को एक अलग, ज्यादा संतुलित नज़रिये से देखता है।
गुणवत्ता नियंत्रण गलत नहीं, अंधाधुंध इस्तेमाल है समस्या
आर्थिक सर्वेक्षण QCOs की आलोचना नहीं करता। इसके उलट, वह साफ तौर पर कहता है कि गुणवत्ता नियंत्रण भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बदलने का एक ताकतवर औजार रहा है। इससे न सिर्फ घटिया आयात पर लगाम लगी, बल्कि भारतीय कंपनियों को वैश्विक वैल्यू चेन में ऊपर उठने का मौका भी मिला।
लेकिन सर्वेक्षण एक अहम फर्क भी बताता है—
तैयार (finished) उत्पादों पर गुणवत्ता नियंत्रण और कच्चे माल या इंटरमीडिएट्स पर अनिवार्य मानकों को थोपना, दोनों एक जैसी चीज़ नहीं हैं।
यहीं से पूरी बहस की असली परत खुलती है।
खिलौना उद्योग: QCOs की सबसे बड़ी सफलता की कहानी
अगर समझना हो कि QCOs सही तरीके से लागू हों तो क्या कर सकते हैं, तो खिलौना उद्योग सबसे बढ़िया उदाहरण है।
कुछ साल पहले तक भारत सस्ते और घटिया खिलौनों का बड़ा बाज़ार था। ज़्यादातर खिलौने आयात किए जाते थे, जिनमें से कई बुनियादी सुरक्षा मानकों पर भी खरे नहीं उतरते थे।
फिर 2020 में सरकार ने खिलौनों पर गुणवत्ता नियंत्रण आदेश जारी किया, जो 1 जनवरी 2021 से लागू हुआ। इसके साथ ही—
- बेसिक कस्टम ड्यूटी 20 प्रतिशत से बढ़ाकर पहले 60 प्रतिशत और फिर 70 प्रतिशत कर दी गई
- हर आयातित खेप की अनिवार्य सैंपल टेस्टिंग शुरू हुई
आंकड़ों ने बदली पूरी तस्वीर
इस नीति का असर बेहद स्पष्ट रहा—
- वित्त वर्ष 2015 से 2023 के बीच खिलौनों का आयात 52 प्रतिशत घट गया
- इसी अवधि में खिलौनों का निर्यात 239 प्रतिशत बढ़ गया
- वित्त वर्ष 2015 में जो भारत खिलौनों का शुद्ध आयातक था, वह वित्त वर्ष 2021 तक शुद्ध निर्यातक बन गया
घरेलू कंपनियों ने उत्पादन बढ़ाया, गुणवत्ता सुधारी और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरना सीखा। आर्थिक सर्वेक्षण दो टूक कहता है—गुणवत्ता नियंत्रण और संतुलित शुल्क नीति ने पूरे उद्योग की दिशा बदल दी।
किन क्षेत्रों में QCOs से साफ फायदा हुआ
सर्वेक्षण मानता है कि खिलौने, ट्रांसफॉर्मर, फुटवियर और सीमेंट जैसे क्षेत्रों में QCOs से स्पष्ट लाभ सामने आए हैं।
- उपभोक्ताओं को सुरक्षित और बेहतर उत्पाद मिले
- कार्यस्थल सुरक्षा में सुधार हुआ
- घटिया आयात पर रोक लगी
- गुणवत्ता में निवेश करने वाली कंपनियों को बराबरी का मैदान मिला
वैश्विक स्तर पर जहाँ तकनीकी मानक लगातार सख्त होते जा रहे हैं, वहां QCOs भारत की औद्योगिक साख भी मजबूत करते हैं।
MSMEs के लिए कहां बढ़ जाती हैं मुश्किलें
आर्थिक सर्वेक्षण उतनी ही ईमानदारी से यह भी स्वीकार करता है कि अनिवार्य प्रमाणन की अपनी लागत होती है।
खासतौर पर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए—
- नई सर्टिफिकेशन प्रक्रियाएँ महंगी और जटिल होती हैं
- कई इकाइयों के पास इन-हाउस टेस्टिंग की सुविधा नहीं होती
- कम समय की डेडलाइन उत्पादन और सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकती है
ये दिक्कतें तब कई गुना बढ़ जाती हैं जब QCOs को कच्चे माल और इंटरमीडिएट इनपुट्स पर लागू किया जाता है।
कच्चा माल और ग्लोबल वैल्यू चेन की हकीकत
आज का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ग्लोबल वैल्यू चेन से जुड़ा हुआ है। कई जरूरी इनपुट्स विदेशों से आते हैं क्योंकि उनका घरेलू विकल्प मौजूद नहीं होता।
ऐसे में सख्त प्रमाणन नियम पूरे ऑटोमोबाइल, पावर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों की उत्पादन श्रृंखला को बाधित कर सकते हैं।
69 QCOs का निलंबन: पीछे हटना नहीं, व्यावहारिक संतुलन
इसी पृष्ठभूमि में सरकार द्वारा 69 QCOs को निलंबित करने का फैसला तार्किक नजर आता है। ये आदेश ऐसे इंटरमीडिएट्स पर थे जो निर्यात और मैन्युफैक्चरिंग के लिए बेहद जरूरी हैं।
इनके हटने से—
- कच्चे माल की सप्लाई आसान होगी
- उत्पादन लागत घटेगी
- भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे
आर्थिक सर्वेक्षण इसे नीति से पीछे हटना नहीं, बल्कि सही समय पर लिया गया संतुलित कदम मानता है।
मिल्टन फ्रीडमैन का ‘पेंसिल’ उदाहरण
सर्वेक्षण मिल्टन फ्रीडमैन के मशहूर ‘पेंसिल’ उदाहरण का हवाला देता है—कोई एक व्यक्ति पेंसिल नहीं बना सकता। यह हजारों लोगों और कई देशों की साझा मेहनत का नतीजा होती है।
अगर इस उत्पादन श्रृंखला की एक भी कड़ी टूटे, तो पूरा तंत्र प्रभावित होता है। गुणवत्ता नियंत्रण यदि इस जटिलता को नजरअंदाज करे, तो वह मजबूती के बजाय नुकसान पहुंचा सकता है।
आगे की नीति का स्पष्ट रास्ता
आर्थिक सर्वेक्षण का निष्कर्ष साफ है-
- QCOs रणनीतिक अनुशासन का औजार हों, हथौड़ा नहीं
- लागू करने से पहले गहन अध्ययन जरूरी है
- उद्योग को पर्याप्त समय दिया जाए
- MSMEs की क्षमताओं को ध्यान में रखा जाए
- जहाँ घरेलू उत्पादन संभव न हो, वहां छूट और वैकल्पिक रास्ते हों
निष्कर्ष
खिलौना उद्योग दिखाता है कि सही जगह और सही तरीके से लागू किए गए QCOs चमत्कार कर सकते हैं। वहीं इंटरमीडिएट इनपुट्स पर लचीला रुख यह संकेत देता है कि सरकार वैश्विक आर्थिक वास्तविकताओं को समझ रही है।
आखिरकार, गुणवत्ता नियंत्रण तभी प्रभावी होता है जब वह स्मार्ट, चयनात्मक और आर्थिक यथार्थ से जुड़ा हो। यही संतुलन तय करेगा कि QCOs भारत के उद्योग के लिए बोझ बनेंगे या उसके परिवर्तन के शांत लेकिन मजबूत चालक।