भाजपा राज में भी त्रिपुरा को भय, भूख, भ्रष्टाचार से मुक्ति  क्यों नहीं ?

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पूनम शर्मा
त्रिपुरा की राजनीति की कई कहानियाँ प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं, चाय की दुकानों से शुरू होती हैं। अगरतला की एक ऐसी ही दुकान पर एक मध्यम आयु के भाजपा कार्यकर्ता ने धीमी आवाज़ में सवाल किया—
“ईमानदारी से बताइए, क्या भ्रष्टाचार अब मुद्दा नहीं रहा? या फिर उस पर बात करने की अनुमति ही नहीं है?”

कोई माइक नहीं था। कोई नारा नहीं। सिर्फ़ एक सवाल—जो बार-बार लौटकर आ रहा है।

अगरतला से लेकर ज़िलों तक, ऐसी ही बेचैनी खामोशी में फैल रही है। अधूरी बातचीत, नाम लेने से पहले रुकती ज़ुबान, और वो सावधानी जो आम तौर पर सत्ता के भीतर नहीं दिखती। कांग्रेस भले ही “10 से 30 प्रतिशत कमीशन राज” का शोर मचा रही हो, लेकिन इससे ज़्यादा गंभीर कहानी सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर आकार ले रही है—एक ऐसी कहानी जिसमें चुप्पी है, दूरी है और यह एहसास भी कि सरकार और संगठन अब एक ही भाषा नहीं बोल रहे।

कांग्रेस के आरोप और भाजपा की चुप्पी

विपक्षी नेताओं का आरोप है कि मुख्यमंत्री डॉ. माणिक साहा के नेतृत्व में भ्रष्टाचार संस्थागत रूप ले चुका है। ठेके, तबादले और प्रशासनिक काम कथित तौर पर एक “अनौपचारिक दर” पर चलते हैं—कभी 10 प्रतिशत, कभी 30 प्रतिशत। यह आंकड़े कम और प्रतीक ज़्यादा बन चुके हैं।

लेकिन राजनीतिक गलियारों में असली चर्चा आरोपों से ज़्यादा भाजपा की प्रतिक्रिया को लेकर है—या कहें, प्रतिक्रिया के अभाव को लेकर। वरिष्ठ नेता दावों को खारिज तो करते हैं, पर न ठोस आंकड़े सामने रखते हैं, न आक्रामक प्रतिवाद।
एक स्थानीय राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं,
“पहले भाजपा इस तरह के आरोपों पर तीखा जवाब देती थी। अब वह बातचीत से ही बचती दिख रही है।”

राजनीति में चुप्पी कभी तटस्थ नहीं होती। उसे अक्सर असहजता के रूप में पढ़ा जाता है।

“यह हमारी पार्टी जैसी नहीं लगती”

भाजपा कार्यालयों की भाषा भी बदल रही है। जहाँ कभी समर्पण और संगठन जैसे शब्द गूंजते थे, वहाँ अब “एडजस्टमेंट”, “जोखिम” और “इसमें मत पड़ो” जैसी फुसफुसाहटें सुनाई देती हैं। पश्चिम त्रिपुरा के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता साफ़ कहते हैं, “हमने यह पार्टी अपनी ही सरकार से डरने के लिए नहीं बनाई थी।”

असंतोष की एक वजह मुख्यमंत्री माणिक साहा की नेतृत्व शैली बताई जा रही है। समर्थक उन्हें शांत, शिक्षित और प्रशासनिक बताते हैं, जबकि आलोचक—अक्सर पार्टी के भीतर से—उन्हें दूर, घिरे हुए और नौकरशाही-प्रधान कहते हैं।

मुद्दा व्यक्तिगत क्षमता का नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति का है।

डॉ. साहा आरएसएस पृष्ठभूमि से नहीं आते। तकनीकी रूप से यह बाध्यता नहीं है, लेकिन त्रिपुरा में इसका भावनात्मक महत्व है। भाजपा का उभार यहाँ वर्षों की आरएसएस-समर्थित मेहनत, त्याग और वैचारिक जुड़ाव का नतीजा रहा है।
एक वरिष्ठ समर्थक धीमी आवाज़ में कहते हैं,
“वे अच्छे प्रशासक हो सकते हैं, लेकिन भाजपा-आरएसएस संस्कृति निरंतर संवाद और सुनने की प्रक्रिया पर टिकी होती है। वह जुड़ाव अब कमज़ोर लग रहा है।”

सुदीप रॉय बर्मन का संकेत

वरिष्ठ नेता सुदीप रॉय बर्मन की हालिया टिप्पणियों और उनके व्यंग्यात्मक अंदाज़—यहाँ तक कि एक स्वयं रचित गीत—ने सन्नाटे में दरार पैदा कर दी। उन्होंने न मुख्यमंत्री का नाम लिया, न सीधे भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। हैरानी की बात यह रही कि सदन में भाजपा की ओर से कोई आपत्ति तक नहीं हुई।

लेकिन राजनीति अक्सर उसी में छिपी होती है जो कहा नहीं जाता।

कुछ ही घंटों में पार्टी के व्हाट्सऐप समूहों में चर्चा शुरू हो गई—क्या बर्मन सिर्फ़ अपनी बात कह रहे थे, या उन लोगों की भी जो खुलकर नहीं बोल सकते?
एक भाजपा विधायक ऑफ-रिकॉर्ड स्वीकार करते हैं,
“नाराज़गी है, लेकिन लोग सार्वजनिक रूप से बोलने से डरते हैं। कोई ‘एंटी-पार्टी’ नहीं कहलाना चाहता।”

डर: राजनीतिक औज़ार या विफलता?

सबसे परेशान करने वाली धारणा डर की है। पत्रकार निजी बातचीत में बताते हैं कि अदालतों और थानों में आने वालों में बड़ी संख्या भाजपा कार्यकर्ताओं की ही है। यह वैध कार्रवाई है या चुनिंदा दबाव—इसकी पुष्टि मुश्किल है, लेकिन राजनीति में धारणा ही अक्सर हकीकत बन जाती है।

एक छोटे व्यापारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,
“कृपया मुझे कोट मत कीजिए। बात करना भी जोखिम लगता है।”

मीडिया संस्थान भी संयमित नज़र आते हैं। वरिष्ठ पत्रकार निजी तौर पर दबाव की बात मानते हैं—कभी प्रत्यक्ष, कभी संकेतों में। नतीजा एक सूचना-शून्य है, जहाँ अफवाहें तेज़ी से फैलती हैं।
एक अनुभवी पत्रकार कहते हैं,
“त्रिपुरा मीडिया ने पहले भी दबाव देखा है, लेकिन इतनी खामोशी नई है।”

तनाव का एक और कारण पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब देब का कथित हाशिये पर जाना है। कभी भाजपा के त्रिपुरा प्रयोग का चेहरा रहे देब अब सत्ता संरचना में सीमित दिखाई देते हैं। पार्टी के भीतर आरोप हैं—सुरक्षा में कटौती, सलाह-मशवरे की कमी और प्रतीकात्मक दूरी।

एक विधायक सवाल उठाते हैं, “अगर एक पूर्व मुख्यमंत्री के साथ ऐसा हो सकता है, तो बाकी लोगों को क्या संदेश जाता है?”

कई कार्यकर्ताओं को यह सामान्य बदलाव नहीं, बल्कि चेतावनी जैसा लगता है।

विद्रोह नहीं, वापसी

त्रिपुरा में जो दिख रहा है, वह खुला विद्रोह नहीं है। न इस्तीफे हैं, न दलबदल।
यह वापसी है—भावनात्मक और संगठनात्मक।

बूथ स्तर के कार्यकर्ता कम बैठकों में आते हैं। वरिष्ठ लोग ज़िम्मेदारी लेने से बचते हैं। वह लगाव, जिसने भाजपा को सत्ता तक पहुँचाया, धीरे-धीरे कम हो रहा है।

एक अनुभवी कार्यकर्ता का वाक्य बेचैन कर देता है—
“आपको विपक्ष नहीं तोड़ता। उदासीनता तोड़ती है।”

दिल्ली के लिए सवाल

भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अब एक ऐसे सवाल से सामना कर रहा है जिसे चुप्पी से नहीं टाला जा सकता—
क्या माणिक साहा सरकार त्रिपुरा में शासन मज़बूत कर रही है, या उस पार्टी को कमज़ोर कर रही है जो शासन चला रही है?

भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच हो सकती है। प्रशासनिक शैली बदली जा सकती है।
लेकिन संगठन से भावनात्मक दूरी—अगर डर भरोसे की जगह ले ले—तो उसे भरना सबसे कठिन होता है।

इतिहास अक्सर शोर नहीं करता। वह पहले फुसफुसाता है—चाय की दुकानों पर, गलियारों में, और अनुत्तरित सवालों में।
और त्रिपुरा में आज सबसे तेज़ सवाल यही है- त्रिपुरा में भाजपा के भीतर बढ़ती चुप्पी, भ्रष्टाचार के आरोप और संगठन-सरकार की दूरी पर गहराता संकट। क्या दिल्ली सुन रही है?

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