धर्म की सीमाओं से ऊपर विद्या का उत्सव: बांग्लादेश में सरस्वती पूजा का व्यापक स्वरूप

ढाका से कोलकाता तक सरस्वती पूजा: सांझी संस्कृति की जीवंत मिसाल

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  • बांग्लादेश में इस वर्ष सरस्वती पूजा बड़े पैमाने पर, बहुधार्मिक भागीदारी के साथ मनाई गई
  • ढाका विश्वविद्यालय के सभी 74 विभागों में स्थापित हुईं देवी सरस्वती की प्रतिमाएँ
  • सरकारी स्तर पर भी आयोजन, भारत के उच्चायुक्त रहे उपस्थित
  • आयोजन ने बंगाल की साझा और समन्वयी संस्कृति को फिर रेखांकित किया

समग्र समाचार सेवा
ढाका/कोलकाता | 26 जनवरी: इस वर्ष बांग्लादेश में सरस्वती पूजा का आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहा, बल्कि वह सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बनकर उभरा। हिंदुओं के साथ-साथ मुसलमानों, ईसाइयों और बौद्ध समुदाय के लोगों की भागीदारी ने इस पर्व को विशिष्ट बना दिया।

सरकारी सहभागिता और सार्वजनिक आयोजन

ढाका में सरस्वती पूजा के अवसर पर आयोजित सरकारी कार्यक्रम में भारत के बांग्लादेश स्थित उच्चायुक्त सहित कई गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए। कोमिल्ला में देवी प्रतिमाओं के साथ निकाली गई ट्रक रैली—जिसमें ढोल-नगाड़े, नृत्य और सामूहिक उत्सव देखने को मिला

ढाका विश्वविद्यालय बना उत्सव का केंद्र

ढाका विश्वविद्यालय इस आयोजन का प्रमुख केंद्र रहा। विश्वविद्यालय के सभी 74 विभागों ने अपने-अपने स्तर पर देवी सरस्वती की प्रतिमा स्थापित की। छात्र और शिक्षक मिलकर चंदा जुटाते दिखे और कई विभागों ने अपने बजट से भी योगदान दिया।

ललित कला और साहित्य विभागों के साथ-साथ इंजीनियरिंग और माइक्रोबायोलॉजी जैसे विषयों से जुड़े विभागों ने भी अपनी अकादमिक पहचान को पूजा के माध्यम से प्रस्तुत किया। सभी महिला छात्रावासों में भी सरस्वती पूजा का आयोजन हुआ, जो अपने-आप में उल्लेखनीय रहा।

धर्म से ऊपर संस्कृति का भाव

पूजा में शामिल कई मुसलमान छात्रों ने स्पष्ट रूप से कहा कि विद्या की देवी किसी धर्म में भेद नहीं करतीं। उनके लिए यह पर्व आस्था से अधिक संस्कृति और जीवन-पद्धति का हिस्सा है।

यह दृश्य कोलकाता के ईडन हिंदू हॉस्टल में मनाई गई सरस्वती पूजा और इफ़्तार की संयुक्त परंपरा की भी याद दिलाता है, जहाँ विभिन्न धर्मों के छात्र मिलकर उत्सव मनाते हैं और देश की साझा विरासत को जीवित रखते हैं।

चुनावी माहौल और सामाजिक संकेत

यह संभावना जताई जा रही है कि आगामी राष्ट्रीय चुनाव से पहले इस तरह के आयोजनों का उद्देश्य सामाजिक विश्वास को मज़बूत करना भी हो सकता है। हालाँकि, कट्टरपंथी तत्वों की नाराज़गी और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं।

इसके बावजूद, ढाका और कोलकाता दोनों जगह हिंदू और मुसलमानों द्वारा मिलकर सरस्वती पूजा मनाए जाने की घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि बंगाल की समन्वयी संस्कृति अभी भी जीवित है।

निष्कर्ष

अतिरंजित और भय पैदा करने वाली रिपोर्टों के बीच, बांग्लादेश में सरस्वती पूजा का यह स्वरूप भारत के लिए एक सकारात्मक सांस्कृतिक संदेश देता है। यह याद दिलाता है कि विभाजन की राजनीति से परे, साझा परंपराएँ आज भी लोगों को जोड़ सकती हैं। यही उम्मीद इस पूरे उत्सव की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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