कैंपस में भेदभाव गलत, लेकिन कानून समावेशी होना चाहिए: प्रियंका चतुर्वेदी

एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नियम में दुरुपयोग की आशंका, संशोधन की मांग

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  • प्रियंका चतुर्वेदी ने यूजीसी की एंटी-डिस्क्रिमिनेशन अधिसूचना पर सवाल उठाए
  • कानून के चयनात्मक और अस्पष्ट क्रियान्वयन पर चिंता जताई
  • झूठे मामलों और दोष निर्धारण की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
  • अधिसूचना वापस लेने या संशोधन करने की मांग

समग्र समाचार सेवा
मुंबई, 25 जनवरी। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा है कि विश्वविद्यालय परिसरों में किसी भी प्रकार का जातिगत भेदभाव पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा कि भारत में पहले ही कई छात्र इस तरह के भेदभाव के गंभीर दुष्परिणाम झेल चुके हैं, जिसे किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कानून की समावेशिता पर सवाल

हालांकि, प्रियंका चतुर्वेदी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की हालिया अधिसूचना को लेकर यह सवाल उठाया कि क्या यह कानून वास्तव में समावेशी है और क्या यह सभी वर्गों को समान संरक्षण देता है। उन्होंने कहा कि कानून का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि किसी एक पक्ष के प्रति झुकाव दिखाना।

चयनात्मक क्रियान्वयन की आशंका

प्रियंका चतुर्वेदी ने कानून के लागू होने के तरीके पर चिंता जताते हुए पूछा कि इसके क्रियान्वयन में भेदभाव क्यों दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि यदि नियम सभी के लिए समान रूप से लागू नहीं होंगे, तो इससे न्याय की भावना कमजोर होगी।

झूठे मामलों और दोष निर्धारण पर चिंता

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि झूठे मामलों की स्थिति में क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी। दोष का निर्धारण किस आधार पर होगा और यह कैसे तय किया जाएगा कि वास्तव में भेदभाव हुआ है या नहीं। उन्होंने पूछा कि भेदभाव की परिभाषा शब्दों से तय होगी, कार्यों से या केवल धारणाओं के आधार पर।

स्पष्ट और समान प्रक्रिया की मांग

प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि यदि कानून की प्रक्रिया स्पष्ट, सटीक और सभी के लिए समान नहीं होगी, तो इससे कैंपस में सकारात्मक वातावरण बनने के बजाय भय और भ्रम का माहौल बन सकता है।

अधिसूचना वापस लेने या संशोधन की मांग

उन्होंने जोर देकर कहा कि यूजीसी की यह अधिसूचना या तो वापस ली जानी चाहिए या उसमें आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए, ताकि यह संतुलित, समावेशी और सभी के लिए समान रूप से लागू हो सके तथा दुरुपयोग की कोई गुंजाइश न रहे।

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