लिव-इन में रहने वाली महिलाओं को कानूनी संरक्षण जरूरी: मद्रास हाई कोर्ट

लिव-इन रिश्ते भारतीय समाज के लिए सांस्कृतिक झटका, महिलाओं को मिले पत्नी का दर्जा

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  • अदालत ने लिव-इन संबंधों को भारतीय सामाजिक संरचना के लिए चुनौती बताया
  • महिलाओं को पत्नी जैसा कानूनी दर्जा देने की जरूरत पर बल
  • लिव-इन रिश्तों में महिलाओं को मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ती है:
    कोर्ट
  • अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते समय आई अहम टिप्पणी

समग्र समाचार सेवा
चेन्नई, 20 जनवरी: मद्रास उच्च न्यायालय ने लिव-इन रिलेशनशिप के लगातार बढ़ते मामलों को लेकर चिंता व्यक्त की है। अदालत का मानना है कि ऐसे संबंध भारतीय समाज की पारंपरिक व्यवस्था के लिए एक बड़ा बदलाव हैं, जिनके दूरगामी सामाजिक और कानूनी प्रभाव सामने आ रहे हैं।

महिलाओं को सुरक्षा देने की आवश्यकता

जस्टिस एस. श्रीमाथी ने अपने आदेश में कहा कि लिव-इन संबंधों में शामिल कई महिलाएँ आधुनिक सोच के साथ इस तरह के रिश्ते अपनाती हैं, लेकिन समय बीतने के साथ उन्हें यह अहसास होता है कि यह रिश्ता विवाह जैसी स्थिरता और सुरक्षा प्रदान नहीं करता। ऐसे में महिलाओं को असुरक्षा की स्थिति में छोड़ दिया जाता है।

कानूनी खालीपन से बढ़ रही समस्याएँ

अदालत ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में लिव-इन रिश्तों में रहने वाली महिलाओं के लिए ठोस कानूनी ढांचा नहीं है। इसका परिणाम यह है कि कई महिलाएँ भावनात्मक तनाव और मानसिक दबाव का सामना कर रही हैं, जबकि उन्हें पर्याप्त अधिकार नहीं मिल पाते।

किस प्रकरण में सामने आई टिप्पणी

यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें एक व्यक्ति पर महिला से विवाह का आश्वासन देकर संबंध बनाने का आरोप था। आरोपी ने अग्रिम जमानत की मांग करते हुए महिला के चरित्र पर सवाल उठाए। अदालत ने इस रवैये को अनुचित बताते हुए कहा कि जब तक रिश्ता चलता है, पुरुष खुद को आधुनिक मानते हैं, लेकिन संबंध टूटते ही आरोप महिलाओं पर मढ़ दिए जाते हैं।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 का संदर्भ

कोर्ट ने यह भी कहा कि वर्तमान समय में महिलाओं को भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के तहत ही सीमित संरक्षण उपलब्ध है। यदि विवाह संभव नहीं है, तो ऐसे मामलों में पुरुषों को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

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