चाबहार पोर्ट पर घमासान: क्या अमेरिकी दबाव में फँसी भारत की विदेश नीति?

चाबहार पोर्ट पर अमेरिका की सख़्ती, भारत की विदेश नीति फिर कठघरे में

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समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली | 17 जनवरी: ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ़ लगाने की अमेरिकी राष्ट्रपति की घोषणा के बाद से भारत की विदेश नीति को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस फैसले का भारत–ईरान रिश्तों और खासतौर पर चाबहार बंदरगाह परियोजना पर क्या असर पड़ेगा।

भारत और ईरान के बीच व्यापारिक आंकड़े भले ही सीमित हों, लेकिन रणनीतिक दृष्टि से ईरान भारत के लिए बेहद अहम देश रहा है। इसी रणनीति का केंद्र है ईरान के दक्षिणी तट पर सिस्तान–बलूचिस्तान प्रांत में स्थित चाबहार बंदरगाह, जिसे भारत और ईरान मिलकर विकसित कर रहे थे।

पाकिस्तान को बाइपास करने वाला भारत का रास्ता

चाबहार बंदरगाह भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसके ज़रिये वह पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधे पहुँच बना सकता है। यह बंदरगाह चीन द्वारा संचालित पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के मुक़ाबले भारत का रणनीतिक जवाब भी समझा जाता रहा है।

लेकिन अमेरिका द्वारा ईरान से जुड़े लेन–देन पर सख़्ती के संकेत मिलने के बाद ऐसी ख़बरें सामने आने लगीं कि भारत चाबहार परियोजना से धीरे–धीरे पीछे हट रहा है।

भारत सरकार की सफ़ाई

इन अटकलों के बीच भारत सरकार ने स्थिति साफ़ करने की कोशिश की है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि चाबहार के संचालन को लेकर भारत अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संपर्क में है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि अमेरिकी वित्त विभाग ने अक्टूबर 2025 में एक पत्र जारी कर अप्रैल 2026 तक सशर्त प्रतिबंध–छूट के दिशा–निर्देश दिए थे। भारत इस व्यवस्था को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिकी पक्ष से बातचीत कर रहा है और साथ ही ईरान के साथ अपने लंबे समय से चले आ रहे संबंधों को भी बनाए रखना चाहता है।

व्यापार छोटा, लेकिन अहम

आंकड़ों के मुताबिक़, बीते साल भारत और ईरान के बीच कुल व्यापार लगभग 1.6 अरब डॉलर का रहा, जो भारत के कुल व्यापार का सिर्फ़ 0.15 प्रतिशत है। इसके बावजूद ईरान भारत के लिए केवल व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि एक अहम भू–राजनीतिक कड़ी भी है।

रिपोर्ट से बढ़ीं अटकलें

चाबहार को लेकर अनिश्चितता तब और बढ़ी जब दि इकनॉमिक टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत ने इस परियोजना से रणनीतिक रूप से दूरी बनानी शुरू कर दी है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अपना तय निवेश ईरान को ट्रांसफर कर दिया है और परियोजना का संचालन करने वाली सरकारी कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड ने भविष्य में संभावित अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए औपचारिक रूप से कदम पीछे खींचे हैं।

हालांकि अमेरिका पहले चाबहार को लेकर भारत को प्रतिबंधों से छूट देता रहा है, लेकिन मौजूदा संकेतों से लगता है कि यह छूट आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा। ऐसे में भारत के पास अप्रैल तक बातचीत का समय माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर जल्द ही अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात कर सकते हैं।

विपक्ष और विशेषज्ञों के सवाल

इस पूरे घटनाक्रम पर विपक्षी दलों और रणनीतिक मामलों के जानकारों ने सरकार की नीति पर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस के मीडिया एवं पब्लिसिटी विभाग के चेयरमैन पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर पूछा कि भारत कब तक अमेरिकी दबाव में अपने फैसले लेता रहेगा।

सामरिक विशेषज्ञों की चेतावनी

सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी का कहना है कि 2019 में अमेरिका के दबाव में भारत ने ईरान से तेल ख़रीदना बंद कर दिया, जिससे भारत–ईरान ऊर्जा संबंध लगभग खत्म हो गए और इसका सीधा लाभ चीन को मिला। उनके मुताबिक़, आज चीन ईरान का कच्चा तेल सबसे सस्ते दामों पर खरीद रहा है, जबकि भारत पीछे हट गया।

चेलानी का तर्क है कि चाबहार से पीछे हटना इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि मई 2024 में भारत और ईरान के बीच शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को लेकर 10 साल का समझौता हुआ था, जिसमें भारत को संचालन और विकास का अधिकार मिला था।

अलग–अलग नज़रिये

राजनयिक मामलों की वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर के अनुसार, सरकार ने चाबहार को लेकर आई रिपोर्ट का स्पष्ट खंडन नहीं किया है।

वहीं, अमेरिकी अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल के कॉलमनिस्ट सदानंद धूमे का कहना है कि भारत की विदेश नीति को लेकर पिछले कुछ वर्षों में जो आत्मविश्वास दिखाया गया, हालिया घटनाओं ने उसकी सीमाएं उजागर कर दी हैं।

इसके उलट, थिंक टैंक ओआरएफ़ के सीनियर फेलो सुशांत सरीन मानते हैं कि भारत ने चाबहार से दूरी अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि मजबूरी में बनाई है। उनके मुताबिक़, ईरान को भी वैश्विक प्रतिबंधों की हकीकत समझनी होगी।

‘मल्टीपोलर’ रास्ता ही विकल्प?

ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान का कहना है कि भारत की विदेश नीति मूल रूप से मल्टीपोलर रही है, यानी वह कई देशों के साथ संतुलन बनाकर चलना चाहता है। लेकिन मौजूदा वैश्विक हालात और अमेरिकी सख़्ती ने इस संतुलन को बनाए रखना और कठिन बना दिया है।

चाबहार का इतिहास और महत्व

भारत ने पहली बार 2003 में चाबहार बंदरगाह को विकसित करने का प्रस्ताव रखा था, ताकि अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा के ज़रिये भारत, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया को जोड़ा जा सके। 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ईरान दौरे के बाद इस परियोजना को नई रफ़्तार मिली।

2019 में पहली बार इसी बंदरगाह के ज़रिये अफ़ग़ानिस्तान से माल भारत पहुँचा और 2024 में शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन का समझौता हुआ, जिसे सरकार ने बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि बताया था।

अब सवाल वही है

आज जब चाबहार से भारत की दूरी की ख़बरें सामने आ रही हैं, तब प्रधानमंत्री मोदी के उस पुराने बयान की फिर चर्चा हो रही है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत अपने फैसले किसी तीसरे देश के दबाव में नहीं लेता।

ऐसे में बड़ा सवाल यही है, क्या भारत अमेरिकी दबाव के आगे झुक रहा है, या यह बदलते वैश्विक हालात में संतुलन साधने की मजबूरी है? चाबहार बंदरगाह पर मची यह बहस फिलहाल भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी कसौटी बन चुकी है।

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