पूनम शर्मा
महाराष्ट्र लोकल बॉडी चुनाव 2026 के रुझान जैसे-जैसे स्पष्ट होते गए और सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन की बढ़त सामने आने लगी, वैसे-वैसे राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का एक जाना-पहचाना सिलसिला भी शुरू हो गया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बार फिर “वोट चोरी” का आरोप लगाते हुए संवैधानिक संस्थाओं पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पलटवार करते हुए इन आरोपों को “बहाना ब्रिगेड” की राजनीति बताया—यानी जब चुनावी नतीजे मनमाफिक न हों, तो संस्थाओं को दोष देना।
विवाद तब और तेज हो गया जब बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। राहुल गांधी ने इस वीडियो का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आयोग मतदाताओं के साथ “गैसलाइटिंग” कर रहा है—अर्थात लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ही भ्रमित और प्रभावित किया जा रहा है। उनके इस बयान पर न सिर्फ BJP, बल्कि राज्य चुनाव आयोग (SEC) के अधिकारियों ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी और आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया।
इस पूरे विवाद के केंद्र में एक बड़ा सवाल है—क्या चुनावी हार के बाद बार-बार संस्थाओं पर संदेह जताना लोकतंत्र को मजबूत करता है या कमजोर?
राहुल गांधी का आरोप: दोहराया गया पैटर्न
राहुल गांधी द्वारा “वोट चोरी” का आरोप कोई नया घटनाक्रम नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव, कई विधानसभा चुनावों और अब स्थानीय निकाय चुनावों के बाद भी ऐसे आरोप सामने आते रहे हैं। यही वजह है कि आलोचक सवाल उठाते हैं कि क्या कांग्रेस नेतृत्व आत्ममंथन की जगह संस्थागत दोषारोपण को प्राथमिकता दे रहा है।
महाराष्ट्र के इन चुनावों में मतदान प्रतिशत संतोषजनक रहा और मतगणना स्थापित नियमों के तहत हुई। ऐसे में राहुल गांधी का बयान किसी ठोस अनियमितता के खुलासे से ज़्यादा चुनावी रुझानों से उपजी असहजता का प्रतीक लगता है। जब वे चुनाव आयोग पर नागरिकों को गुमराह करने का आरोप लगाते हैं, तो इसका असर सिर्फ नतीजों पर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर भी पड़ता है जिसे भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ माना जाता है।
आलोचकों का मानना है कि बिना ठोस सबूत के चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना जनता के भरोसे को कमजोर करता है। लोकतंत्र में असहमति ज़रूरी है, लेकिन निराधार आरोप पूरी प्रणाली को संदेह के घेरे में डाल देते हैं।
राज्य चुनाव आयोग का जवाब: राजनीति से ऊपर तथ्य
राज्य चुनाव आयुक्त दिनेश वाघमारे ने आरोपों पर सख्त प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि मतदान में इस्तेमाल होने वाली स्याही, मतदाता सूचियां और चुनावी प्रक्रियाएं वर्ष 2011 से लगातार समान रही हैं। राज्य चुनाव आयोग के अनुसार, ऐसा कोई प्रक्रियात्मक बदलाव नहीं किया गया है जिससे हेरफेर के आरोपों को आधार मिल सके।
वाघमारे का बयान इस बात पर ज़ोर देता है कि चुनाव पारदर्शी नियमों के तहत होते हैं, जिनकी निगरानी पर्यवेक्षकों द्वारा की जाती है और जिन पर न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था भी मौजूद है। यदि कहीं गड़बड़ी का संदेह हो, तो उसका समाधान कानूनी रास्तों से होना चाहिए—न कि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और राजनीतिक बयानों के ज़रिये।
यह प्रतिक्रिया राजनीति और संस्थागत विश्वसनीयता के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचती है।
BJP का पलटवार: “बहाना ब्रिगेड” की राजनीति
BJP ने इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस हर हार के बाद चुनाव आयोग, EVM या प्रशासन को निशाना बनाती है, लेकिन अपनी संगठनात्मक कमजोरियों पर कभी चर्चा नहीं करती।
BJP प्रवक्ताओं का कहना है कि कांग्रेस खासकर शहरी और अर्ध-शहरी महाराष्ट्र में जमीनी स्तर पर जनता से जुड़ने में असफल रही है, जहां स्थानीय शासन, बुनियादी सुविधाएं और नेतृत्व अहम मुद्दे होते हैं। इस असफलता को स्वीकार करने के बजाय, पार्टी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा करती है।
BJP के अनुसार, महायुति की बढ़त किसी साजिश का परिणाम नहीं, बल्कि शासन, बुनियादी ढांचे और स्थानीय नेतृत्व पर जनता की मुहर है।
बड़ा सवाल: क्या लोकतांत्रिक भरोसा कमजोर हो रहा है?
इस राजनीतिक टकराव से एक गंभीर सवाल भी उभरता है—जब बड़े नेता बार-बार चुनावी संस्थाओं पर अविश्वास जताते हैं, तो उसका समाज पर क्या असर पड़ता है?
भारत की चुनावी व्यवस्था दशकों से राजनीतिक बदलाव, गठबंधन सरकारों और कड़े मुकाबलों का सामना करती आई है। आलोचना और सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है, लेकिन बिना प्रमाण के लगातार संस्थाओं को अविश्वसनीय ठहराना मतदाताओं में निराशा और उदासीनता पैदा कर सकता है। जब लोगों को लगने लगे कि नतीजे पहले से तय हैं, तो लोकतांत्रिक भागीदारी भी कमजोर पड़ती है।
विडंबना यह है कि ऐसी बयानबाज़ी अक्सर सत्ता पक्ष से ज़्यादा विपक्ष को नुकसान पहुंचाती है। चुनावों को “अन्यायपूर्ण” बताने से अपने ही समर्थकों का मनोबल गिरता है।
महाराष्ट्र की राजनीतिक सच्चाई
महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव कई कारकों से प्रभावित होते हैं—जातीय समीकरण, शहरी प्रशासन, स्थानीय गठबंधन और क्षेत्रीय नेतृत्व। महायुति की बढ़त इन्हीं जमीनी सच्चाइयों को दर्शाती है, न कि किसी एक राष्ट्रीय कथा को।
कांग्रेस के लिए, जो कभी राज्य की प्रमुख राजनीतिक शक्ति थी, ये नतीजे आत्मनिरीक्षण का संकेत हैं। संगठनात्मक पुनर्गठन, मजबूत स्थानीय नेतृत्व और स्पष्ट नीतिगत दिशा की ज़रूरत अब पहले से ज़्यादा महसूस होती है। संस्थाओं पर आरोप लगाकर सुर्खियां तो मिल सकती हैं, लेकिन मतदाताओं का भरोसा नहीं।
निष्कर्ष: आरोप नहीं, जवाबदेही ज़रूरी
लोकतंत्र जवाबदेही से चलता है—चाहे वह सरकार हो, विपक्ष हो या संस्थाएं। सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन जिम्मेदारी के साथ। बिना ठोस प्रमाण के लगाए गए आरोप लोकतांत्रिक सतर्कता से ज़्यादा राजनीतिक बचाव की तरह दिखाई देते हैं।
अगर भारतीय राजनीति को आगे बढ़ना है, तो चुनावी हार को साज़िश नहीं, आत्ममंथन का अवसर मानना होगा। चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं अंधविश्वास से नहीं, बल्कि तथ्यपूर्ण और जिम्मेदार संवाद से मजबूत होती हैं।
महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में मतदाताओं ने अपना फैसला सुना दिया है। अब असली परीक्षा इस बात की है कि राजनीतिक नेतृत्व उस फैसले को कितनी गंभीरता से सुनता है।