पूनम शर्मा
राजनीति की गिरती भाषा और टूटता सामाजिक ताना-बाना
तमिलनाडु में इस वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं और उससे पहले ही राजनीति की भाषा एक बार फिर चिंता का विषय बन गई है। डीएमके सांसद दयानिधि मारन द्वारा उत्तर भारत की महिलाओं को लेकर दिया गया कथित बयान केवल एक गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक सोच को उजागर करता है जो सत्ता की भूख में समाज को बांटने से भी नहीं हिचकती।
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में यह उम्मीद की जाती है कि जनप्रतिनिधि शब्दों का प्रयोग जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ करेंगे। लेकिन जब वही जनप्रतिनिधि महिलाओं को अपमानजनक और संकीर्ण दृष्टिकोण से देखने लगें, तो यह केवल एक व्यक्ति की सोच नहीं रह जाती—यह पूरी राजनीतिक संस्कृति पर सवाल खड़े करता है।
महिलाओं को अपमानित करना, पूरे समाज को नीचा दिखाना
उत्तर भारत की महिलाओं को एक रूढ़ छवि में बांधने की कोशिश करना न सिर्फ महिलाओं का अपमान है, बल्कि यह पूरे देश के लिए शर्मनाक है। महिलाएं किसी क्षेत्र की पहचान नहीं होतीं, वे अपने निर्णय, संघर्ष और उपलब्धियों से पहचानी जाती हैं। उन्हें केवल जैविक भूमिका तक सीमित कर देना एक बेहद घटिया मानसिकता को दर्शाता है।
यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या राजनीति में उतरते ही मानवीय संवेदनाएं समाप्त हो जाती हैं? क्या वोट बैंक के लिए महिलाओं के सम्मान को गिरवी रखा जा सकता है? ऐसे बयान समाज में पहले से मौजूद लैंगिक असमानता को और गहरा करते हैं।
चुनावी मौसम और जानबूझकर खड़ा किया गया विभाजन
इस बयान का समय अपने आप में बहुत कुछ कहता है। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले “उत्तर बनाम दक्षिण” की राजनीति को हवा देना कोई नई रणनीति नहीं है, लेकिन इस बार इसे जिस स्तर तक ले जाया गया है, वह खतरनाक है। जब विकास, रोजगार, शिक्षा और महंगाई जैसे मुद्दों पर बात करने से बचा जाता है, तब अक्सर राजनीति का सहारा विभाजनकारी भाषा बन जाती है।
यह राजनीति न सिर्फ उत्तर भारत के लोगों को निशाना बनाती है, बल्कि तमिलनाडु में वर्षों से रह रहे, काम कर रहे और राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे लाखों प्रवासियों को भी पराया महसूस कराती है। सामाजिक सौहार्द्र ऐसे ही टूटता है—धीरे-धीरे, शब्दों के ज़रिये।
मुख्यमंत्री की चुप्पी और नैतिक जिम्मेदारी
इस पूरे विवाद में सबसे अधिक चुभने वाली बात मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की चुप्पी है। एक मुख्यमंत्री सिर्फ प्रशासक नहीं होता, वह राज्य का नैतिक चेहरा भी होता है। जब उनकी पार्टी के सांसद इस तरह के बयान देते हैं और शीर्ष नेतृत्व मौन साध लेता है, तो यह मौन भी एक संदेश देता है।
अगर डीएमके खुद को सामाजिक न्याय और समानता की पार्टी मानती है, तो उसे अपने ही नेताओं की भाषा पर लगाम लगानी होगी। केवल दूरी बनाकर बयान देना काफी नहीं है। स्पष्ट, सख्त और सार्वजनिक निंदा ज़रूरी है—ताकि यह साफ हो सके कि महिलाओं और किसी भी क्षेत्र के नागरिकों के अपमान की राजनीति स्वीकार्य नहीं है।
गर्व और घृणा के बीच की रेखा
तमिल संस्कृति, भाषा और इतिहास पर गर्व करना स्वाभाविक और सराहनीय है। लेकिन यह गर्व तब खोखला हो जाता है जब उसकी नींव दूसरों को नीचा दिखाने पर टिकी हो। भारत की विविधता ही उसकी ताकत है। उत्तर और दक्षिण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
देश की एकता किसी नारे से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान से मजबूत होती है। जब नेताओं की भाषा नफरत बोने लगे, तो उसका असर सिर्फ चुनावी नतीजों तक सीमित नहीं रहता—वह समाज की सोच को भी प्रदूषित करता है।
महिलाओं को राजनीति का हथियार बनाना बंद हो
सबसे दुखद पहलू यह है कि हर बार राजनीतिक लड़ाई में महिलाओं को ही निशाना बनाया जाता है। जिन नेताओं के भाषणों में महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े वादे होते हैं, वही नेता मौका मिलने पर महिलाओं की गरिमा को कुचलने से नहीं चूकते।
अगर सच में महिलाओं का सम्मान करना है, तो शुरुआत भाषा से करनी होगी। महिलाओं की इज्जत किसी क्षेत्र, जाति या समुदाय से बंधी नहीं होती—वह सार्वभौमिक होती है।
एक चेतावनी, एक मौका
यह विवाद केवल आलोचना का विषय नहीं है, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है। तमिलनाडु की जनता राजनीतिक समझदारी के लिए जानी जाती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वह भावनात्मक उकसावे के बजाय वास्तविक मुद्दों पर नेताओं से सवाल करेगी।
लोकतंत्र में शब्दों की ताकत बहुत होती है। जब ये शब्द ज़हर बन जाएं, तो उन्हें अनदेखा करना भी अपराध बन जाता है। अब वक्त है कि राजनीति अपने स्तर को ऊपर उठाए—वरना इतिहास ऐसे बयानों को माफ नहीं करता।