कर्नाटक की राजनीति में कूटनीतिक शिष्टाचार बनाम दलीय निष्ठा

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पूनम शर्मा
हाल ही में कर्नाटक की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है, जिसने राज्य की कांग्रेस सरकार को विपक्ष के तीखे हमलों के घेरे में ला दिया है। मामला जर्मनी के चांसलर की भारत यात्रा और उसी दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी की उपस्थिति से जुड़ा है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता आर. अशोक ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार पर आरोप लगाया है कि उन्होंने एक विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के प्रति कूटनीतिक शिष्टाचार निभाने के बजाय अपनी पार्टी के नेता को प्राथमिकता दी। यह विवाद न केवल कर्नाटक की राजनीति, बल्कि भारत की ‘सहकारी संघवाद’ (Cooperative Federalism) और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राज्यों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

विवाद की जड़:

कूटनीतिक उल्लंघन का आरोप जर्मनी के चांसलर की भारत यात्रा भारत-जर्मनी द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रोटोकॉल के अनुसार, जब कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष किसी राज्य का दौरा करता है, तो राज्य के मुख्यमंत्री और उच्चाधिकारियों का यह दायित्व होता है कि वे उनका स्वागत करें और द्विपक्षीय हितों, विशेषकर निवेश और प्रौद्योगिकी पर चर्चा करें।

विपक्ष का आरोप है कि जिस समय जर्मन चांसलर बेंगलुरु में थे, उस समय कर्नाटक के दोनों शीर्ष नेता—मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री—उनकी अगवानी करने या उनके साथ आधिकारिक कार्यक्रमों में शामिल होने के बजाय राहुल गांधी के साथ व्यस्त थे। आर. अशोक ने इसे “कर्नाटक के गौरव का अपमान” और “अपरिपक्व राजनीति” करार दिया है।

संवैधानिक उत्तरदायित्व बनाम दलीय वफादारी:

एक मुख्यमंत्री के रूप में सिद्धारमैया राज्य के संवैधानिक प्रमुख (प्रशासनिक अर्थ में) हैं। विदेशी गणमान्य व्यक्तियों का स्वागत करना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि राज्य के विकास की संभावनाओं को प्रदर्शित करने का अवसर होता है। विपक्ष का तर्क है कि राहुल गांधी, जो वर्तमान में सरकार में किसी आधिकारिक संवैधानिक पद पर नहीं हैं, उन्हें एक देश के चांसलर के ऊपर प्राथमिकता देना यह दर्शाता है कि कांग्रेस सरकार के लिए ‘परिवार और पार्टी’ राज्य के ‘हित और गरिमा’ से ऊपर है।

वैश्विक निवेश और कर्नाटक की छवि: बेंगलुरु को भारत की सिलिकॉन वैली कहा जाता है। जर्मनी जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देश के साथ कर्नाटक के संबंध राज्य में हजारों नौकरियों और करोड़ों के निवेश का आधार बन सकते हैं। यदि राज्य का नेतृत्व ऐसे दौरों को गंभीरता से नहीं लेता, तो इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में एक गलत संदेश जाता है। विपक्ष ने इसी बिंदु को आधार बनाकर सरकार को घेरा है कि कांग्रेस की आंतरिक राजनीति राज्य के आर्थिक भविष्य को नुकसान पहुँचा रही है।

राजनीतिक विमर्श और ध्रुवीकरण:

कर्नाटक में भाजपा इस मुद्दे को ‘राष्ट्रवाद और गरिमा’ से जोड़कर देख रही है। आर. अशोक और अन्य भाजपा नेताओं का बयान यह स्पष्ट करता है कि वे सिद्धारमैया सरकार को ‘दिल्ली केंद्रित’ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जो अपने आलाकमान को खुश करने के लिए राज्य के हितों की अनदेखी करती है।

सत्ता पक्ष का संभावित बचाव हालाँकि इस लेख का मुख्य आधार विपक्ष के हमले हैं, लेकिन प्रशासनिक दृष्टिकोण से यह भी देखा जाता है कि प्रोटोकॉल के तहत अक्सर कैबिनेट के अन्य मंत्रियों को भी स्वागत की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। कांग्रेस समर्थकों का तर्क हो सकता है कि राहुल गांधी के साथ बैठकें पूर्व-निर्धारित थीं या सांगठनिक रूप से अनिवार्य थीं। परंतु, कूटनीति की दुनिया में ‘उपस्थिति’ (Optics) का बहुत महत्व होता है। मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति को अक्सर ‘रुचि की कमी’ के रूप में पढ़ा जाता है।

विपक्ष के हमलों के राजनीतिक मायने भाजपा के लिए यह मुद्दा एक बड़ा हथियार बन गया है। कर्नाटक में हाल के महीनों में कई भ्रष्टाचार के आरोपों (जैसे MUDA मामला) और आंतरिक कलह की खबरें आई हैं। ऐसे में चांसलर के अपमान के मुद्दे ने विपक्ष को सरकार को ‘अक्षम’ और ‘गैर-जिम्मेदार’ साबित करने का मौका दे दिया है। आर. अशोक का कड़ा रुख यह दर्शाता है कि भाजपा अब आगामी चुनावों और स्थानीय जनमत को प्रभावित करने के लिए सरकार की हर छोटी-बड़ी कूटनीतिक चूक को भुनाने की रणनीति पर काम कर रही है।

निष्कर्ष लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सरकार की कमियों को उजागर करना है, और कूटनीतिक प्रोटोकॉल का पालन न करना एक गंभीर प्रशासनिक चूक मानी जा सकती है। यदि मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ने वास्तव में एक विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के ऊपर दलीय राजनीति को तरजीह दी है, तो यह कर्नाटक की प्रशासनिक विरासत के लिए एक चिंताजनक मिसाल है।

एक वैश्विक शहर के रूप में बेंगलुरु की साख इस बात पर टिकी है कि उसका नेतृत्व दुनिया के साथ कैसे जुड़ता है। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन जब बात देश के संबंधों और राज्य की गरिमा की हो, तो ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा और संवैधानिक शिष्टाचार का पालन दलगत राजनीति से ऊपर होना चाहिए। कर्नाटक के इस राजनीतिक विवाद ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या भारतीय राजनेता कूटनीतिक जिम्मेदारियों और राजनीतिक निष्ठा के बीच संतुलन बनाने में विफल हो रहे हैं?

आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सिद्धारमैया सरकार इन आरोपों का क्या तार्किक जवाब देती है, या क्या यह विवाद कांग्रेस की छवि को ‘प्रो-पार्टी, एंटी-डेवलपमेंट’ के रूप में स्थापित कर देगा।

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