मकर संक्रांति 2026: अनेक नाम, एक परंपरा, वैश्विक उत्सव
कच्छ से कन्याकुमारी तक एक पर्व, अनेक परंपराएं: मकर संक्रांति 2026
प्रतिज्ञा राय
मकर संक्रांति भारत का ऐसा पर्व है, जो धर्म, संस्कृति और विज्ञान तीनों को एक सूत्र में बांधता है। वर्ष 2026 में भी यह त्योहार पूरे देश में आस्था और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश के साथ ही इस पर्व की शुरुआत होती है, इसी कारण इसे सूर्योपासना का पर्व भी कहा जाता है।
क्षेत्रीय विविधता, सांस्कृतिक एकता
भारत के अलग-अलग हिस्सों में मकर संक्रांति भिन्न नामों से मनाई जाती है। उत्तर भारत में यह मकर संक्रांति या खिचड़ी के रूप में प्रसिद्ध है, गुजरात में उत्तरायण, महाराष्ट्र में मकर संक्रांत, पंजाब में लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल, असम में भोगाली बिहू, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में संक्रांति तथा केरल में मकरविलक्कु के रूप में मनाई जाती है। यह विविधता भारतीय संस्कृति की जीवंतता को दर्शाती है।
धार्मिक मान्यताएँ और आस्था
धार्मिक दृष्टि से मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन गंगा, यमुना या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। तिल-गुड़ का सेवन, दान-पुण्य और सूर्य देव की उपासना इस पर्व के प्रमुख अंग हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भीष्म पितामह ने इसी दिन देह त्याग का वरदान स्वीकार किया था, जिससे इस तिथि को मोक्षदायिनी भी माना जाता है।
लोकसंस्कृति और उत्सव का रंग
सांस्कृतिक रूप से मकर संक्रांति मेलों, लोकगीतों, नृत्यों और पारंपरिक खेलों से जुड़ी हुई है। गुजरात और राजस्थान में पतंगबाजी इस पर्व की विशेष पहचान है, जहां आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में नई फसल का स्वागत, पशु-पूजन और सामुदायिक भोज भी इस पर्व का अहम हिस्सा हैं।
विज्ञान और स्वास्थ्य का संबंध
वैज्ञानिक रूप से मकर संक्रांति सूर्य की उत्तरायण यात्रा की शुरुआत का संकेत देती है। इस समय दिन बड़े होने लगते हैं और ऋतु परिवर्तन का प्रभाव कृषि, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर सकारात्मक पड़ता है। तिल, गुड़ और घी जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थ शरीर को ऊर्जा और गर्मी प्रदान करते हैं, जो शीत ऋतु के अंत में लाभकारी माने जाते हैं।
वैश्विक उत्सव
आज मकर संक्रांति केवल भारत तक सीमित नहीं है। नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड सहित अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में बसे प्रवासी भारतीय भी इसे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं। यह भारतीय संस्कृति की वैश्विक उपस्थिति और उसकी निरंतरता का प्रमाण है।
निष्कर्ष
मकर संक्रांति 2026 केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, परंपरा और मानव जीवन के संतुलन का उत्सव है। यह पर्व हमें एकता, सकारात्मकता और नई शुरुआत की प्रेरणा देता है।