पूनम शर्मा
इतिहास प्रायः दस्तावेज़ों, उद्धरणों और व्याख्याओं तक सीमित रहता है। वह बहस करता है, निष्कर्ष निकालता है और अक्सर असहमति में घिरा रहता है। लेकिन कभी-कभी इतिहास स्वयं अपने दावों को परखने निकल पड़ता है—हवा, पानी और समय की कसौटी पर। INSV कौंडिन्य ऐसा ही एक क्षण है। यह कोई स्मारक नहीं, न ही अतीत की रोमांटिक पुनर्रचना। यह समुद्र में तैरता हुआ एक तर्क है, जो असफल होने का जोखिम उठाता है।
जब अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजय सान्याल एक पारंपरिक सिले-हुए लकड़ी के जहाज पर सवार होकर अरब सागर की ओर बढ़े, तो यह व्यक्तिगत साहसिक यात्रा नहीं थी। यह इतिहास लेखन के उस ढांचे को चुनौती देने का प्रयास था, जिसने दशकों से भारत की समुद्री क्षमताओं को या तो गौण बताया या बाहरी प्रभावों पर निर्भर मान लिया।
औपनिवेशिक इतिहास लेखन की जड़ धारणाएँ
औपनिवेशिक काल से चली आ रही एक स्थायी धारणा यह रही है कि समुद्र मूलतः यूरोप का क्षेत्र था और भारत एक स्थलीय सभ्यता। भारतीय समुद्री गतिविधियों का उल्लेख मिलता भी है, तो वह प्रायः रोमन, अरब या यूरोपीय मध्यस्थता के संदर्भ में। इस दृष्टिकोण ने भारत को वैश्विक इतिहास में एक निष्क्रिय भूमिका में सीमित कर दिया।
समस्या यह नहीं कि भारतीय समुद्री इतिहास पर शोध नहीं हुआ। बल्कि समस्या यह है कि लोकप्रिय समझ और पाठ्यपुस्तकें अब भी उसी औपनिवेशिक फ्रेम में अटकी हुई हैं। INSV कौंडिन्य इस बहस में शब्दों के माध्यम से प्रवेश नहीं करता। वह सीधे समुद्र में उतरता है।
जहाज स्वयं एक तर्क
INSV कौंडिन्य की बनावट अपने आप में एक वक्तव्य है। इसमें लोहे की कीलें नहीं हैं। लकड़ी के तख्तों को नारियल के रेशे की रस्सियों से सिलकर जोड़ा गया है और पारंपरिक तरीकों से सील किया गया है। यह कोई संग्रहालय में सजाने के लिए बनी प्रतिकृति नहीं, बल्कि वास्तविक समुद्री परिस्थितियों का सामना करने वाला जहाज है।
खुले समुद्र में यह पोत हवा, लहरों, नमक और समय के दबाव से गुजरता है। यही वह बिंदु है जहाँ इतिहास एक सैद्धांतिक बहस से निकलकर अनुभवजन्य परीक्षण बन जाता है। अगर ऐसा जहाज आज अरब सागर में टिक सकता है, तो यह मानना कठिन हो जाता है कि अतीत में इसी तकनीक से बने जहाज समुद्री व्यापार नेटवर्क नहीं चला सकते थे।
कौंडिन्य: नाम में छिपा इतिहास
जहाज का नाम केवल प्रतीकात्मक नहीं है। कौंडिन्य भारतीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई परंपराओं में एक ऐसे व्यक्ति के रूप में आते हैं, जो समुद्र पार कर सांस्कृतिक और सामाजिक संपर्क स्थापित करता है। वे किसी सैन्य अभियान का नेतृत्व नहीं करते, बल्कि ज्ञान, परंपराओं और संस्थागत ढाँचों के वाहक बनकर उभरते हैं।
यह कथा स्वयं इस बात की ओर संकेत करती है कि भारतीय प्रभाव समुद्री मार्गों के माध्यम से फैला। और ऐसा तभी संभव था जब समुद्री यात्रा सुरक्षित, नियमित और तकनीकी रूप से सक्षम हो। कौंडिन्य नाम उस ऐतिहासिक स्मृति को पुनर्जीवित करता है, जिसे लंबे समय तक हाशिए पर रखा गया।
मार्ग का चयन: इतिहास और अर्थशास्त्र का संगम
भारत के पश्चिमी तट से ओमान तक का मार्ग कोई आकस्मिक चुनाव नहीं। यह प्राचीन हिंद महासागर व्यापार प्रणाली का एक प्रमुख गलियारा रहा है। यह मानसूनी हवाओं पर आधारित एक सुव्यवस्थित नेटवर्क था, जिसमें मौसम, समुद्री धाराओं और खगोलीय ज्ञान की गहरी समझ आवश्यक थी।
यहाँ अर्थशास्त्र इतिहास से जुड़ता है। बाज़ार बिना लॉजिस्टिक्स के नहीं बनते। लॉजिस्टिक्स बिना तकनीक के नहीं चलती। और तकनीक बिना संस्थागत निरंतरता के विकसित नहीं होती। INSV कौंडिन्य इस पूरी श्रृंखला को दृश्य और ठोस रूप में प्रस्तुत करता है।
इतिहास लेखन की पद्धति पर सवाल
यह परियोजना केवल निष्कर्ष नहीं देती, बल्कि इतिहास लेखन की पद्धति पर भी प्रश्न उठाती है। आज इतिहास मुख्यतः ग्रंथों और उनकी व्याख्याओं पर निर्भर है। लेकिन विज्ञान और इंजीनियरिंग में किसी भी दावे को वास्तविक परिस्थितियों में परखा जाता है। यह यात्रा उसी सोच को इतिहास पर लागू करती है।
यहाँ कोई वैचारिक बचाव का रास्ता नहीं। जहाज या तो समुद्र पार करेगा, या नहीं। यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
एक अर्थशास्त्री का असहज प्रश्न
यह भी महत्त्वपूर्ण है कि यह पहल किसी पेशेवर नाविक या सैन्य अभियान द्वारा नहीं, बल्कि एक अर्थशास्त्री द्वारा की गई। सान्याल का करियर व्यापार नेटवर्क, आर्थिक भूगोल और संस्थागत स्मृति को समझने में बीता है। वही दृष्टि यहाँ भी दिखाई देती है—इतिहास से पूछा गया सीधा सवाल: क्या यह वास्तव में काम करता था?
अतीत से वर्तमान तक
INSV कौंडिन्य का महत्व केवल अतीत तक सीमित नहीं है। जो सभ्यताएँ अपने तकनीकी इतिहास को लेकर असमंजस में रहती हैं, वे वर्तमान में भी आत्मविश्वास उधार लेती हैं। भारत की आज की समुद्री रणनीतियाँ—बंदरगाह विकास, हिंद महासागर में कूटनीतिक सक्रियता—तभी अधिक ठोस आधार पाती हैं जब उन्हें ऐतिहासिक निरंतरता के रूप में देखा जाए।
INSV कौंडिन्य नारे नहीं लगाता। वह चुपचाप समुद्र में उतरता है और अपना तर्क पेश करता है। और शायद यही इसे इतिहास के सबसे दिलचस्प अध्यायों में से एक बनाता है।