पूनम शर्मा
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में जल्द आने वाला एक फैसला केवल कानूनी नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाला है। सवाल सीधा है, लेकिन असर गहरा—क्या डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ़ कानूनी थे?
यह कोई साधारण व्यापारिक विवाद नहीं है। यह हाल के वर्षों के सबसे महत्वपूर्ण ट्रेड मामलों में से एक है। ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ़ लगाने के लिए इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का सहारा लिया—एक ऐसा कानून जो असाधारण परिस्थितियों में राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए बनाया गया था।
ट्रंप सरकार ने दलील दी कि आयात, व्यापार घाटा और आर्थिक निर्भरता अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं। इसी आधार पर व्यापक और लंबे समय तक चलने वाले टैरिफ़ लगाए गए।
अब सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि क्या यह कानून वास्तव में राष्ट्रपति को इतनी व्यापक शक्ति देता है, या फिर इसका दुरुपयोग किया गया।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट शायद पूरे टैरिफ़ सिस्टम को खत्म न करे, लेकिन आपातकालीन शक्तियों की सीमा तय कर सकता है। अगर ऐसा होता है, तो इसका सीधा अर्थ है—अब तक वसूले गए अरबों डॉलर अवैध माने जा सकते हैं। और यही असली डर है।
अगर टैरिफ़ अवैध ठहराए जाते हैं, तो अमेरिकी सरकार को कंपनियों को भारी रकम वापस करनी पड़ सकती है। स्टील, एल्यूमिनियम और कई अन्य सेक्टरों से वसूले गए पैसों को लौटाने का दबाव पहले ही ट्रेज़री विभाग पर दिखने लगा है। सवाल उठ रहा है—क्या अमेरिका के पास इतना पैसा है भी?
इसी पृष्ठभूमि में हमें डोनाल्ड ट्रंप के बदले हुए सुर को देखना चाहिए।
कुछ दिन पहले तक 500% टैरिफ़ की धमकी दी जा रही थी। भाषा आक्रामक थी। आज तस्वीर बदल चुकी है। बातचीत “चल रही है”, दोस्ती की बात हो रही है, प्रधानमंत्री मोदी की खुलकर तारीफ़ की जा रही है, और भारत को अमेरिका के सबसे करीबी साझेदार के रूप में पेश किया जा रहा है।
यह अचानक बदलाव नहीं है—यह मजबूरी है।
जब टैरिफ़ का कानूनी हथियार कमजोर पड़ने लगता है, तो दबाव की जगह डिप्लोमेसी लेती है। और आज की वैश्विक व्यवस्था में भारत के बिना कोई भी बड़ी रणनीति संभव नहीं है।
भारत केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं है। भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। टैरिफ़ के बावजूद भारत की विकास गति बनी रही। ब्रिटेन जैसे देशों के साथ नए व्यापार समझौते हुए। भारत ने यह दिखा दिया कि उसे आर्थिक रूप से घेरा नहीं जा सकता।
सबसे महत्वपूर्ण बात—भारत झुका नहीं।
एक समय अमेरिकी अधिकारियों की ओर से यह संकेत दिया गया कि भारत को “समझौता” करना पड़ेगा, कि फोन कॉल नहीं उठाए जा रहे, कि डील अटक गई है। लेकिन भारत ने साफ कर दिया—किसानों, मज़दूरों, मछुआरों और घरेलू उद्योगों की कीमत पर कोई समझौता नहीं होगा। यही आत्मविश्वास भारत को अलग बनाता है।
रणनीतिक रूप से भी अमेरिका एक सच्चाई समझ चुका है। अगर उसे दक्षिण एशिया और इंडो-पैसिफिक में प्रभाव बनाए रखना है—तो भारत के बिना यह संभव नहीं। सुरक्षा, आतंकवाद विरोध, ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, शिक्षा—हर बड़े क्षेत्र में भारत केंद्रीय भूमिका निभाता है।
इसीलिए आज ट्रंप की भाषा बदली है। दबाव की जगह प्रशंसा है। धमकी की जगह दोस्ती है। यह भावनात्मक बदलाव नहीं है। यह भू-राजनीतिक गणना है।
भारत ने इस पूरे घटनाक्रम में धैर्य रखा। न उकसावे में आया, न जल्दबाज़ी की। उसने संस्थाओं, बाज़ारों और समय को काम करने दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतज़ार करते हुए भारत जानता है कि समय उसके खिलाफ नहीं है। यही चाणक्य नीति है—शोर के बिना रणनीति, टकराव के बिना मजबूती।
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ होती है। आज की दुनिया में ताकत हमेशा आवाज़ ऊँची करके नहीं दिखाई जाती। कभी-कभी वह चुपचाप खड़ी रहती है—और जब दूसरे बदलने को मजबूर होते हैं, तब भी अपने स्थान से हिलती नहीं।