पूनम शर्मा
सत्य स्वीकार करने का साहस और इतिहास की अनसुनी चेतावनी
सत्य को स्वीकार करना आसान नहीं होता। इसके लिए नैतिक साहस चाहिए—विशेषकर तब, जब सत्य हमारे पसंदीदा नेताओं, दलों और स्थापित धारणाओं के विरुद्ध जाता हो। 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के उदय के साथ यह धारणा बनी कि भारत में हिंदुत्व का पुनर्जागरण हो चुका है। यह आकलन आंशिक रूप से सही है, किंतु पूरी सच्चाई नहीं। हिंदुत्व का संकट उसके अस्तित्व का नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक निर्भरता का है।
हिंदुत्व की मूल समस्या : नेता-निर्भर मानसिकता
आज हिंदुत्व एक विचारधारा कम और राजनीतिक नेतृत्व पर आश्रित भावनात्मक प्रतिक्रिया अधिक बनता जा रहा है। यह स्थिति खतरनाक है। जब तक हिंदू समाज स्वयं को नेताओं के बिना असहाय समझेगा, तब तक वह बार-बार ठगा जाता रहेगा।
इतिहास गवाह है कि हिंदू सभ्यता किसी राजनीतिक दल या नेता के कारण नहीं बची, बल्कि योद्धाओं और बलिदानियों के कारण जीवित रही।जब हिंदू योद्धा थे, राजनेता नहीं छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, रानी लक्ष्मीबाई, लाचित बरफुकन, भगत सिंह—इनमें से कोई भी पेशेवर राजनेता नहीं था। ये सभी संघर्षशील योद्धा थे। मुगल और ब्रिटिश काल को सामान्यतः “गुलामी काल” कहा जाता है, पर वास्तविकता यह है कि उस समय हिंदू समाज दास नहीं था, बल्कि निरंतर संघर्षरत था। असली मानसिक दासता स्वतंत्रता के बाद आई, जब हिंदू समाज ने अपना आत्मविश्वास राजनीति के हवाले कर दिया।
स्वतंत्र भारत में आई वास्तविक दासता
आज हिंदू समाज अपनी आवाज़ स्वयं नहीं उठाता, बल्कि नेताओं से उधार लेकर बोलता है। यही मानसिकता भविष्य में उसके पतन का कारण बन सकती है। लोकतंत्र में राजनीति आवश्यक है, लेकिन सत्य से समझौता आत्मघाती है। वर्तमान की सुविधा के लिए किया गया यह समझौता आने वाली पीढ़ियों को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर करता है।
1971 से आज तक : एक राजनीतिक धोखाधड़ी , कांग्रेस से लेकर भाजपा तक, लगभग हर राजनीतिक दल ने शेख मुजीबुर रहमान को “बंगबंधु” और “भारतबंधु” के रूप में प्रस्तुत किया। यह भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी ऐतिहासिक धोखाधड़ियों में से एक है।
शेख मुजीबुर रहमान 1946 में कोलकाता में हुए भीषण हिंदू नरसंहार के समय मुस्लिम लीग और हुसैन सुहरावर्दी के करीबी सहयोगी थे। यह नरसंहार मोहम्मद अली जिन्ना के “डायरेक्ट एक्शन डे” के आह्वान पर हुआ था।
बांग्लादेश की इस्लामी पहचान और हिंदुओं की अनदेखी
10 जनवरी 1972 को ढाका लौटते समय शेख मुजीब ने गर्व से कहा कि बांग्लादेश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मुस्लिम राष्ट्र है। यह बयान उन्होंने जानबूझकर दिया ताकि उनका इस्लामी चरित्र स्पष्ट रहे। उन्होंने न तो 1971 के हिंदू नरसंहार को स्वीकार किया, न ही बांग्लादेश की मुक्ति में हिंदुओं के योगदान को कभी मान्यता दी।
वेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट और मंदिरों का विनाश
शेख मुजीब ने “वेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट” (पूर्व शत्रु संपत्ति कानून) को जारी रखा, जिसमें हिंदुओं को जातीय शत्रु मानकर उनकी संपत्तियाँ जब्त की गईं।
ढाका के ऐतिहासिक रामना काली मंदिर को बुलडोज़र से ध्वस्त किया गया और उसकी भूमि मुस्लिम संस्थानों को सौंप दी गई। इसके साथ ही इस्लामिक फाउंडेशन की स्थापना कर इस्लामी विस्तार को राज्य संरक्षण प्रदान किया गया।
आज की विडंबना : हत्याएँ वहाँ, संरक्षण यहाँ
आज बांग्लादेश में प्रतिदिन हिंदुओं की हत्याएँ हो रही हैं, जबकि उसी शेख मुजीब की बेटी शेख हसीना को भारत में सुरक्षित राजनीतिक शरण और राजकीय आतिथ्य दिया जा रहा है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या बांग्लादेश के हिंदुओं का रक्त भारतीय राजनीति के लिए केवल एक चुनावी उपकरण बन चुका है—विशेषकर असम और पश्चिम बंगाल में?
राजनीतिक चुप्पी और बौद्धिक साहस
यह भी कटु सत्य है कि स्वयं को हिंदुत्व का रक्षक कहने वाले नेता इन सच्चाइयों पर मौन हैं। ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति—भले ही वैचारिक रूप से विरोधी खेमे से हो—इन तथ्यों को उजागर करता है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष : राजनीतिक नशे से मुक्ति आवश्यक
भारतीय राजनीति आज अपने सबसे निम्न स्तर पर है, जहाँ भावनात्मक हिंदुओं को बार-बार मोहरा बनाया जा रहा है। यदि हिंदू समाज ने इस राजनीतिक नशे से स्वयं को मुक्त नहीं किया, तो इतिहास स्वयं को दोहराएगा। और तब अगला बांग्लादेश किसी और देश में नहीं, बल्कि हमारे भविष्य में खड़ा होगा।