नामों की परंपरा और भारत की प्राचीन सांस्कृतिक स्मृति
तेलंगाना में निज़ामाबाद ज़िले का नाम बदलकर ‘इंदूर’ करने की माँग ने एक बार फिर भारत में शहरों और स्थानों के नामों से जुड़ी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्वाभिमान को जाग्रत कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी द्वारा उठाया गया यह मुद्दा केवल एक प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक स्मृति, ऐतिहासिक विरासत और सभ्यतागत निरंतरता से भी जुड़ा हुआ प्रश्न बन गया है।
भारत एक प्राचीन सभ्यता वाला देश है, जिसकी सांस्कृतिक जड़ें वैदिक काल से लेकर मौर्य, गुप्त और दक्षिण के चोल-चेर-पांड्य जैसे साम्राज्यों तक फैली हुई हैं। इन कालखंडों में नगरों और जनपदों के नाम स्थानीय भूगोल, प्रकृति, देवी-देवताओं, जनजातियों और सामाजिक पहचान से जुड़े होते थे। काशी, उज्जयिनी, मथुरा, कांचीपुरम और अवंती जैसे नाम केवल भौगोलिक पहचान नहीं थे, बल्कि वे भारतीय जीवन-दृष्टि और आध्यात्मिक परंपरा के प्रतीक रहे हैं, जो आज भी जीवित हैं।
मध्यकालीन नामकरण और सत्ता की राजनीति
भारत में शहरों और क्षेत्रों के नामों का इस्लामीकरण मुख्य रूप से मध्यकाल में, विशेषकर तुर्क और मुगल आक्रमणों के बाद प्रारंभ हुआ। इस दौर में कई स्थानों के पारंपरिक नामों को बदलकर शासकों, सल्तनतों या धार्मिक पहचान से जुड़े नाम रखे गए। इसका उद्देश्य केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं था, बल्कि इस्लामिक सत्ता, प्रभुत्व और सांस्कृतिक वर्चस्व को स्थापित करना भी था।
इलाहाबाद, अहमदाबाद और औरंगाबाद जैसे नाम इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया से जुड़े माने जाते हैं। तेलंगाना का निज़ामाबाद भी इसी पृष्ठभूमि में देखा जाता है। ‘निज़ाम’ शब्द हैदराबाद रियासत के शासकों से जुड़ा है, जिनके शासनकाल को लेकर सामाजिक असमानता, दमन और राजनीतिक विवादों की स्मृतियां जुड़ी रही हैं। तर्क है कि ऐसे नाम उस दौर की याद दिलाते हैं जब स्थानीय जनता के अधिकार सीमित थे। ‘इंदूर’ जैसे प्राचीन नाम क्षेत्र की स्थानीय संस्कृति और ऐतिहासिक चेतना से अधिक मेल खाते हैं।
राजनीति, विरोध और सांस्कृतिक पुनरुद्धार का प्रश्न
यह किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि भारत की मूल सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है। उनका तर्क है कि स्वतंत्रता के बाद भी कई औपनिवेशिक और मध्यकालीन नाम बने रहे, जबकि राष्ट्र को अपनी सभ्यतागत जड़ों से प्रेरणा लेनी चाहिए थी। प्रयागराज, अयोध्या (फैजाबाद ज़िला) और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर जैसे उदाहरण इसी सोच से जोड़े जाते हैं।
वहीं दूसरी ओर, विरोधी दल और आलोचक इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण और पहचान की राजनीति करार देते हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि नाम बदलने से रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास जैसे वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है। उनका तर्क है कि भारत की ताकत उसकी बहुलता में है, जहां विभिन्न संस्कृतियों और ऐतिहासिक परतों को स्वीकार किया गया है।
हालांकि, यह भी तथ्य है कि विश्व के कई देशों ने स्वतंत्रता या राजनीतिक परिवर्तन के बाद स्थानों के नाम बदले हैं। रूस में लेनिनग्राद का सेंट पीटर्सबर्ग बनना या अफ्रीकी देशों में औपनिवेशिक नामों का हटना, इसी प्रक्रिया के उदाहरण हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या भारत में सांस्कृतिक पुनरुद्धार को केवल साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखा जाना चाहिए, या इसे ऐतिहासिक सुधार के रूप में भी समझा जा सकता है।
निज़ामाबाद को ‘इंदूर’ करने का प्रस्ताव इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा है। यह केवल एक ज़िले का नाम बदलने की माँग नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जो मानती है कि भारत को अपनी पहचान विदेशी शासन और आक्रमणों की स्मृतियों से नहीं, बल्कि अपनी प्राचीन सभ्यता और स्थानीय परंपराओं से गढ़ना चाहिए।
अंततः, यह निर्णय लोकतांत्रिक प्रक्रिया, जन-भावना और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर ही होना चाहिए। लेकिन यह बहस यह स्पष्ट कर देती है कि भारत में शहरों के नाम केवल नक्शे पर लिखे शब्द नहीं हैं—वे इतिहास, संस्कृति और सामूहिक स्मृति के वाहक हैं। इन्हें संरक्षित करना हो या परिवर्तित करना, दोनों ही स्थितियों में संवेदनशीलता, संतुलन और ऐतिहासिक समझ अनिवार्य है।