बांग्लादेश -मानवतावाद या चयनात्मक संवेदना? एक असहज सवाल

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!

पूनम शर्मा
आज के दौर में “विश्व मानवतावाद”, “सर्वधर्म समभाव” और “वैश्विक नैतिक नेतृत्व” जैसे शब्द जितनी आसानी से बोले जाते हैं, उतनी ही आसानी से वे खोखले भी हो जाते हैं। सवाल शब्दों का नहीं, चयन का है—किस पीड़ा पर आवाज़ उठती है और किस पर चुप्पी साध ली जाती है।

जब तुर्की में भूकंप आता है, तो भारत तुरंत “ऑपरेशन दोस्ती” शुरू करता है। भोजन, दवाइयाँ, राहत सामग्री—सब कुछ। तस्वीरें आती हैं, बयान आते हैं, भावनाएँ व्यक्त होती हैं। जब ईरान जैसे युद्धग्रस्त देश से कुछ लोगों को एयरलिफ्ट कर लाया जाता है, तो एयरपोर्ट पर स्वागत होता है, कैमरे चमकते हैं, मंत्री खुशी जताते हैं। यह सब देखकर कोई भी कहेगा—भारत संवेदनशील है, मानवीय है।

लेकिन यहीं एक सवाल खड़ा होता है—क्या यह संवेदना समान है?

बांग्लादेश के हिंदू और हमारी चुप्पी

बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ जो हो रहा है, वह किसी से छुपा नहीं है। पेट्रोल डालकर जलाना, तेज़ हथियारों से हत्या, पत्नी के सामने पति को ज़िंदा जला देना—ये घटनाएँ अफवाह नहीं, बल्कि रिपोर्टेड हैं। हाल ही में एक हिंदू विधवा महिला के साथ सामूहिक बलात्कार की खबर आई। ऐसी खबरें पढ़कर इंसान का कलेजा काँप जाता है।

लेकिन सवाल यह है कि दिल्ली से आवाज़ क्यों नहीं उठती?
क्या बांग्लादेश में “इंसान” नहीं रहते?
या वहाँ इंसानियत इतनी सस्ती हो गई है कि वह हमारी विदेश नीति के एजेंडे में फिट नहीं बैठती?

जब हिंदुओं का संहार होता है, तब सरकार की ज़ुबान पर ताला क्यों लग जाता है? जब बात सूडान, ईरान या मध्य-पूर्व की आती है, तब भारत “वैश्विक गुरु” बनकर सामने आता है। लेकिन बांग्लादेश के मामले में—जहाँ न भाषा अजनबी है, न संस्कृति, न इतिहास—वहाँ केवल कूटनीतिक चुप्पी दिखाई देती है।

राजनीति से परे एक नैतिक प्रश्न

यह लेख किसी धर्म के खिलाफ नहीं है। सवाल किसी समुदाय से नहीं, राज्य की प्राथमिकताओं से है। अगर भारत सरकार पाकिस्तान और बांग्लादेश के नागरिकों को इलाज के लिए भारत लाती है, मुफ्त चिकित्सा देती है, अनाज भेजती है—तो यह सराहनीय है। लेकिन फिर वही सवाल—किसके लिए?

क्या उन हिंदुओं के लिए भी, जिनके घर जलाए गए?
क्या उन महिलाओं के लिए भी, जिनकी अस्मिता रौंदी गई?
या मानवीय सहायता भी अब पहचान देखकर तय होती है?

CAA आया, लेकिन पाकिस्तान के हिंदुओं को बचाने की कोई ठोस कोशिश नहीं दिखी। माना जाता है कि पाकिस्तान में हिंदू अब गिने-चुने रह गए हैं। उन्हें लगभग इतिहास के हवाले कर दिया गया। बांग्लादेश के हिंदुओं के लिए तो कम से कम एक सख़्त चेतावनी ही दी जा सकती थी। वह भी नहीं दी गई। उल्टा, ढाका स्थित भारतीय हाई कमिशन को बुलाकर बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भारत को ही सख़्त संदेश दे दिया।

बुद्धिजीवी वर्ग की चयनात्मक आवाज़

यह चुप्पी केवल सरकार की नहीं है। पश्चिम बंगाल का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग वेनेजुएला पर तो लेख लिखता है, टीवी डिबेट करता है, लेकिन बांग्लादेश  में हिंदुओं पर अत्याचार के मुद्दे पर मौन साध लेता है। यह मौन किस डर से है? वैचारिक असुविधा से? या राजनीतिक गणित से?

जब एक प्रसिद्ध अभिनेत्री के पैर में मोच आती है, तो दिल्ली से ट्वीट निकल आता है। लेकिन अगर साउथ ब्लॉक से बांग्लादेश के हिंदुओं के लिए एक संवेदनशील संदेश चला जाए, तो क्या आसमान गिर जाएगा?

सवाल जो बार-बार उठेंगे

यह लेख किसी सरकार को गिराने या किसी देश को नीचा दिखाने के लिए नहीं है। यह एक नागरिक का सवाल है—क्या हमारी मानवता चयनात्मक हो गई है? क्या “विश्व मानवतावाद” का मतलब केवल वही पीड़ा है जो कैमरे में अच्छी दिखे?

जहाँ इंसानियत मर जाती है, वहाँ सिर्फ़ इंसान होने का दावा काफ़ी नहीं होता। बांग्लादेश के हिंदू भी इंसान हैं। उनकी चीखें भी उतनी ही सच्ची हैं, उनका दर्द भी उतना ही वास्तविक है।यह सवाल आज उठा है। और जब तक जवाब नहीं मिलेगा, यह सवाल बार-बार उठता रहेगा।

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!
Leave A Reply

Your email address will not be published.