40 दिन की पैरोल पर फिर बाहर आया राम रहीम
बलात्कार जैसे गंभीर अपराध में दोषी करार दिए जा चुके व्यक्ति को बार-बार पैरोल मिलना न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
समग्र समाचार सेवा
रोहतक | 05 जनवरी: बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में 20 साल की सजा काट रहा डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह एक बार फिर 40 दिन की पैरोल पर जेल से बाहर आ गया। सोमवार को रोहतक की सुनारिया जेल से रिहाई के बाद वह सफेद गाड़ियों के काफिले के साथ सिरसा स्थित डेरा मुख्यालय की ओर रवाना हुआ।
यह वही राम रहीम है, जिसे अदालत ने अपनी ही दो शिष्याओं के साथ बलात्कार का दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। ऐसे अपराधी की बार-बार पैरोल पर रिहाई न केवल पीड़ितों के घावों को कुरेदती है, बल्कि देश की न्याय व्यवस्था की गंभीरता पर भी सवाल खड़े करती है।
पैरोल या विशेष रियायत?
कानून में पैरोल को मानवीय आधार पर एक अस्थायी राहत के तौर पर देखा जाता है, लेकिन जब सजा पाए बलात्कारी को बार-बार यह सुविधा मिले और वह खुलेआम काफिले के साथ घूमता नजर आए, तो यह सवाल लाजिमी है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है?
एक आम कैदी जहाँ वर्षों तक जेल से बाहर आने का इंतजार करता है, वहीं एक प्रभावशाली अपराधी को बार-बार पैरोल मिलना समानता के सिद्धांत को कमजोर करता है।
राम रहीम की हर पैरोल पीड़ितों और महिलाओं के लिए एक नकारात्मक संदेश देती है। यह ऐसा संकेत है मानो रसूख और अनुयायियों की संख्या, अपराध की गंभीरता से ऊपर रखी जा रही हो।
बलात्कार जैसे अपराधों के खिलाफ सख्त कानून और तेज न्याय की बातें तो होती हैं, लेकिन ऐसे मामलों में दी जाने वाली रियायतें उन दावों को खोखला साबित करती हैं।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
राम रहीम की रिहाई के दौरान सुरक्षा, काफिला और सिरसा डेरे की गतिविधियां यह दिखाती हैं कि प्रशासन आज भी उसे एक “विशेष व्यक्ति” की तरह ट्रीट कर रहा है, न कि एक दोषसिद्ध अपराधी की तरह।
यह स्थिति लोकतंत्र और कानून के राज के लिए खतरनाक मिसाल बनती जा रही है।
राम रहीम की 40 दिन की नई पैरोल सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि यह सवाल है,
क्या रसूखदार दोषियों के लिए जेल भी सिर्फ एक अस्थायी ठिकाना बनकर रह गई है?
और क्या न्याय वास्तव में पीड़ितों के साथ खड़ा है, या फिर प्रभावशाली अपराधियों के सामने बेबस?