वैश्विक शासन: बदलती दुनिया में शक्ति, सहयोग और भविष्य की तलाश
इक्कीसवीं सदी में बहुध्रुवीयता, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और कमजोर पड़ते बहुपक्षवाद के बीच वैश्विक सत्ता संतुलन और सहयोग के नए रास्तों की पड़ताल
पूनम शर्मा
इक्कीसवीं सदी का विश्व ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ पुराने नियम तेजी से अप्रासंगिक होते जा रहे हैं और नए नियम अभी पूरी तरह बने नहीं हैं। इस अस्थिर अंतराल में “वैश्विक शासन” केवल एक कूटनीतिक शब्द नहीं रहा, बल्कि यह सवाल बन गया है कि दुनिया को चलाएगा कौन, कैसे और किसके हित में।
बहुध्रुवीयता से द्विध्रुवीय कक्षा तक
शीत युद्ध के बाद यह माना गया था कि दुनिया बहुध्रुवीय (Multipolar) होगी, जहाँ कई शक्तियाँ मिलकर वैश्विक निर्णय लेंगी। लेकिन हाल के वर्षों में यह धारणा कमजोर पड़ती दिख रही है। अमेरिका और चीन, दो विशाल आर्थिक और तकनीकी शक्तियाँ, वैश्विक राजनीति को अपनी-अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से खींच रही हैं। नतीजा यह है कि दुनिया “बहुध्रुवीय” होने के बजाय एक तरह की “द्विध्रुवीय कक्षा” (Orbital Bipolarity) में घूमती प्रतीत होती है।
विज्ञान और तकनीक: नई महाशक्ति की कुंजी
आज की वैश्विक प्रतिस्पर्धा टैंकों और मिसाइलों से कम, और प्रयोगशालाओं, सेमीकंडक्टर फैक्ट्रियों तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के एल्गोरिद्म से अधिक लड़ी जा रही है। अमेरिका और चीन दोनों ही यह समझ चुके हैं कि वैज्ञानिक नेतृत्व केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि सैन्य ताकत, वैचारिक प्रभाव और राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार है।
प्रश्न यह नहीं है कि कौन ज्यादा पेटेंट दर्ज करता है, बल्कि यह है कि कौन दुनिया की समस्याओं—जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य संकट, ऊर्जा सुरक्षा—का समाधान देने की क्षमता रखता है। यदि विज्ञान केवल भू-राजनीतिक हथियार बन जाए, तो मानवता का साझा भविष्य खतरे में पड़ सकता है।
बहुपक्षवाद का संकट
संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और अन्य बहुपक्षीय संस्थाएँ कभी वैश्विक सहयोग की रीढ़ मानी जाती थीं। आज वही संस्थाएँ अक्सर निष्क्रिय, धीमी और शक्तिशाली देशों की राजनीति में फँसी दिखती हैं। छोटे और मध्यम देशों के लिए विकल्प सीमित होते जा रहे हैं—वे औपचारिक रूप से स्वतंत्र हैं, लेकिन व्यवहार में किसी न किसी महाशक्ति की कक्षा में घूमने को मजबूर हैं।
यह स्थिति एक “मौन विडंबना” को जन्म देती है: सभी देश सहयोग की बात करते हैं, लेकिन विश्वास की कमी हर प्रयास को कमजोर कर देती है। बहुपक्षवाद अब विचारधारा कम और औपचारिकता अधिक बनता जा रहा है।
भारत और मध्य-स्थानों की भूमिका
इस जटिल परिदृश्य में भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका जैसे क्षेत्र केवल दर्शक नहीं हैं। भारत विशेष रूप से एक अनोखी स्थिति में है अमेरिका और चीन दोनों से संबंध रखते हुए, अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की कोशिश में।
हॉन्ग कॉन्ग जैसे शहर भी एक प्रतीक बनते हैं—जहाँ टकराव के बीच संवाद की संभावना जीवित रहती है। ये “बीच के स्थान” हमें याद दिलाते हैं कि वैश्विक राजनीति केवल शून्य-योग खेल नहीं है; सहयोग के नए ढाँचे अभी भी संभव हैं।
चीन की रणनीति और वैश्विक दक्षिण
चीन की वैश्विक रणनीति सीधी टकराव से अधिक “चयनात्मक सहभागिता” पर आधारित दिखती है। वह वैश्विक अर्थव्यवस्था में गहराई से जुड़ा है, लेकिन पश्चिमी नियमों को पूरी तरह स्वीकार करने से बचता है। बेल्ट एंड रोड जैसी पहलें विकासशील देशों के लिए अवसर भी हैं और जटिलताएँ भी।
वैश्विक दक्षिण के लिए चुनौती यह है कि वह सहायता और निर्भरता के बीच संतुलन बनाए रखे। सवाल यह नहीं कि किसके साथ खड़ा होना है, बल्कि यह है कि अपने दीर्घकालिक हितों को कैसे सुरक्षित किया जाए।
अमेरिका की आंतरिक चुनौतियाँ
अमेरिका आज भी शक्तिशाली है, लेकिन उसकी आंतरिक राजनीतिक विभाजन, नीति-निर्माण में अस्थिरता और वैश्विक विश्वसनीयता में गिरावट उसके नेतृत्व को चुनौती दे रही है। “अमेरिका फर्स्ट” जैसे दृष्टिकोण ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या वैश्विक नेतृत्व सहयोग से आता है या दबाव से।
इतिहास हमें सिखाता है कि स्थायी व्यवस्था शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि समावेशन और सम्मान से बनती है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद की गलतियाँ आज भी चेतावनी देती हैं।
आगे का रास्ता
वैश्विक शासन का भविष्य न तो पूरी तरह अतीत में है, न ही किसी एक शक्ति के हाथ में। यह भविष्य संवाद, लचीलापन और साझा जिम्मेदारी पर निर्भर करेगा। जलवायु, महामारी, साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दे सीमाएँ नहीं पहचानते और न ही उनके समाधान।
आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि प्रतिस्पर्धा को सहयोग के साथ संतुलित किया जाए। दुनिया को नए विचारों, नए संस्थानों और सबसे बढ़कर नई सोच की जरूरत है, जहाँ शक्ति से अधिक मानवता को प्राथमिकता दी जाए।
वैश्विक शासन की यह लड़ाई केवल देशों के बीच नहीं, बल्कि इस सवाल के लिए है कि हम किस तरह की दुनिया अगली पीढ़ी को सौपना चाहते हैं।