क्या हम अपनी जड़ों से दूर हो रहे हैं?
भारतीय नववर्ष बनाम 1 जनवरी: परंपरा, प्रकृति और पहचान का प्रश्न
पूनम शर्मा
हर साल 31 दिसंबर की रात जैसे ही घड़ी बारह बजाती है, पूरा देश “हैप्पी न्यू ईयर” के नारों से गूंज उठता है। आतिशबाज़ी, पार्टियाँ, शराब और शोर—मानो यही नए वर्ष का अर्थ हो। लेकिन क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचा है कि जिसे हम नया साल कह रहे हैं, वह वास्तव में हमारे जीवन, हमारी प्रकृति और हमारी संस्कृति में कुछ नया लेकर आता भी है या नहीं?
भारत: केवल भू-भाग नहीं, एक प्राचीन सभ्यता
भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता है। यहाँ समय को देखने और गिनने की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है। हमारे ऋषि–मुनियों ने काल-गणना को केवल तारीखों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे प्रकृति, खगोल विज्ञान और मानव जीवन के साथ जोड़ा। इसी परंपरा से जन्म हुआ विक्रम संवत का, जिसका आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है—यानी वह समय जब वास्तव में नया आरंभ दिखाई देता है।
1 जनवरी: एक ऐतिहासिक और राजनीतिक निर्णय
इसके विपरीत, 1 जनवरी का नया साल एक ऐतिहासिक और राजनीतिक निर्णय का परिणाम है। प्राचीन काल में बेबीलोन और रोम में भी नया वर्ष वसंत ऋतु में ही मनाया जाता था। बाद में रोमन शासक जूलियस सीज़र ने अपने प्रशासनिक हितों के अनुसार कैलेंडर बदला और 1 जनवरी को वर्ष का आरंभ घोषित कर दिया। यह तिथि न तो ऋतु परिवर्तन से जुड़ी थी, न ही खेती, न शिक्षा और न ही प्रकृति के किसी चक्र से। धीरे-धीरे यही कैलेंडर यूरोप में प्रचलित हुआ और औपनिवेशिक शासन के साथ भारत तक भी पहुँच गया।
औपनिवेशिक प्रभाव और बदली हुई सोच
अंग्रेज़ों के शासनकाल में केवल राजनीतिक सत्ता ही नहीं बदली, बल्कि शिक्षा, इतिहास और सोच पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। गुरुकुल परंपरा कमजोर हुई, भारतीय इतिहास को नए दृष्टिकोण से लिखा गया और पश्चिमी कैलेंडर को आधुनिकता का प्रतीक मान लिया गया। नतीजा यह हुआ कि हम अपनी ही परंपराओं को पिछड़ा और दूसरों की परंपराओं को उन्नत समझने लगे।
पंचांग आज भी हमारे जीवन का आधार
आज भी हमारे जीवन के महत्वपूर्ण संस्कार और निर्णय अंग्रेज़ी कैलेंडर से नहीं, बल्कि पंचांग से तय होते हैं। बच्चे का नामकरण, विवाह, मुहूर्त, व्रत-त्योहार, ग्रह-दोष, यहाँ तक कि मृत्यु के बाद के संस्कार भी भारतीय काल-गणना के अनुसार होते हैं। रामनवमी, जन्माष्टमी, दीपावली, होली, नवरात्रि—इन सबका अंग्रेज़ी कैलेंडर में कोई स्थायी स्थान नहीं है। फिर भी हम उसी कैलेंडर के बदलने को “नया साल” मानकर उत्सव मनाते हैं।
1 जनवरी बनाम चैत्र नववर्ष: फर्क साफ़ है
जरा 1 जनवरी को देखिए—न मौसम बदलता है, न ऋतु। न फसल कटती है, न बोई जाती है। न विद्यार्थी की कक्षा बदलती है, न प्रकृति में कोई नया संकेत दिखाई देता है। इसके विपरीत, चैत्र मास के आगमन पर पेड़ों में नई कोपलें आती हैं, खेतों में नई फसल की तैयारी होती है, सूर्य की गति में परिवर्तन होता है और वातावरण में एक स्वाभाविक नवजीवन का संचार होता है। यही कारण है कि भारतीय नववर्ष केवल तारीख का बदलना नहीं, बल्कि जीवन के नए चक्र की शुरुआत है।
उत्सव की भावना: उपभोग या आत्मचिंतन?
यह भी सच है कि 1 जनवरी का उत्सव अक्सर उपभोग और उच्छृंखलता से जुड़ गया है—जहाँ आनंद कम और अति अधिक दिखाई देती है। इसके उलट, भारतीय नवसंवत आत्मचिंतन, पूजा, स्वच्छता और सकारात्मक ऊर्जा के साथ मनाया जाता है। घरों की सफ़ाई होती है, मंदिरों में आरती गूंजती है और मन में नए संकल्प जन्म लेते हैं।
परंपरा बनाम विरोध नहीं, पहचान का प्रश्न
यह कहना किसी अन्य संस्कृति या धर्म का विरोध नहीं है। दुनिया के अलग-अलग समाज अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार समय को देखते हैं, और यह स्वाभाविक भी है। प्रश्न केवल इतना है कि क्या हमें अपनी ही वैज्ञानिक, प्रकृति-आधारित और जीवन से जुड़ी काल-गणना को भूल जाना चाहिए?
आधुनिकता और सांस्कृतिक आत्मा का संतुलन
हिन्दू नववर्ष मनाना किसी को 1 जनवरी की शुभकामनाएँ देने से नहीं रोकता। लेकिन अपनी पहचान को समझना और उसे सम्मान देना हमारा दायित्व है। अंग्रेज़ी कैलेंडर प्रशासन और वैश्विक संवाद के लिए उपयोगी हो सकता है, पर हमारी सांस्कृतिक आत्मा आज भी पंचांग में ही बसती है।
नया वही, जो सचमुच नया हो
शायद अब समय आ गया है कि हम ठहरकर सोचें—हम किस परंपरा को सिर्फ़ आदत में ढो रहे हैं और किसे सचमुच जी रहे हैं। नया साल वही होना चाहिए जो हमारे जीवन में सचमुच “नया” लेकर आए। भारतीय नवसंवत यही अवसर देता है—प्रकृति, संस्कृति और स्वयं से जुड़ने का।
सोचिए, समझिए और अपनी जड़ों को पहचानिए।