अरावली कमजोर हुई तो उत्तर भारत पर क्या पड़ेगा असर?

नई परिभाषा से अरावली का बड़ा हिस्सा संरक्षण से बाहर, पर्यावरण संतुलन पर संकट

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  • अरावली की नई परिभाषा से अधिकांश पहाड़ियाँ कानूनी सुरक्षा खो सकती हैं।
  • खनन, निर्माण और जंगल कटाई की गतिविधियाँ बढ़ने की आशंका।
  • अरावली उत्तर भारत के मौसम, पानी और हवा का संतुलन संभालती है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार असर सिर्फ पर्यावरण नहीं, मानव जीवन तक पहुँचेगा।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली | 22 दिसंबर: भारत की अरावली पर्वत श्रृंखला को अक्सर केवल पहाड़ों के रूप में देखा जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि यही श्रृंखला उत्तर भारत के लिए जीवन रेखा का काम करती है। हाल के दिनों में अरावली को लेकर उठी नई परिभाषा ने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है।

नई परिभाषा से क्यों बढ़ी चिंता?
प्रस्तावित परिभाषा के अनुसार अब केवल वही भू-भाग अरावली माने जाएंगे, जिनकी ऊंचाई जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव से अरावली का बड़ा हिस्सा संरक्षण कानूनों से बाहर हो सकता है।

ऐसी स्थिति में खनन, रियल एस्टेट परियोजनाओं और जंगलों की कटाई पर नियंत्रण कमजोर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

उत्तर भारत के लिए अरावली क्यों है जरूरी?
अरावली दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रंखलाओं में शामिल है और यह गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है।

ये पहाड़ियाँ प्राकृतिक ढाल की तरह काम करती हैं और पानी, हवा व जैव विविधता के संतुलन को बनाए रखती हैं। अगर यह ढाल कमजोर हुई, तो इसका असर पूरे उत्तर भारत पर दिखाई देगा।

5 बिंदुओं में समझिए अरावली के बिना क्या बदल जाएगा

रेगिस्तान का फैलाव तेज होगा
अरावली थार रेगिस्तान को उत्तर और पूर्व की ओर बढ़ने से रोकने में अहम भूमिका निभाती है। इसके कमजोर होने पर खेती योग्य भूमि बंजर होने लगेगी और सूखे की समस्या गहराएगी।

मौसम का मिजाज बिगड़ेगा
अरावली हवाओं की दिशा और नमी को प्रभावित करती है। इसके नष्ट होने से बेमौसम बारिश, कभी अतिवृष्टि तो कभी लंबे सूखे की स्थिति बन सकती है, जिसका सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ेगा।

जल संकट होगा और गहरा
अरावली की चट्टानें बारिश के पानी को रोककर धीरे-धीरे जमीन में  पहुँचाती हैं। इससे दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान के कई इलाकों में भूजल स्तर बना रहता है। इसके कमजोर होने से पानी की किल्लत बढ़ेगी।

हवा और स्वास्थ्य पर असर
पश्चिमी इलाकों से आने वाली धूल और प्रदूषण को अरावली काफी हद तक रोकती है। इसके न रहने पर वायु गुणवत्ता और खराब होगी, जिससे साँस से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ेगा।

जैव विविधता पर सीधा हमला
अरावली क्षेत्र में सैकड़ों प्रजाति के पेड़-पौधे, पक्षी और जीव-जंतु पाए जाते हैं। जंगलों के कटने से पूरा इकोसिस्टम प्रभावित होगा और फूड चेन असंतुलित हो जाएगी।

निष्कर्ष
अरावली का कमजोर होना सिर्फ पहाड़ों का नुकसान नहीं है, बल्कि पानी, हवा, खेती और स्वास्थ्य से जुड़ा बड़ा संकट है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो उत्तर भारत को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

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