पूनम शर्मा
सेमीकंडक्टर चिप्स आज की दुनिया का अदृश्य इंजन हैं। मोबाइल फोन से लेकर मिसाइल सिस्टम तक, कारों से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक—हर आधुनिक तकनीक की धड़कन इन्हीं चिप्स से चलती है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या भारत इस वैश्विक चिप रेस में अमेरिका, ताइवान और चीन जैसे दिग्गजों की बराबरी कर सकता है, या कम से कम उनके विकल्प के रूप में उभर सकता है?
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने इस दिशा में जिस तरह का राजनीतिक और औद्योगिक संकल्प दिखाया है, वह पहले कभी नहीं देखा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2021 में घोषित 10 अरब डॉलर की सेमीकंडक्टर योजना इसी बदले हुए दृष्टिकोण का प्रतीक है।
गुजरात से कैलिफ़ोर्निया तक: एक प्रतीकात्मक शुरुआत
अक्टूबर 2025 में गुजरात की एक अपेक्षाकृत छोटी कंपनी—केन्स सेमीकॉन—ने कैलिफ़ोर्निया के एक ग्राहक को चिप मॉड्यूल्स की पहली खेप भेजी। यह कोई बड़ा व्यावसायिक धमाका नहीं था, लेकिन भारत के लिए यह एक मनोवैज्ञानिक मोड़ था। पहली बार “मेड इन इंडिया” चिप्स वैश्विक सप्लाई चेन में दाख़िल हुईं।
यह परियोजना जापानी और मलेशियाई तकनीकी साझेदारों के साथ मिलकर बनी और सरकार की सब्सिडी से संभव हुई। यही भारत की मौजूदा रणनीति का मूल है—तकनीक बाहर से लाओ, निर्माण देश में करो।
भारत की रणनीति: ‘लीडिंग एज’ नहीं, ‘मॅच्योर चिप्स’
अमेरिका चिप डिजाइन में आगे है, ताइवान फैब्रिकेशन में और चीन पैकेजिंग व असेंबली में। भारत फिलहाल इन तीनों में शीर्ष पर नहीं है, इसलिए उसने एक व्यावहारिक रास्ता चुना है—मॅच्योर चिप्स।
28nm से 110nm की ये चिप्स भले ही AI सुपरकंप्यूटर में न लगें, लेकिन कारों, घरेलू उपकरणों, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और इंडस्ट्रियल मशीनों की रीढ़ हैं। वैश्विक मांग का बड़ा हिस्सा इन्हीं से आता है।
गुजरात में बन रही भारत की पहली वाणिज्यिक फाउंड्री—टाटा समूह और ताइवान की PSMC के सहयोग से—इसी सेगमेंट पर केंद्रित है। इंटेल जैसे अमेरिकी दिग्गज का संभावित ग्राहक के रूप में जुड़ना इस परियोजना को और विश्वसनीय बनाता है।
असेंबली, टेस्टिंग और पैकेजिंग: आसान प्रवेश द्वार
भारत की सेमीकंडक्टर नीति का दूसरा बड़ा स्तंभ है—ATP (Assembly, Testing, Packaging)। यह चीन का मजबूत गढ़ रहा है, लेकिन तकनीकी दृष्टि से इसमें प्रवेश अपेक्षाकृत आसान है और निवेश भी कम लगता है।
माइक्रॉन, टाटा और असम व गुजरात में बन रही ATP यूनिट्स इसी सोच का परिणाम हैं। हालांकि, इनमें से अधिकांश परियोजनाएं तय समय से पीछे चल रही हैं। यह देरी बताती है कि केवल पैसा और नीति पर्याप्त नहीं—जमीनी स्तर पर निष्पादन भारत की पुरानी कमजोरी रही है।
घरेलू माँग : भारत की असली ताकत
भारत की चिप नीति केवल निर्यात केंद्रित नहीं है। देश में सेमीकंडक्टर की घरेलू मांग 50 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंचने वाली है। आज भारत अपनी जरूरत की अधिकांश चिप्स आयात करता है—खासतौर पर चीन से।
अगर भारत 28nm जैसी चिप्स भी देश में बना और पैकेज कर ले, तो यह व्यापार घाटे, आपूर्ति सुरक्षा और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा—तीनों के लिए बड़ा लाभ होगा।
लेकिन चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी हैं ,भारत का सेमीकंडक्टर सपना कुछ कठोर सच्चाइयों से भी टकराता है।
पहली, उन्नत तकनीक की कमी। 7nm या 3nm चिप्स बनाना केवल पूंजी का नहीं, दशकों के अनुभव और अत्यंत सटीक इंजीनियरिंग का खेल है। इसमें भारत का घरेलू खिलाड़ी फिलहाल प्रतिस्पर्धी नहीं है।
दूसरी, वैश्विक सब्सिडी युद्ध। अमेरिका और चीन इस क्षेत्र में भारत से कई गुना ज्यादा पैसा झोंक रहे हैं। तीसरी, नीतिगत अनिश्चितता—टैरिफ, व्यापार तनाव और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप विदेशी निवेशकों को सतर्क बनाते हैं।
डिजाइन में भारत मजबूत, लेकिन खतरा मंडरा रहा है दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत चिप डिजाइन इंजीनियर भारतीय हैं। यह भारत की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन चीन और मलेशिया जैसी अर्थव्यवस्थाएं आक्रामक टैक्स इंसेंटिव देकर इस प्रतिभा को आकर्षित कर रही हैं। अगर भारत ने R&D प्रोत्साहन नहीं बढ़ाए, तो यह बढ़त भी धीरे-धीरे खत्म हो सकती है।
निष्कर्ष: बराबरी नहीं, लेकिन प्रासंगिक खिलाड़ी बन सकता है भारत
साफ शब्दों में कहें तो भारत निकट भविष्य में अमेरिका, ताइवान या चीन को “पकड़” नहीं पाएगा। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भारत एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक केंद्र बन सकता है—खासतौर पर मॅच्योर चिप्स और ATP सेगमेंट में।
वैश्विक चिप रेस में हर देश को विजेता नहीं बनना होता; कई बार भरोसेमंद खिलाड़ी बनना ही सबसे बड़ी जीत होती है। अगर