पूनम शर्मा
12 दिसंबर की दोपहर ढाका की व्यस्त सड़कों पर जब दो हेलमेटधारी हमलावरों ने शरीफ उस्मान हादी की कनपटी पर गोली मारी, तो वह सिर्फ एक राजनीतिक कार्यकर्ता की हत्या नहीं थी। वह उस नाजुक पुल को ढहाने जैसा था, जो भारत और बांग्लादेश के बीच अगस्त 2024 की क्रांति के बाद बमुश्किल टिका हुआ था। सिंगापुर के अस्पताल में हादी की मौत के बाद अब बांग्लादेश की गलियां “दिल्ली या ढाका? ढाका, ढाका!” के नारों से गूंज रही हैं। यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि पड़ोस में पनप रहे उस गहरे भारत-विरोधी राष्ट्रवाद का प्रतीक है, जो अब सीमाओं को लांघने की धमकी दे रहा है।
एक ‘शहीद’ की वैचारिकी और “वृहद बांग्लादेश” का जिन्न
34 वर्षीय शरीफ उस्मान हादी । वे ‘इंकलाब मंच’ से था और उस छात्र आंदोलन की उपज था जिसने शेख हसीना के 15 साल के शासन को उखाड़ फेंका था। हादी की लोकप्रियता का आधार उसकी वह उग्र राष्ट्रवादी छवि थी, जो बांग्लादेश की संप्रभुता को “भारतीय आधिपत्य” के सीधे विरोध में देखती थी।
अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले, हादी ने सोशल मीडिया पर “वृहद बांग्लादेश” (Greater Bangladesh) का एक विवादास्पद मानचित्र साझा किया था। इस मानचित्र में न केवल वर्तमान बांग्लादेश, बल्कि भारत के पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के “सात राज्यों” (Seven Sisters) को भी बांग्लादेश के हिस्से के रूप में दिखाया गया था।
ऐतिहासिक रूप से, यह विचार 1947 के ‘संयुक्त बंगाल’ प्रस्ताव की याद दिलाता है, जिसे हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने रखा था। दशकों तक यह अवधारणा केवल कट्टरपंथी समूहों तक सीमित थी, लेकिन आज के अस्थिर बांग्लादेश में इसे मुख्यधारा की हवा मिल रही है। अप्रैल 2025 में ढाका विश्वविद्यालय में इसी तरह के मानचित्र लहराए जाने पर भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद में गहरी चिंता व्यक्त की थी। हादी इसी बढ़ती हुई भावना का पोस्टर बॉय बन चक था ।
हत्या, आरोप और कूटनीतिक गतिरोध
हादी की हत्या के बाद बांग्लादेशी जाँच एजेंसियों ने त्वरित दावा किया कि हमलावर—फैसल करीम मसूद और आलमगीर शेख—अवामी लीग के सक्रिय सदस्य थे और हत्या के तुरंत बाद सीमा पार कर भारत भाग गए। बिना किसी ठोस सबूत के लगाए गए इन आरोपों ने आग में घी का काम किया है।
भारत ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि उसकी धरती का इस्तेमाल कभी भी मित्र देश के हितों के खिलाफ नहीं होने दिया गया है। लेकिन ढाका और दिल्ली के बीच कूटनीतिक पारा अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया है। दोनों देशों ने एक-दूसरे के उच्चायुक्तों को तलब कर कड़ा प्रतिवाद दर्ज कराया है।
सड़कों पर आक्रोश: ‘सेवन सिस्टर्स’ को “आजाद” करने की धमकी
हादी की मौत की खबर फैलते ही बांग्लादेश के प्रमुख शहर हिंसा की चपेट में आ गए। ढाका के शाहबाग में जुटी भीड़ ने न केवल भारत विरोधी नारेबाजी की, बल्कि ‘प्रथम आलो’ और ‘डेली स्टार’ जैसे उन मीडिया संस्थानों पर भी हमले किए जिन्हें पुरानी सरकार का समर्थक माना जाता है। डराने वाली बात यह है कि सेना की मौजूदगी के बावजूद ‘डेली स्टार’ की इमारत को आग के हवाले कर दिया गया।
चटगाँव और राजशाही में प्रदर्शनकारियों ने भारत के सहायक उच्चायोग को घेर लिया। वहाँ लगे नारे—”बाबर के रास्ते पर चलो, सेवन सिस्टर्स को आजाद करो”—भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। यह केवल भीड़ का गुस्सा नहीं है, बल्कि एक संगठित वैचारिक बदलाव है, जहां भारत के साथ साझा इतिहास को भुलाकर उसे एक “शत्रु राष्ट्र” के रूप में चित्रित किया जा रहा है।
हसीना का साया और खंडित होते रिश्ते
भारत और बांग्लादेश के बीच वर्तमान तनाव की जड़ें 5 अगस्त 2024 की घटनाओं में छिपी हैं। शेख हसीना के शासनकाल को भारत के लिए “स्वर्ण युग” माना जाता था, जहां आतंकवाद और कनेक्टिविटी पर अभूतपूर्व सहयोग मिला। लेकिन जब हसीना को देश छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी, तो बांग्लादेशी प्रदर्शनकारियों की नजर में भारत एक “तानाशाह” का रक्षक बन गया।
मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार बार-बार हसीना के प्रत्यर्पण की माँग कर रही है। हदी जैसे कार्यकर्ताओं ने इसी भावना को भुनाया। उनके लिए भारत का विरोध करना अब देशभक्ति का पर्याय बन चुका है।
भू-राजनीतिक बिसात और उभरते नए समीकरण
बांग्लादेश में बढ़ती अस्थिरता का लाभ उठाने के लिए क्षेत्रीय शक्तियां भी सक्रिय हैं। जहाँ एक ओर हिफाजत-ए-इस्लाम और अल-कायदा से जुड़े नेटवर्क अपनी जड़ें जमा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर चीन अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। तिस्ता नदी परियोजना के लिए चीन का 1 बिलियन डॉलर का प्रस्ताव और जून 2025 में हुआ ‘चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश’ त्रिपक्षीय शिखर सम्मेलन इस बात का संकेत है कि ढाका अब नई दिल्ली के प्रभाव क्षेत्र से दूर जा रहा है।
निष्कर्ष: संतुलन की चुनौती
मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस ने हादी को “फासीवाद के खिलाफ लड़ने वाला अमर सैनिक” बताकर जनता की भावनाओं को तो संतुष्ट कर दिया है, लेकिन उनके सामने एक कठिन वास्तविकता है। बांग्लादेश अपनी 17% बिजली और 14 बिलियन डॉलर के व्यापार के लिए भारत पर निर्भर है।
हादी की हत्या ने जिस राष्ट्रवाद को जन्म दिया है, वह एक दोधारी तलवार है। यदि यूनुस सरकार ने इस उग्रवाद को नियंत्रित नहीं किया, तो यह न केवल भारत के साथ रिश्तों को स्थायी रूप से खत्म कर देगा, बल्कि खुद बांग्लादेश को एक ऐसे कट्टरपंथ की खाई में धकेल देगा जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं होगी। दक्षिण एशिया के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर, शांति की कुंजी अब ढाका के विवेक और दिल्ली के धैर्य पर टिकी है।