पूनम शर्मा
तुष्टीकरण के दौर से कानून के राज तक
भारत की धरती ने सदियों से सहिष्णुता और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का पाठ पढ़ाया है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इस सहिष्णुता को देश की कमजोरी मान लिया गया। एक विशेष वर्ग को खुश करने की राजनीति ने ऐसे तत्वों को जन्म दिया जो सरेआम मंचों से देश की एकता को चुनौती देने लगे। “सर तन से जुदा” जैसे नारों ने समाज के भीतर एक भय और अराजकता का माहौल पैदा करने का प्रयास किया। लेकिन हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय से जो आवाज आई है, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब भारत न तो झुकेगा और न ही अपने संविधान के साथ खिलवाड़ होने देगा।
जस्टिस अरुण कुमार सिंह: एक साहसिक न्यायिक हस्तक्षेप
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह ने मौलाना तौकीर रजा की जमानत याचिका पर जो टिप्पणी की और जो निर्णय सुनाया, वह केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि भारत की अखंडता का घोषणापत्र है। जस्टिस सिंह ने दो टूक शब्दों में कहा कि “सर तन से जुदा” का नारा लगाना केवल एक भड़काऊ बयान नहीं है, बल्कि यह भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिए एक सीधा खतरा है।
अदालत ने जिस स्पष्टता के साथ इस प्रकार की कट्टरता को ‘राष्ट्र के लिए खतरा’ माना, वह सराहनीय है। जस्टिस अरुण कुमार सिंह जी का यह निर्णय उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो धर्म की आड़ में नफरत का व्यापार करते हैं। उन्होंने साफ कर दिया कि भारत का संविधान किसी को भी धार्मिक भावनाओं के नाम पर हिंसा भड़काने की अनुमति नहीं देता।
नूपुर शर्मा प्रकरण से योगी मॉडल तक का सफर
हमें याद करना होगा कि नूपुर शर्मा प्रकरण के दौरान किस तरह से देश को आग में झोंकने की कोशिश की गई थी। उस समय मौलाना तौकीर रजा जैसे लोगों को लगने लगा था कि वे भीड़ के तंत्र से न्यायपालिका और सरकार को दबा लेंगे। लेकिन उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व वाली सरकार ने इस भ्रम को तोड़ दिया। मुख्यमंत्री योगी जी ने तब भी स्पष्ट कहा था कि “शायद मौलाना भूल गए हैं कि सरकार किसकी है।”
आज वही संकल्प न्यायपालिका के निर्णयों में भी झलक रहा है। जब कार्यपालिका और न्यायपालिका एक ही सुर में राष्ट्रविरोधी तत्वों के विरुद्ध खड़ी होती हैं, तभी एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण होता है। जस्टिस अरुण कुमार सिंह का यह निर्णय उसी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का न्यायिक विस्तार है।
कट्टरता का अंतरराष्ट्रीय और वैचारिक गठजोड़
यह समझना आवश्यक है कि मौलाना तौकीर रजा जैसे लोग अकेले नहीं हैं। इनके पीछे एक पूरा तंत्र काम करता है। हाल ही में पाकिस्तान में एक हिंदू की निर्मम हत्या हुई और वहां भी वही शब्दावली इस्तेमाल की गई जो तौकीर रजा यहाँ कर रहे थे। यह साबित करता है कि कट्टरवाद की कोई सीमा नहीं होती और यह एक वैश्विक बीमारी है।
सबसे दुखद पहलू ‘छद्म-धर्मनिरपेक्षता’ (Pseudo-Secularism) का है। भारत के वामपंथी और तथाकथित सेक्युलर नेता इन मौलानाओं के अनैतिक कृत्यों पर मौन साध लेते हैं। इसे ‘सिख-उल-हरीसाम’ (मानसिक गुलामी या बीमारी) की संज्ञा देना गलत नहीं होगा। ये लोग लोकतंत्र की दुहाई तब देते हैं जब उन्हें बचाना हो, लेकिन वही लोग उन इस्लामी देशों पर चुप रहते हैं जहाँ मानवाधिकारों का गला घोंटा जाता है। भारत के भीतर इन कट्टरपंथियों और वामपंथियों का जो ‘अवैध वैचारिक संबंध’ पनप रहा है, वह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
वक्फ और भूमि अधिग्रहण की राजनीति पर चोट
अक्सर देखा गया है कि धार्मिक पहचान का उपयोग करके अवैध संपत्तियों पर कब्जा किया जाता है। चाहे वह गुजरात के मंदिर परिसर में मज़ार बनाने की कोशिश हो या वक्फ के नाम पर पूरे गाँवों को अपनी संपत्ति घोषित करना। जस्टिस अरुण कुमार सिंह का यह रुख ऐसे भू-माफियाओं और कट्टरपंथियों के मनोबल को तोड़ने वाला है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि भारत ‘शरिया’ से नहीं, बल्कि ‘संविधान’ से चलेगा।
न्यायपालिका में नया विश्वास
पिछले कुछ वर्षों में एक विमर्श गढ़ा गया कि न्यायपालिका पर दबाव है। लेकिन सच्चाई इसके उलट है। न्यायपालिका अब समाज की नब्ज को पहचान रही है। न्यायाधीश भी इसी समाज से आते हैं और वे देख रहे हैं कि किस तरह ‘नफरती विमर्श’ के जरिए देश में अराजकता पैदा की जा रही है। 2017 से पहले उत्तर प्रदेश में किसी मौलाना को हाथ लगाना भी पुलिस के लिए चुनौतीपूर्ण होता था, लेकिन आज कानून का राज सर्वोपरि है।
निष्कर्ष: राष्ट्रहित सर्वोपरि
मौलाना तौकीर रजा की जमानत याचिका खारिज होना और कोर्ट की सख्त टिप्पणी यह दर्शाती है कि अब “ग़ुस्ताख़-ए-नबी” के नाम पर दी जाने वाली धमकियाँ जेल की सलाखों के पीछे पहुँचाएँगी। जस्टिस अरुण कुमार सिंह जी को उनके इस युगांतकारी निर्णय के लिए साधुवाद दिया जाना चाहिए। उन्होंने करोड़ों भारतीयों के मन में यह विश्वास जगाया है कि देश की संप्रभुता के साथ समझौता करने वालों की जगह केवल जेल है।
यह समय है कि हम सब दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ऐसे निर्णयों का स्वागत करें। भारत की एकता तभी सुरक्षित रहेगी जब कानून का डर अपराधियों और नफरत फैलाने वालों के मन में होगा, न कि आम नागरिक के मन में।