अदृश्य मोर्चा: ‘जमात-ए-मोमिनात’ और हाइब्रिड आतंकवाद का उभरता खतरा

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पूनम शर्मा
जम्मू-कश्मीर में दशकों से अलगाववाद और आतंकवाद का चेहरा पत्थरबाजी और बंदूकों वाले पुरुषों तक सीमित था। बुरहान वानी जैसे चेहरों को युवाओं के सामने ‘पोस्टर बॉय’ बनाकर पेश किया जाता था। लेकिन, हाल के वर्षों में भारतीय खुफिया एजेंसियों ने सीमा पार से संचालित होने वाली रणनीति में एक बहुत बड़ा और खतरनाक बदलाव पकड़ा है। पुंछ से शहनाज़ अख्तर नाम की महिला जो पाकिस्तान की जाइशए मोमीनत की कमानडर है भारत की खुफिया एजेंसियों  द्वारा पकड़ी गई है ।  यह अब आतंकवाद की रणनीति में बड़े बदलाव का सूचक है । अब युद्ध का मैदान सिर्फ पहाड़ और वादियां नहीं, बल्कि घरों के भीतर और पेशेवर क्षेत्रों तक फैल गया है। इस नई और घातक रणनीति का नाम है— ‘जमात-ए-मोमिनात’।

यह केवल एक नया आतंकी गुट नहीं है, बल्कि यह सोवियत संघ (USSR) के शीत युद्ध कालीन ‘रेड स्पैरो’ (Red Sparrow) प्रोग्राम का एक आधुनिक, कट्टरपंथी और स्थानीय संस्करण है।

1. रेड स्पैरो से मोमिनात तक: जासूसी का रूसी खाका

‘रेड स्पैरो’ रणनीति का मूल आधार महिलाओं का उपयोग जासूसी और घुसपैठ के लिए करना था। सोवियत केजीबी (KGB) महिलाओं को पश्चिमी देशों के उच्च अधिकारियों को रिझाने और महत्वपूर्ण सूचनाएं निकालने के लिए प्रशिक्षित करती थी।

पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) ने इसी अवधारणा को अपनाते हुए ‘जमात-ए-मोमिनात’ का गठन किया है। इसका मुख्य उद्देश्य सुरक्षा बलों के उस ‘ब्लाइंड स्पॉट’ (Blind Spot) का फायदा उठाना है, जहाँ महिलाओं पर शक करना कठिन होता है। पारंपरिक भारतीय समाज में बुर्का पहनी हुई महिला या डॉक्टर जैसी पेशेवर महिला को सुरक्षा जाँच  में उतनी सख्ती का सामना नहीं करना पड़ता, जितनी एक युवक को करना पड़ता है। आतंकी इसी ‘सांस्कृतिक संवेदनशीलता’ को हथियार बना रहे हैं।

2. नेतृत्व और कट्टरपंथ का जाल: सादिया अजहर की भूमिका

इस पूरे मॉड्यूल की कमान सादिया अजहर के हाथों में है, जो जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर की बहन है। सादिया का नेतृत्व इस समूह को न केवल धार्मिक मान्यता देता है, बल्कि इसे सीधे तौर पर पाकिस्तानी सेना और आईएसआई (ISI) के संसाधनों से जोड़ता है।

भर्ती की प्रक्रिया बेहद संगठित है और इसमें लगभग 4,000 महिलाओं को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए दो प्रमुख पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं:

दौर-ए-तज़किया (शारीरिक और वैचारिक पाठ्यक्रम): यह एक कठोर ट्रेनिंग कैंप है जहाँ महिलाओं को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने के साथ-साथ उनका वैचारिक ब्रेनवॉश किया जाता है। उन्हें सिखाया जाता है कि देश के खिलाफ हथियार उठाना उनका धार्मिक कर्तव्य है।

अल-फेल (ऑनलाइन मॉड्यूल): आज के डिजिटल युग में सादिया अजहर ने ‘अल-फेल’ जैसे ऑनलाइन कोर्स शुरू किए हैं। इसके जरिए शिक्षित महिलाओं को अपनी पहचान छिपाने, कोडित भाषा (Encryption) में बात करने और खुफिया जानकारी जुटाने की ट्रेनिंग दी जा रही है।

पुंछ में पकड़ी गई महिला कमांडर शहनाज़ अख्तर इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। जाँच  में खुलासा हुआ कि वह केवल एक मोहरा नहीं थी, बल्कि पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों के साथ बैठकें कर रही थी।

3. ‘घुसपैठिया डॉक्टर’ और पहचान का संकट

जमात-ए-मोमिनात का एक और खतरनाक पहलू ‘लेडी डॉक्टर’ मॉड्यूल है। लाल किला हमले के दौरान भी ऐसी महिलाओं की भूमिका सामने आई थी। ये महिलाएं समाज के उच्च स्तरों में आसानी से घुल-मिल जाती हैं। इनके जरिए विस्फोटक पहुंचाना, आतंकियों को शरण देना और महत्वपूर्ण स्थानों की रेकी करना बहुत आसान हो जाता है क्योंकि एक डॉक्टर या शिक्षित महिला पर कोई भी शक नहीं करता।

इन महिलाओं को अलग-अलग श्रेणियों में बाँटा  गया है:

रेकी मिशन: सुरक्षा बलों के काफिलों और सरकारी इमारतों की निगरानी करना।

सुसाइड मिशन (आत्मघाती दस्ता): कट्टरपंथ की उस पराकाष्ठा पर ले जाना जहाँ वे खुद को उड़ाने के लिए तैयार हो जाएं।

लॉजिस्टिक्स: बुर्के या घरेलू सामान की आड़ में ग्रेनेड और छोटे हथियार एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना।

4. रणनीतिक जासूसी और ‘हनी-ट्रैपिंग’

यह मॉड्यूल केवल हथियारों तक सीमित नहीं है। लेख में स्पष्ट रूप से चीन और पाकिस्तान की ‘हनी-ट्रैपिंग’ (Honey Trapping) रणनीतियों का उल्लेख है। चीन जिस तरह से वैश्विक स्तर पर राजनयिकों और टेक दिग्गजों को महिला एजेंटों के जरिए फंसाता है, वही मॉडल अब भारत के खिलाफ अपनाया जा रहा है।

भारतीय नौसेना के एडमिरल का मामला इसका एक काला अध्याय है। ‘अल-तकिया’ (Al-Takiya) के सिद्धांत के तहत इन महिलाओं को झूठ बोलने और धोखा देने की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। जब इनमें से कोई महिला पकड़ी जाती है या मारी जाती है, तो संगठन उसे ‘शहीद’ बताकर अन्य महिलाओं को उकसाने के लिए प्रोपेगेंडा टूल की तरह इस्तेमाल करता है।

5. संवैधानिक और सुरक्षा चुनौतियां

जमात-ए-मोमिनात का उदय भारतीय सुरक्षा तंत्र के लिए एक दोधारी तलवार जैसा है। भारतीय संविधान के तहत राज्य को राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा करनी है, लेकिन महिलाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई को अक्सर मानवाधिकारों और धार्मिक भावनाओं से जोड़कर विवाद पैदा किया जाता है।

कानून व्यवस्था बनाम संवेदनशीलता: यदि सुरक्षा बल महिलाओं की अधिक जाँच  करते हैं, तो अलगाववादी इसे ‘उत्पीड़न’ का नाम देकर स्थानीय आबादी को भड़काने की कोशिश करते हैं।

खुफिया तंत्र का आधुनिकीकरण: इस खतरे से निपटने के लिए भारत को अधिक महिला खुफिया अधिकारियों और फील्ड एजेंटों की आवश्यकता है, जो महिला-विशिष्ट क्षेत्रों में पैठ बना सकें।

निष्कर्ष: एक अदृश्य युद्ध

अंततः,  ‘जमात-ए-मोमिनात’ जैसे मॉड्यूल यह दर्शाते हैं कि आतंकवाद अब अपनी खाल बदल चुका है। यह अब केवल सीमा पर होने वाली गोलीबारी नहीं है, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक युद्ध है। पाकिस्तान अपनी बेटियों को चीन को बेचने से लेकर उन्हें सुसाइड बॉम्बर बनाने तक किसी भी हद तक जा रहा है। भारत के लिए यह पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर एक नई और बेहद जटिल चुनौती है, जिसका मुकाबला केवल हथियारों से नहीं, बल्कि गहरी बुद्धिमत्ता और सतर्कता से ही किया जा सकता है।

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