पूनम शर्मा
दक्षिण एशिया की भू-राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ कूटनीति की मेज से ज्यादा हलचल सड़कों और सैन्य गलियारों में दिखाई दे रही है। बांग्लादेश में जारी अस्थिरता, पाकिस्तान की आंतरिक छटपटाहट और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ गढ़े जा रहे ‘नैरेटिव’ की कड़ियां जोड़ें, तो एक धुंधली लेकिन खतरनाक तस्वीर उभरती है। ऐसा प्रतीत होता है कि दिसंबर के ऐतिहासिक महीने में, जब भारत अपनी ‘विजय’ का जश्न मनाता है, कुछ ताकतें उसी बांग्लादेश को भारत के खिलाफ एक ‘लॉन्चिंग पैड’ बनाने की कोशिश में जुटी हैं।
बांग्लादेश: क्या ढाका में ‘तेहरान 1979’ दोहराने की साजिश है?
बांग्लादेश में मौजूदा हालात केवल छात्रों का आंदोलन भर नहीं हैं, बल्कि यह एक गहरी रणनीतिक बिसात का हिस्सा जान पड़ते हैं। हाल की घटनाएँ , विशेष रूप से भारतीय उच्चायोग (High Commission) को निशाना बनाना, एक सोची-समझी रणनीति की ओर इशारा करती हैं। जानकार इस स्थिति की तुलना 1979 के ईरान संकट से कर रहे हैं, जहाँ अमेरिकी दूतावास को 444 दिनों तक बंधक बनाकर पूरी दुनिया को असहाय कर दिया गया था।
ढाका में भारतीय उच्चायोग की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वहाँ तक पहुँचने वाला रास्ता अन्य दूतावासों के करीब से भी गुजरता है। इसके बावजूद, केवल भारतीय संपत्तियों पर हमले का प्रयास यह दर्शाता है कि भारत की उपस्थिति को वहाँ ‘असहज’ बनाने की कोशिश की जा रही है। उस्मान जैसे लोकप्रिय स्थानीय चेहरों की हत्या और उसके बाद सोशल मीडिया पर उसका उन्माद फैलाना, जनता को भारत के विरुद्ध खड़ा करने का एक टूल बन गया है। लक्ष्य स्पष्ट है: फरवरी के चुनावों से पहले भारत को बांग्लादेश के आंतरिक मामलों से पूरी तरह बेदखल कर देना और वहां ‘जमात’ जैसे तत्वों को पुनर्जीवित करना।
रक्षा सौदों की आड़ में सैन्य नियंत्रण का खेल
बांग्लादेश द्वारा ‘यूरो फाइटर टाइफून’ जैसे विमानों की डील और चीनी कंपनियों द्वारा सैन्य अस्पताल और एवियोनिक्स सुविधाओं का निर्माण महज रक्षा आधुनिकीकरण नहीं है। यह सैन्य नेतृत्व को लुभाने और भारत के पारंपरिक प्रभाव को कम करने का प्रयास है। रिपोर्टों के अनुसार, बांग्लादेशी सेना के भीतर भी दो फाड़ की स्थिति है। एक धड़ा भारत के साथ ऐतिहासिक संबंधों की अहमियत समझता है, तो दूसरा धड़ा चीनी निवेश और यूरोपीय हथियारों के दम पर अपनी नई पहचान तलाश रहा है।
चीन द्वारा चटगांव और अन्य रणनीतिक स्थानों पर बुनियादी ढांचे का विकास भारत की ‘सेवन सिस्टर्स’ (पूर्वोत्तर राज्यों) के लिए सीधा खतरा पैदा कर सकता है। यदि बांग्लादेश की धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए होने लगा, तो सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) की सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां खड़ी हो जाएँगी।
पाकिस्तान: ट्रंप, भाड़े के सैनिक और ‘फॉल्स फ्लैग’ की आशंका
दूसरी तरफ, पाकिस्तान अपनी बदहाली के बीच एक नए सौदे की तलाश में है। चर्चा है कि वैश्विक शक्तियों और विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन के संभावित रुख को देखते हुए, पाकिस्तान को एक बार फिर ‘सिपाही’ भेजने के काम में लगाया जा सकता है। गाजा या अन्य संघर्ष क्षेत्रों में पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती की खबरें केवल सैन्य सहायता नहीं, बल्कि आर्थिक ऑक्सीजन की छटपटाहट है।
मुनीर के नेतृत्व वाली पाकिस्तानी सेना इस समय दोतरफा घिरी है—एक तरफ टीटीपी और बलूच विद्रोहियों के हमले, और दूसरी तरफ जनता का असंतोष। ऐसे में, भारत के साथ सीमा पर तनाव पैदा करना या किसी ‘फॉल्स फ्लैग’ ऑपरेशन को अंजाम देना उनके लिए अपनी प्रासंगिकता बचाने का आखिरी रास्ता बचता है। पाकिस्तान की कोशिश होगी कि वह अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को यह दिखाए कि भारत एक ‘आक्रामक’ शक्ति है, ताकि वह खुद को पीड़ित साबित कर सके।
नैरेटिव की जंग: भारत को ‘आतंक का प्रायोजक’ दिखाने की कोशिश
सबसे खतरनाक मोर्चा डिजिटल दुनिया में खुला है। हाल के दिनों में कनाडा (निज्जर मामला) से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक, भारतीय प्रवासियों और कूटनीतिज्ञों को निशाना बनाकर एक वैश्विक नैरेटिव गढ़ा जा रहा है। इसका उद्देश्य भारत की छवि को एक ‘टेरर स्पॉन्सर’ देश के रूप में पेश करना है। सोशल मीडिया पर कुछ अति-उत्साही तत्वों द्वारा दी जा रही धमकियों का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान भारत के खिलाफ साक्ष्य के रूप में कर रहे हैं। यह ‘नैरेटिव वारफेयर’ भारत को रक्षात्मक मुद्रा में लाने के लिए है, ताकि जब पड़ोस में कोई बड़ी अस्थिरता पैदा हो, तो भारत हस्तक्षेप करने की नैतिक स्थिति में न रहे।
घरेलू राजनीति और ‘गायब’ नेतृत्व
इस गंभीर सुरक्षा संकट के बीच, देश की आंतरिक राजनीति का परिदृश्य भी चिंताजनक है। जब सीमाओं पर और कूटनीतिक मोर्चों पर ‘आग’ लगी हो, तब विपक्ष के प्रमुख नेताओं का विदेश दौरों (जैसे राहुल गांधी की जर्मनी यात्रा) पर होना सवाल खड़े करता है। क्या यह महज संयोग है या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक ‘डायनामाइट’ छिपा है? 19 तारीख की चर्चाएं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही हलचलें किसी बड़े बदलाव की आहट दे रही हैं।
निष्कर्ष
भारत इस समय एक बहुआयामी घेराबंदी का सामना कर रहा है। बांग्लादेश में अस्थिरता, पाकिस्तान की हताशा और वैश्विक नैरेटिव का प्रहार—ये तीनों अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि एक ही सिक्के के पहलू हैं। आने वाले 10-15 दिन भारत की विदेश नीति और आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों के लिए अग्निपरीक्षा के समान होंगे।