पूनम शर्मा
तमिलनाडु की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ कई परतों में कई तरह की हलचलें एक साथ चल रही हैं। उत्तर भारत में पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों पर जिस प्रकार मतदाता सूची की छेड़छाड़, कानून-व्यवस्था और मुस्लिम वोट-बैंक की राजनीति को लेकर बहस होती रही है, अब उसी तरह का विमर्श तमिलनाडु में भी तेज़ हो चुका है। यह माहौल अचानक नहीं बना—इसके पीछे हालिया प्रशासनिक फैसले, चुनावी सर्वेक्षण, डीएमके सरकार की आक्रामकता और विपक्ष की नए सिरे से बनी रणनीतिक एकता जैसे कई कारण हैं।
84 लाख नाम हटे: क्या तमिलनाडु में ‘मतदाता सूची शॉक’ का संकेत?
सबसे बड़ा मुद्दा बना है—84 लाख मतदाताओं के नाम का हटना।
राज्य में कुल लगभग पाँच करोड़ मतदाता हैं, ऐसे में 84 लाख नाम हटना कुल मतदाताओं का लगभग 15% है। यह आँकड़ा अपने आप में चौंकाने वाला है, क्योंकि यह वह श्रेणी नहीं है जहाँ बंगाल की तरह डुप्लीकेट या फर्जी वोटरों का बड़ा खेल पाया गया हो। तमिलनाडु में ज्यादातर हटाए गए नाम “शुद्धिकरण” प्रक्रिया का हिस्सा बताए जा रहे हैं—फोन न उठने, पता बदल जाने या सत्यापन न होने जैसी वजहों से।लेकिन इस सफाई के पीछे राजनीतिक डर भी दिखाई देता है। तमिलनाडु की सत्ता में बैठी डीएमके को आशंका है कि यह हटाव उसके कोर वोट बैंक के भीतर भी सेंध लगा सकता है। यही कारण है कि पार्टी लगातार चुनाव आयोग और प्रशासन पर दबाव बनाती दिख रही है।
एआईएडीएमके–बीजेपी गठबंधन ने समीकरण बदले
ऐसे समय में एआईएडीएमके और बीजेपी का गठबंधन राजनीति में नया मोड़ बन गया है।
2024 के चुनावों में डीएमके ने तमिलनाडु में लगभग एकतरफ़ा जीत हासिल की थी, लेकिन 2025 के लिए माहौल बदल चुका है। गठबंधन बनने से विपक्ष पहली बार संगठित दिख रहा है।इसके अलावा, विजय की ‘तमिलगा वेत्ट्रि काची’ (TVK) की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता डीएमके के लिए नई चुनौती है। युवा वोटर और शहरी मध्यम वर्ग इस पार्टी की ओर आकर्षित हो रहा है, जिससे डीएमके का परंपरागत शहरी प्रभाव कमज़ोर पड़ा है।
डीएमके की बेचैनी: मंदिर विवाद और हिंदू संगठनों से टकराव
डीएमके सरकार की सबसे बड़ी आलोचना मंदिरों को लेकर उसके रवैये पर हो रही है। तिरुपरकुंड्रम के मुरुगन मंदिर में ‘दीपथोलन’ रिवाज़ को लेकर जो विवाद उठा—वह सीधे डीएमके को राजनीतिक नुकसान पहुँचा रहा है। एक मुस्लिम दरगाह समिति ने दावा किया कि दीप स्तंभ उनकी वक्फ़ संपत्ति है। हाईकोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने स्पष्ट आदेश दिया कि दीप जलाने की अनुमति हिंदू पक्ष को मिलेगी। डबल बेंच ने भी यही निर्णय बरकरार रखा। इसके बाद भी डीएमके सरकार ने दीप जलाने की अनुमति नहीं दी।यह सीधे-सीधे धार्मिक हस्तक्षेप जैसा मामला बना, जिसने हिंदू संगठनों को भड़काया। हिंदू मुन्नानी ने इस मुद्दे को राज्यव्यापी अभियान बना दिया है। न्यायपालिका पर हमला? स्पीकर के पास शिकायत ने बढ़ाई हलचल ।
इसी दौर में डीएमके सांसदों ने लोकसभा स्पीकर के पास जज स्वामीनाथन के खिलाफ शिकायत देकर एक नया विवाद खड़ा कर दिया। यह पहली बार हुआ है कि किसी हाईकोर्ट जज के निर्णय पर संसद के अंदर इस प्रकार की शिकायत दी गई हो।सुप्रीम कोर्ट के भीतर भी इस कदम को “न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव”के रूप में देखा जा रहा है। कई कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि डीएमके ने यह कदम राजनीतिक लाभ के लिए उठाया है क्योंकि मंदिर विवाद ने उसकी छवि को नुकसान पहुँचाया है।
ओपिनियन पोल का झटका: डीएमके का चुनावी किला दरकता हुआ?
तमिलनाडु के प्रतिष्ठित ओपिनियन पोल संस्थान BBC Ram के अनुसार—50 से 100 सीटों के सर्वे में परिणाम डीएमके के लिए बिल्कुल राहतभरे नहीं हैं। सर्वे में जिन 100 सीटों को चुना गया, उनमें से अधिकांश डीएमके का परंपरागत प्रभाव क्षेत्र है—जैसे ग्रेटर चेन्नई और नॉर्थ तमिलनाडु। इसी मजबूत क्षेत्र में भी डीएमके पिछड़ती दिख रही है। अनुमान के अनुसार:एनडीए (एआईएडीएमके+बीजेपी) को लगभग 53 सीटें डीएमके को केवल 24 सीटें टीवीके (विजय की पार्टी) तेज़ी से बढ़त बना रही है ये आँकड़े डीएमके के भीतर राजनीतिक बेचैनी का सबसे बड़ा कारण हैं।कांग्रेस की ‘डबल गेम’ ने स्थिति और कठिन की स्थानीय कांग्रेस नेता भी डीएमके से असंतुष्ट हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, कांग्रेस तमिलनाडु में तीसरा विकल्प बनने की कोशिश कर रही है और राहुल गांधी के दौरों को डीएमके समर्थक भी बेअसर मान रहे हैं। इस ‘डबल गेम’ से डीएमके को भरोसे का संकट झेलना पड़ रहा है।
नतीजा: तमिलनाडु में ‘असली खेला’ शुरू
इतने वर्षों तक तमिलनाडु में बीजेपी की राजनीति सीमित मानी जाती थी, लेकिन अब समीकरण बदल रहे हैं। डीएमके मंदिरों के मामलों में लगातार विवाद झेल रही है। 84 लाख नाम हटने की प्रक्रिया से राजनीतिक समीकरण हिल गए हैं। विपक्ष का गठबंधन मजबूत हो चुका है। टीवीके ने युवा वोटरों में नई लहर पैदा की है। ओपिनियन पोल डीएमके के पस्त होने का संकेत दे रहे हैं। तमिलनाडु में आने वाले महीनों का चुनावी मौसम अब सिर्फ प्रशासनिक या राजनीतिक खेल नहीं—बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्संयोजन का भी केंद्र बन चुका है। यह स्पष्ट है कि ‘खेला’ अब बंगाल में नहीं—तमिलनाडु में शुरू हुआ है।