सन्नाटे में तूफान : भारत–रूस रणनीति और डॉलर व्यवस्था को चुनौती

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पूनम शर्मा
कभी–कभी राजनीति और कूटनीति में जितनी खामोशी होती है, उतना बड़ा तूफ़ान आने वाला होता है। हाल के दिनों में भारत, रूस, अमेरिका और पश्चिमी देशों के बीच जो हलचल है, उसका शोर कम है, लेकिन असर दुनिया को हिलाने वाला है। कई लोग इस खामोशी को सिर्फ़ “सामान्य कूटनीति” मानकर नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, पर विशेषज्ञों को साफ़ दिख रहा है कि भारत और रूस मिलकर वैश्विक व्यापार और भुगतान व्यवस्था में बेहद बड़ा बदलाव करने जा रहे हैं।

पुतिन का भारत दौरा: केवल हथियार की बात नहीं

बहुतों को लगा कि व्लादिमीर पुतिन का भारत आना किसी हथियार समझौते—जैसे एस-400 या एस-500—के लिए है। लेकिन सच इससे कहीं बड़ा है।
हथियार सौदे रक्षा मंत्रियों या अधिकारियों के स्तर पर भी हो सकते हैं, उसके लिए पुतिन का आना ज़रूरी नहीं था।
असल में इस मुलाकात में वो लाइनें बोल दी गई हैं जिनका असली अर्थ “बीच की बात पढ़ो” से समझ आता है।

यह प्रश्न महत्वपूर्ण है: क्यों पुतिन ऐसे राजनीतिक माहौल में अचानक भारत आए? क्यों प्रधानमंत्री मोदी से निजी बातचीत की?

इसका जवाब हाल के कुछ घटनाक्रमों में छिपा है। अमेरिका ने दो मोर्चों पर खेला था बड़ा दांव अमेरिका का लक्ष्य साफ़ था -रूस को आर्थिक रूप से कमजोर करना ,भारत पर दबाव डालकर रूस को पश्चिम के सामने झुकने पर मजबूर करना । इसके लिए दो बड़े हथियार इस्तेमाल किए गए—

1. रूस–भारत को तेल सौदों में उलझाकर दबाव बनाना

पहले अमेरिका चिल्ला रहा था— “भारत रूस से सस्ता तेल क्यों खरीद रहा है?” फिर अचानक वही अमेरिका कहने लगा—“भारत ने तेल खरीदना कम क्यों कर दिया?” यह दोहरेपन का खेल इसीलिए था कि भारत और रूस के बीच भरोसा टूटे।

2. रूस के समुद्री तेल व्यापार पर प्रतिबंध

अमेरिका ने जहाज़ी कंपनियों, टैंकरों और बीमा देने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध लगाकर रूस का तेल व्यापार रोकने की कोशिश की।
यह वही कंपनियाँ थीं जिनपर दशकों से पश्चिम और लंदन का पूरा नियंत्रण है। भारत का पलटवार- डॉलर व्यवस्था को बाईपास करने की कोशिश । भारत पिछले पाँच–छह वर्षों से लगातार एक रणनीति पर काम कर रहा है:

1. व्यापार से डॉलर को धीरे–धीरे हटाना

भारत और रूस ने एक–दूसरे के साथ लेन–देन में डॉलर से दूरी बनानी शुरू कर दी है। यह पश्चिम के लिए सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि डॉलर का प्रभुत्व ही अमेरिका की ताकत है।

2. समुद्री रास्तों पर पश्चिम का नियंत्रण तोड़ना

दुनिया का 90% तेल समुद्र के रास्ते आता है। जहाज़, टैंकर, बीमा—सब पश्चिम के हाथ में। भारत और रूस का लक्ष्य है: “नए शिपिंग रूट बनाओ, नए जहाज़ बनाओ और अपना बीमा खुद करो।” यानी पूरी एक वैकल्पिक व्यापार व्यवस्था तैयार करना।

स्वेज़ नहर और पश्चिमी समुद्री रास्तों को दरकिनार करने की रणनीति

अब आता है असली खेल। भारत–रूस–ईरान मिलकर एक नया रूट बना रहे हैं । अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC)यह रूट जाएगा—
भारत → ईरान के बंदर अब्बास → कैस्पियन सागर → रूस । यह रूट 40 दिन के पारंपरिक रास्ते को घटाकर केवल 20–22 दिन कर देगा। और सबसे बड़ा फायदा होगा कि  इस रूट पर अमेरिका, ब्रिटेन या पश्चिमी देशों का कोई नियंत्रण नहीं होगा। यानी न रुकावट ,न दादागिरी ,न डॉलर की जबरदस्ती।

पश्चिम की बेचैनी क्यों बढ़ी?

क्योंकि नए रूट का मतलब है—

 स्वेज़ नहर का महत्व घटेगा
यूरोप का दबदबा कम होगा
 अमेरिका की “डॉलर पॉलिसी” कमजोर होगी
भारत–रूस–ईरान एक नया आर्थिक गलियारा खोलेंगे

और सबसे महत्वपूर्ण— भारत दुनिया के ऊर्जा और शिपिंग व्यापार में एक प्रमुख शक्ति बन जाएगा। भारत की सबसे बड़ी तैयारी: अपना शिपिंग बेड़ा और अपना बीमा । अब तक भारत का 99% तेल विदेशी जहाज़ों से आता था। अब भारत खुद— अपने जहाज़ बनाएगा, अपने टैंकर चलाएगा, अपना बीमा देगा

अपने भुगतान तंत्र का इस्तेमाल करेगा यह आर्थिक स्वतंत्रता के नए युग की शुरुआत है। नतीजा: आने वाला समय दुनिया को चौंकाने वाला है।

जो खामोशी अभी दिख रही है, वह एक भूचाल का संकेत है। भारत और रूस की इस रणनीति से—अमेरिका को बड़ा झटका लगेगा ,एशिया और यूरोप का व्यापार संतुलन बदलेगा ,डॉलर का एकाधिकार टूटेगा । भारत की वैश्विक हैसियत और भी बढ़ेगी । सच यह है कि आने वाले कुछ महीनों में दुनिया को समझ आएगा कि—भारत सिर्फ़ खरीदार नहीं, बल्कि नया वैश्विक शक्ति–निर्माता बन रहा है।

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