कैसे करता है काम जमीयत उलेमा-ए-हिंद? विवाद के बीच समझिए पूरा ढांचा

तीन पीढ़ियों से मदनी परिवार का प्रभाव, 1 करोड़ से अधिक सदस्य और देशभर में 1700 से ज्यादा शाखाएँ—जानिए इस संगठन की संरचना, इतिहास और प्रभाव.

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  • मौलाना महमूद मदनी के जिहाद संबंधी बयान पर सियासत तेज
  • 1919 में बनी जमीयत उलेमा-ए-हिंद, देश के सबसे पुराने मुस्लिम संगठनों में शामिल
  • संगठन पर लंबे समय से मदनी परिवार की पकड़
  • 2001 और 2008 में आतंकवाद के खिलाफ प्रस्ताव और फतवा जारी

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 30 नवंबर: जिहाद पर विवादित टिप्पणी करने के बाद मौलाना महमूद मदनी एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गए हैं। अपने हालिया बयान में उन्होंने कहा कि “जिहाद केवल हिंसा नहीं, यह एक पवित्र कर्तव्य है। जहां अन्याय होगा, वहां जिहाद होना चाहिए।” इस टिप्पणी के बाद कई राजनीतिक दलों ने विरोध दर्ज कराया है और सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं।

मौलाना महमूद मदनी इस समय जमीयत उलेमा-ए-हिंद (JUEH) के अध्यक्ष हैं—एक ऐसा संगठन जिसे देश का सबसे बड़ा और सबसे पुराना मुस्लिम संगठन माना जाता है। मुसलमानों को धार्मिक नेतृत्व देना, पहचान की रक्षा करना और इस्लामी शिक्षा को बढ़ावा देना इसका मुख्य उद्देश्य है।

क्यों बनी जमीयत उलेमा-ए-हिंद?

1919 में स्थापित इस संगठन की नींव मुस्लिम समाज में एक सुरक्षित पहचान और धार्मिक मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से रखी गई थी। जमीयत की स्थापना उस समय के सामाजिक और राजनीतिक हालात को देखते हुए की गई थी, ताकि मुसलमानों का एक एकीकृत मंच तैयार हो सके।

कितना बड़ा नेटवर्क?

रिपोर्ट्स के अनुसार, जमीयत के पास 1 करोड़ से अधिक सदस्य हैं और देशभर में 1700 से अधिक शाखाएँ सक्रिय हैं। यह संस्था चंदे और सदस्यता शुल्क से संचालित होती है। इसकी सामाजिक पकड़ देश के करीब 25 करोड़ मुसलमानों के धार्मिक और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

परिवार का प्रभाव—तीन पीढ़ियों से मदनी परिवार की कमान

जमीयत पर मदनी परिवार का प्रभाव लंबे समय से रहा है।

  • 1940 में मौलाना हुसैन अहमद मदनी अध्यक्ष बने
  • उनके बाद संगठन की कमान लगातार परिवार के सदस्यों के हाथ में रही
  • 2008 में आपसी मतभेद के बाद संगठन दो गुटों में बँट गया, लेकिन दोनों गुटों में नेतृत्व मदनी परिवार के पास ही रहा

दूसरे मुस्लिम संगठनों से कितना अलग?

जमीयत की सबसे बड़ी विशेषता उसका ऐतिहासिक रुख रहा है।

  • आजादी के दौरान मुस्लिम लीग की अलग देश की मांग के खिलाफ जमीयत खड़ी हुई थी
  • मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने सेक्युलर और संयुक्त भारत का समर्थन किया
  • संगठन टू नेशनल थ्योरी के विरोध में रहा
  • 2001 में इसने प्रस्ताव पास कर कहा कि आतंकवाद जिहाद नहीं बल्कि फसाद है
  • 2008 में आतंकवाद के खिलाफ फतवा भी जारी किया गया

इन ऐतिहासिक रुखों का असर आज भी जमीयत की छवि और कार्यशैली में दिखता है।

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