“गोदान: गौ माता की महिमा और सनातन मूल्यों पर आधारित प्रेरक फिल्म”

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पूनम शर्मा
एक कहानी नहीं—बल्कि एक संवेदना, एक पुनर्जागरण और एक सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत रूप है। निर्देशक अमित प्रजापति और निर्माता विनोद कुमार चौधरी लेकर आ रहे हैं “गोदान”, एक ऐसी सिनेमैटिक यात्रा जो हमें याद दिलाती है कि गाय केवकामधेनु इंटरनेशनल प्रोडक्शन गौशाला समिति, मथुरा (उत्तर प्रदेश) प्रस्तुत कर रहा है एक ऐसी फिल्म, जो सिर्फ ल एक पशु नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा, सनातन धर्म का हृदय और मानवता की करुणा का आधार है।
जब हम “गौ माता” कहते हैं—तो वह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की आध्यात्मिक अनुभूति, तप, त्याग, पोषण और सद्भाव की अनुभूति होती है। “गोदान” इसी अनुभूति को आधुनिक दर्शक तक पहुँचाने का संकल्प है। यह फिल्म उन लोगों के लिए एक संदेश है जो भूल चुके हैं कि हमारी संस्कृति का मूल क्या है, हमारी जड़ें कहाँ हैं और हमारी पहचान किससे बनी है।

फिल्म की आत्मा: गौ सेवा ही राष्ट्र सेवा

“गोदान” हमें बताती है कि गाय हमारी परंपरा में ‘आस्था’ से कहीं अधिक है—वह कृषि की आधारशिला, अर्थव्यवस्था की शक्ति, आयुर्वेद की धुरी और धर्म का केंद्र है। फिल्म यह भी दिखाती है कि कैसे गौ माता हमारी संस्कृति में मातृभाव का प्रतीक बन कर समाज को पोषित करती हैं।
आज के दौर में, जहाँ आधुनिकता की आंधी में संस्कारों की लौ कभी-कभी कमजोर पड़ती दिखती है, “गोदान” एक दीपक की तरह सामने आती है—जो हमारे भीतर सोई नैतिकता और कर्तव्यबोध को जगाती है।

कथानक जो दिल को छू जाए

फिल्म में बताया गया है कि कैसे एक सामान्य परिवार, एक सामान्य इंसान और एक सामान्य परिस्थिति भी गाय के आशीर्वाद से असाधारण बन जाती है। यह कहानी हर उस व्यक्ति की है जिसके हृदय में कहीं न कहीं अपनी संस्कृति के प्रति श्रद्धा जीवित है। यह फिल्म दर्शाती है कि जो व्यक्ति गाय का सम्मान करता है, प्रकृति का सम्मान करता है, वह मानवता के पथ पर चलता है।
जो लोग गौ माता के प्रति असम्मान या उदासीनता दिखाते हैं—फिल्म उन्हें आईने के सामने खड़ा कर देती है। यह बताती है कि जो इंसान ‘देवी स्वरूप’ को समझ नहीं सकता, वह समाज की वास्तविक उन्नति में योगदान नहीं दे सकता।

सनातन मूल्य और आधुनिक संदेश

यह फिल्म सिर्फ धर्म की नहीं—बल्कि मानवीय मूल्यों की कहानी है। यह बताती है कि क्यों हर सभ्यता को अपनी परंपराओं की रक्षा करनी चाहिए, क्यों अपनी जड़ों को भूलना समाज के पतन का कारण बन सकता है।
“गोदान” इस बात पर जोर देती है कि सनातन धर्म में गाय सिर्फ पूजा का विषय नहीं—बल्कि ‘जीवदया’, ‘कर्म’, ‘अहिंसा’, ‘धरती के प्रति कर्तव्य’ और ‘सामाजिक सद्भाव’ का प्रतीक है।
क्यों देखें यह फिल्म?

क्योंकि “गोदान” सिर्फ देखी नहीं जाती—यह महसूस की जाती है।

यह फिल्म हर उम्र, हर वर्ग और हर विचारधारा के दर्शक को यह सोचने पर मजबूर कर देगी कि हम किस दिशा में जा रहे हैं, और हमें किस दिशा में जाना चाहिए।
यह फिल्म उन सभी के लिए एक संदेश है—कि गाय का सम्मान केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जिम्मेदारी, पर्यावरणीय आवश्यकता और सामाजिक संतुलन का आधार है।
अंत में, “गोदान” एक ऐसा अनुभव है जो दिल को छूता है, आँखें नम करता है और मन में गर्व की आग जला देता है। यह फिल्म सनातन धर्म की उस अनंत शक्ति को दर्शाती है जिसने भारत को हजारों वर्षों से जीवित रखा है।
बहुत जल्द सिनेमाघरों में—“गोदान”… एक ऐसी फिल्म जिसे हर भारतीय को अवश्य देखना चाहिए।

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