छत्तीसगढ़ के अबुझमाड़ का रहस्यमयी और प्राचीन आदिवासी समाज

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पूनम शर्मा
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की घनी वनों वाली अबुझमाड़ की धरती पर बसने वाली अबुझमाड़िया जनजाति अपने अनोखे जीवन-चक्र, परंपराओं और प्रकृति-आधारित आस्था-संस्कृति के कारण आधुनिक भारत की सबसे विशिष्ट जनजातियों में गिनी जाती है। इन्हें Particularly Vulnerable Tribal Group (PVTG) का दर्जा प्राप्त है, जिसके कारण सामाजिक और आर्थिक रूप से यह समूह विशेष संरक्षण का पात्र है। हाल ही में बस्तर ओलंपिक्स में बढ़ी उनकी सहभागिता ने इस समुदाय को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है। यह न सिर्फ सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है, बल्कि मुख्यधारा से जुड़ने की उनकी उत्सुकता को भी दर्शाता है।

भौगोलिक और सामाजिक परिचय

अबुझमाड़िया मुख्यतः छत्तीसगढ़ के नारायणपुर और बस्तर जिलों के अबुझमाड़ क्षेत्र में पाए जाते हैं। यह इलाका लंबे समय तक भौगोलिक कठिनाइयों और घने जंगलों के कारण ‘अज्ञात क्षेत्र’ माना जाता रहा है।

यह जनजाति गोंड समुदाय की एक उप-शाखा है, जो मध्य भारत में फैले सबसे बड़े आदिवासी समूहों में से एक है। समाज पितृसत्तात्मक है और इसकी सामाजिक संरचना ‘कुल’ या ‘कुल-गोत’ पर आधारित होती है। प्रत्येक कुल के अपने अलग रीति-रिवाज, परंपराएँ और सामाजिक नियम होते हैं, जिन्हें सामुदायिक जीवन का आधार माना जाता है।

संस्कृति और परंपराएँ
1. भाषा
अबुझमाड़िया लोग मुख्यतः अबुझ मारिया भाषा बोलते हैं, जो गोंडी भाषा का स्थानीय रूप है। इसके अलावा वे छत्तीसगढ़ी और हिंदी भी समझते और बोलते हैं।

2. धार्मिक मान्यताएँ
इनकी आस्था प्रकृति से गहराई से जुड़ी है। ये आनिमिज़्म का पालन करते हैं जहाँ पेड़ों, पहाड़ों, जलस्रोतों, भूमि और वनदेवताओं को जीवन का रक्षक माना जाता है।

‘धरती माता’ और ‘जंगल देव’ जैसे देवताओं की पूजा इनके धार्मिक जीवन का केंद्र है।

3. गोंदना परंपरा
अबुझमाड़िया महिलाओं के लिए गोंदना (टैटू) सिर्फ सौंदर्य का प्रतीक नहीं बल्कि जीवनभर पहना जाने वाला आभूषण माना जाता है। उनका मानना है कि यह गोंदना व्यक्ति को बुरी शक्तियों से बचाता है और सामाजिक पहचान का भी हिस्सा है।

4. प्रमुख उत्सव
साजा पर्व – कृषि मौसम में प्राकृतिक शक्तियों का आभार व्यक्त करने वाला उत्सव।

बस्तर दशहरा – बस्तर राज्य की ऐतिहासिक परंपरा से जुड़ा उत्सव, जिसमें नृत्य, बलि-अनुष्ठान, सामुदायिक भोजन और प्रकृति पूजा जैसे आयोजनों का समावेश होता है।

इन उत्सवों में भागीदारी न केवल सामाजिक एकता बढ़ाती है बल्कि उनके सांस्कृतिक अस्तित्व को भी सुदृढ़ करती है।

अर्थव्यवस्था: प्रकृति पर आधारित आजीविका

अबुझमाड़िया समुदाय की अर्थव्यवस्था मुख्यतः subsistence economy यानि आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था पर आधारित है।

वे मुख्य रूप से— धान, मक्का, कोदो-कुटकी, दालें

जैसे फसलों की खेती करते हैं। इनके अतिरिक्त शिकार, मछली पकड़ना और जंगल से महुआ, तेंदूपत्ता, चिरौंजी जैसे उत्पाद एकत्र करना इनके जीवन का हिस्सा है।

वन इनके लिए केवल संसाधन नहीं, बल्कि अस्तित्व और पहचान का स्रोत है।

सामाजिक संरचना और जीवन शैली

अबुझमाड़िया समाज में सामुदायिक निर्णय ग्राम प्रमुख और परंपरागत बुजुर्गों द्वारा लिया जाता है। प्रत्येक परिवार अपने कुल और पारंपरिक नियमों के प्रति निष्ठावान रहता है। विवाह, त्योहार और सामाजिक संबंधों में सामूहिकता प्रमुख रहती है।

युवा वर्ग के लिए पारंपरिक डॉर्मिटरी का उल्लेख अक्सर अन्य गोंडी समूहों में मिलता है, पर अबुझमाड़िया में यह प्रथा कम दिखाई देती है, फिर भी सामाजिक शिक्षण और सामूहिक श्रम इनके जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

समकालीन संदर्भ: बस्तर ओलंपिक्स में बढ़ती भागीदारी

हाल ही में आयोजित बस्तर ओलंपिक्स में अबुझमाड़िया युवाओं की बढ़ती भागीदारी को विकास और आत्मविश्वास का संकेत माना जा रहा है। परंपरागत खेलों जैसे—

दौड़, तीरंदाजी,परंपरागत नृत्य में उनकी कुशलता ने इस जनजाति को नए मंच पर पहचान दिलाई है। यह भागीदारी संकेत देती है कि आधुनिकता और प्रगति के रास्ते पर चलते हुए भी वे अपनी जड़ों और सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े हुए हैं।

निष्कर्ष
अबुझमाड़िया जनजाति भारत की सांस्कृतिक विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो प्रकृति-आधारित जीवन, प्राचीन सामाजिक संरचना और विशिष्ट परंपराओं का जीवंत उदाहरण है। आज जब यह समुदाय शिक्षा, खेल और सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से मुख्यधारा से जुड़ रहा है, तो उनके संरक्षण, विकास और सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

छत्तीसगढ़ और भारत की वनवासी परंपरा में इनका योगदान अतुलनीय है और इनकी संस्कृति भारतीय आदिवासी विरासत का अमूल्य खजाना है।

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