क्रिश्चियन अधिकारी की बर्खास्तगी पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर
निजी धार्मिक व्याख्याओं का बढ़ता संकट और भारत के सनातन धर्म की समावेशी परंपरा
पूनम शर्मा
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन की बर्खास्तगी को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत धार्मिक व्याख्याएँ सेना जैसी संस्थाओं में अनुशासन और एकता को कमजोर नहीं कर सकतीं। यह फैसला केवल एक अधिकारी के आचरण को लेकर नहीं है; यह उस व्यापक सामाजिक प्रश्न पर भी प्रकाश डालता है कि क्यों व्यक्तिगत स्तर पर धार्मिक जिद, कट्टरता या गलत व्याख्या जैसी बाधाएँ समाज में बढ़ रही हैं—जबकि भारत की मूल संस्कृति, यानी सनातन धर्म, हमेशा से समावेशी, उदार और सभी को अपनाने वाली रही है।
सेना में अनुशासन सर्वोपरि: व्यक्तिगत व्याख्या नहीं चल सकती
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाला बाग्ची की पीठ ने कहा कि कमलेसन का रवैया उनके सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला था। CJI ने कहा, “अगर सेना के अधिकारी का रवैया ऐसा है, तो क्या कहा जाए!” यह टिप्पणी यह दर्शाती है कि सेना की नींव समानता, आपसी सम्मान और सामूहिक पहचान पर टिकी है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी स्पष्ट किया था कि यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता का नहीं, बल्कि वैध सैन्य आदेश के पालन का है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पादरी द्वारा सलाह देने के बावजूद अधिकारी का जिद पर अड़े रहना यह दिखाता है कि यह व्यक्तिगत धार्मिक व्याख्या को संस्थागत अनुशासन से ऊपर रखने का प्रयास था—जो अस्वीकार्य है।
भारत की सेना: विविधता में एकता का सबसे बड़ा प्रतीक
भारत की सेना उन दुर्लभ सेनाओं में से है, जहाँ हर धर्म, भाषा और समुदाय के लोग साथ मिलकर सेवा देते हैं। रेजिमेंटल परंपराएँ किसी धर्म का प्रचार नहीं करतीं, बल्कि सभी को सम्मान देती हैं।
सर्व धर्म स्थल इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, जहाँ मंदिर, गुरुद्वारा, चर्च और मस्जिद एक ही ढाँचे में हो सकते हैं—जो बताता है कि भारत का सेक्युलरिज़्म पश्चिमी मॉडल जैसा ‘धर्म से दूरी’ वाला नहीं, बल्कि सभी धर्मों का सम्मान करने वाला है।
ऐसे में किसी अधिकारी का यह कहना कि वह मंदिर या गुरुद्वारे में प्रवेश नहीं करेगा, न केवल गलतफहमी है बल्कि यह उस सामूहिक मूल भावना के खिलाफ है जिस पर भारतीय सेना का चरित्र आधारित है।
परंतु समाज में ऐसा क्या बदल रहा है? व्यक्तिगत स्तर पर बाधाएँ क्यों बढ़ रही हैं?
यह प्रश्न केवल सेना या एक अधिकारी तक सीमित नहीं है। यह आज के समाज में भी देखने को मिलता है—जहाँ व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत धार्मिक व्याख्या को सर्वोच्च मानने लगा है।
इसके कई कारण हैं:
सोशल मीडिया और इंटरनेट ने आधी-अधूरी धार्मिक समझ को “सत्य” का रूप दे दिया है।
पश्चिमी नैरेटिव भारत के धर्म और पहचान को “संघर्षपूर्ण” दिखाने की कोशिश करता है।
धर्म का राजनीतिकरण, जिसके कारण लोग अपने वास्तविक धर्म सिद्धांतों को भूलकर केवल पहचान-आधारित तर्कों में उलझ जाते हैं।
आत्म-चिन्तन और अध्ययन की कमी, जिससे लोग धार्मिक पुस्तकें नहीं पढ़ते, बल्कि किसी बाहरी या गलत व्याख्या पर विश्वास कर लेते हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि भारत का मूल धर्म—सनातन धर्म—कभी बाधा नहीं बनता, उलटे सबको अपनाता है, फिर भी आज धार्मिक कट्टरता का आरोप उसी पर लगाया जाता है।
सनातन धर्म: दुनिया का सबसे समावेशी, उदार और सेक्युलर परंपरा वाला धर्म
भारत की संस्कृति का आधार सनातन धर्म है—जिसकी आत्मा “सर्वे भवन्तु सुखिनः”, “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” और “अथिति देवो भव” जैसे विचारों में बसती है।
सनातन धर्म:
किसी पर अपनी आस्था नहीं थोपता
किसी को मंदिर जाने के लिए मजबूर नहीं करता
किसी अन्य धर्म के अस्तित्व का विरोध नहीं करता
व्यक्तिगत साधना और स्वतंत्र सोच को प्रोत्साहित करता है
विविधता को पूजता है, दमन नहीं करता
यही कारण है कि भारत में सिख, बौद्ध, जैन, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी और अनेक मत एक साथ फल-फूल पाए।
वास्तव में, हिन्दू धर्म ही दुनिया का सबसे “सेक्युलर” धर्म है—क्योंकि इसका अस्तित्व किसी एक पैग़म्बर, एक पुस्तक या एक विचार पर नहीं टिका, बल्कि अनगिनत मार्गों, दर्शन और परंपराओं को स्वीकार करने पर टिका है।
इसलिए, जब कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत धार्मिक व्याख्या के आधार पर सामूहिक कर्तव्य से पीछे हटता है, तो वह भारत की मूल विचारधारा के विरुद्ध खड़ा होता है—चाहे वह किसी भी धर्म का हो।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: राष्ट्रहित सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इस मूल सिद्धांत को दोहराता है:
सेना में अनुशासन और एकता सर्वोपरि
व्यक्तिगत धार्मिक व्याख्या कर्तव्य से ऊपर नहीं
भारत की सेक्युलर परंपरा सबको जोड़ती है, अलग नहीं करती
ऐसे फैसले भारत को याद दिलाते हैं कि सेक्युलरिज़्म, सहिष्णुता और विविधता केवल संविधान की बातें नहीं—वे हमारी सभ्यता की आत्मा हैं।
भारत का सैनातन धर्म और भारतीय संविधान दोनों यही संदेश देते हैं:
“अनेक में एकता ही भारत की शक्ति है—और व्यक्तिगत जिद कभी सामूहिक कर्तव्य पर हावी नहीं हो सकती।”