पूनम शर्मा
भारत में आदिवासी समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर वर्षों से ध्यान दिया गया है। विशेष रूप से Particularly Vulnerable Tribal Groups (PVTGs) जैसे समुदाय अत्यधिक पिछड़े, पृथक और संवेदनशील हैं। उनकी पहचान अधिकांशतः वन आधारित या प्रागैतिहासिक जीवनशैली, निम्न शिक्षा स्तर, सीमित स्वास्थ्य सेवाएँ और छोटे या घटते हुए जनसंख्या के आधार पर की जाती है। ऐसे समुदायों के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने कई योजनाओं की शुरुआत की है, ताकि उनकी जीवन गुणवत्ता में सुधार हो सके और वे मुख्यधारा में शामिल हो सकें।
PVTGs के लिए केंद्रीय योजनाएँ और उनके उद्देश्य
PVTGs के विकास की योजना
यह योजना केंद्र द्वारा 100% वित्त पोषित है और राज्यों को हबिटेट-स्तरीय विकास योजनाएँ बनाने हेतु अनुदान प्रदान करती है।
योजना का उद्देश्य Conservation-cum-Development (CCD) मॉडल के माध्यम से आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और सांस्कृतिक संरक्षण को एकीकृत करना है।
राज्य सरकारें CCD योजनाओं को प्रस्तुत करती हैं और केंद्रीय अनुदान के रूप में प्राप्त करती हैं।
यह योजना विशेष रूप से छोटे और दूरस्थ गांवों में रहने वाले PVTGs के लिए लक्षित है, ताकि उनके बुनियादी ढांचे और सामाजिक सेवाओं में सुधार हो।
वन अधिकार और हबिटेट अधिकार (Forest Rights & Habitat Rights)
Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006 (FRA) के तहत आदिवासियों को भूमि और वन संसाधनों पर अधिकार दिए जाते हैं।
इनके क्षेत्रों में समुदाय और व्यक्तिगत अधिकारों को प्राथमिकता दी जाती है।
हालांकि, राज्यों में लागू होने में भिन्नता है, लेकिन इस कानून के माध्यम से आदिवासियों की स्थिरता और आजीविका सुरक्षा को बढ़ावा मिलता है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी हस्तक्षेप (Science & Technology Interventions)
विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय विभिन्न परियोजनाओं (SEED projects) के माध्यम से आदिवासी क्षेत्रों में उपयुक्त तकनीक और आजीविका समाधान प्रदान करता है।
उदाहरण के लिए, सूखा-प्रतिरोधी फसलें, बाद-फसल प्रबंधन तकनीक, और सूक्ष्म उद्यम आदिवासी जीवन को स्थिर बनाने में मदद करते हैं।
एकीकृत प्रमुख पहल (Integrated Flagship Initiatives)
PM-JANMAN (Pradhan Mantri Janjati Adivasi Nyaya Maha Abhiyan) जैसी योजनाएँ आदिवासी जिलों और PVTG हबिटेट्स में सहयोगात्मक और बहु-विभागीय हस्तक्षेप सुनिश्चित करती हैं।
पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के क्षेत्र में एक साथ सुधार लाने की कोशिश की जाती है।
उदाहरण के लिए, मलकानगिरी (ओड़िशा) में PVTG हबिटेट्स में शुरुआती परियोजनाओं ने आवास, जल आपूर्ति और कनेक्टिविटी में स्पष्ट सुधार दिखाया।
सफल पहल और सकारात्मक परिणाम
हबिटेट-स्तरीय सूक्ष्म नियोजन (Habitat-level Micro Planning)
CCD योजनाओं के माध्यम से जीओ-टैग्ड घर, बुनियादी संरचना, और आवश्यक सेवाएँ प्रदान की गईं।
इस प्रक्रिया में स्थानीय आदिवासी समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की गई, जिससे योजनाओं की सांस्कृतिक संवेदनशीलता और प्रभावशीलता बढ़ी।
पहचान और सामाजिक सुरक्षा (Identity and Social Security)
PVTG परिवारों को आधार, राशन कार्ड और अन्य आवश्यक दस्तावेज प्रदान किए गए, जिससे सरकारी योजनाओं और लाभों तक पहुंच सुनिश्चित हुई।
स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार (Health and Education)
मोबाइल हेल्थ यूनिट्स और ब्रिज शिक्षा मॉडल के माध्यम से आदिवासी बच्चों और महिलाओं तक स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं की पहुँच बढ़ाई गई।
दूरदराज के गांवों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार से मानव विकास सूचकांक में सुधार देखा गया।
आजीविका सशक्तिकरण (Livelihood Empowerment)
Van Dhan और गैर-लकड़ी वन उत्पाद (NTFP) मूल्य श्रृंखला जैसे कार्यक्रमों ने PVTG समुदायों को स्थायी और बाजार-संबंधी आजीविका विकल्प प्रदान किए।
इससे वन पर निर्भर आजीविकाओं में स्थायित्व आया और विपरीत मौसमी परिस्थितियों या बाजार उतार-चढ़ाव से जोखिम कम हुआ।
चुनौतियाँ और सुधार की आवश्यकता
यद्यपि कई योजनाएँ प्रभावी रही हैं, अवसरों और चुनौतियों की कमी अभी भी है:
कार्यान्वयन में देरी और केंद्र तथा राज्य विभागों के बीच समन्वय की कमी।
अनुचित निगरानी और सामाजिक ऑडिट की कमी, जिससे योजनाओं के लाभ पूरी तरह से लक्षित समुदाय तक नहीं पहुंचते।
स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के अभाव में योजनाओं की प्रभावशीलता सीमित रह सकती है।
भविष्य की दिशा
PVTGs के सतत विकास के लिए आवश्यक कदम हैं:
विशेष जनगणना और डेटा प्रणाली – प्रत्येक हबिटेट स्तर पर PVTG परिवारों का सटीक रिकॉर्ड तैयार करना।
वन और हबिटेट अधिकारों को मजबूत बनाना – FRA के तहत समुदायों के अधिकारों को प्राथमिकता देना।
संयुक्त, स्थानीय नेतृत्व वाली CCD योजनाएँ – समुदाय के साथ सह-निर्माण और मापनीय परिणाम सुनिश्चित करना।
स्थिर और बाजार-संबंधी आजीविकाएँ – जलवायु-प्रतिरोधी और सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त आजीविका विकल्पों का विकास।
स्वास्थ्य, शिक्षा और पहचान सेवाओं की पहुंच – मोबाइल हेल्थ यूनिट्स, ब्रिज शिक्षा, और पहचान दस्तावेज़ की सुनिश्चितता।
सहभागी निगरानी – सामाजिक ऑडिट, शिकायत निवारण तंत्र, और तृतीय-पक्ष मूल्यांकन।
निष्कर्ष
भारत के PVTG समुदाय देश के सबसे कमजोर और पिछड़े वर्गों में आते हैं। सरकारी योजनाओं और पहल ने उनके जीवन स्तर में सुधार के लिए ठोस कदम उठाए हैं। सफल CCD योजनाएँ, Van Dhan और PM-JANMAN जैसी पहलें, और हबिटेट-स्तरीय डेटा संग्रह ने आदिवासियों की सशक्तीकरण और आजीविका में सुधार सुनिश्चित किया है। हालांकि, सतत निगरानी, स्थानीय भागीदारी, और सांस्कृतिक संवेदनशीलता ही इन योजनाओं को अधिक प्रभावी और दीर्घकालिक बना सकती है।
यदि इन सभी उपायों को संगठित रूप से लागू किया जाए, तो PVTGs केवल संरक्षण की स्थिति से बाहर आकर आत्मनिर्भर और सम्मानजनक विकास की ओर बढ़ सकते हैं।