हरियाणा से चला तूफ़ान, बिहार में आकर थमा: विपक्ष कैसे बिखर गया ?

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पूनम शर्मा
2025 के बिहार चुनावों का परिणाम किसी राजनीतिक भूकंप से कम नहीं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की अभूतपूर्व जीत ने राजद-कांग्रेस महागठबंधन को झकझोर कर रख दिया है। बीस साल की सत्ता-विरोधी लहर, राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’ और तेजस्वी यादव की सक्रियता के बावजूद, विपक्ष को करारी हार मिली।

यह हार केवल एक चुनावी पराजय नहीं, बल्कि पिछले छह महीनों से चल रहे एक राष्ट्रीय राजनीतिक ट्रेंड का हिस्सा है—और यह ट्रेंड शुरू हुआ था हरियाणा से।

हरियाणा से शुरू हुआ सिलसिला

कई विश्लेषकों ने माना था कि हरियाणा में बीजेपी वापसी नहीं कर पाएगी, लेकिन नतीजों ने सभी आकलनों को ध्वस्त कर दिया। कांग्रेस को “जीत छीनकर हारने” वाला दल का तमगा मिल गया।

इसके बाद महाराष्ट्र में भी कहानी वही रही—जहाँ  लोकसभा चुनाव में महायुक्ति को बड़ा झटका देने के बाद विधानसभा में बीजेपी-शिवसेना (शिंदे)-एनसीपी (आजमचीही पावट) गठबंधन ने अप्रत्याशित रूप से तीन-चौथाई सीटें जीत लीं।

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी विपक्ष का बुरा हाल हुआ। यानी हरियाणा से शुरू हुआ सिलसिला चार राज्यों के बाद बिहार में आकर चरम पर पहुंचा।

महिला मतदाताओं का नया राजनीतिक समीकरण

इस पूरी राजनीतिक कहानी का सबसे बड़ा किरदार है—महिलाएँ ।
बीजेपी ने जिस “कैश ट्रांसफर मॉडल” को हरियाणा, महाराष्ट्र, एमपी और छत्तीसगढ़ में आज़माया, वही मॉडल बिहार में भी निर्णायक साबित हुआ।

मध्यप्रदेश में ‘लाड़ली बहना योजना’ के तहत ₹1,500 का ट्रांसफर

महाराष्ट्र में ‘लाड़ली  बहिन योजना’ के तहत ₹2,500

बिहार में चुनाव से ठीक पहले ₹10,000 की सहायता, 125 यूनिट फ्री बिजली और वृद्धावस्था पेंशन बढ़ाकर ₹1,100

विपक्ष ने इसके जवाब में महिलाओं को जनवरी में ₹30,000 देने का वादा किया, मगर मतदाता मनोविज्ञान साफ है—जो रकम हाथ में आ चुकी है, वह किसी “वायदे” से अधिक भरोसेमंद होती है।

बीजेपी-एनडीए का यह महिला-केंद्रित आर्थिक मॉडल हर राज्य में चुनावी गेम-चेंजर साबित हुआ।

महागठबंधन की गलतियां: नेतृत्व और संदेश

महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी रही अस्पष्ट नेतृत्व।
कांग्रेस तेजस्वी को सीएम पद का चेहरा बनाने में हिचकिचाती दिखी। इससे जनता को यह संकेत गया कि दोनों पार्टियां भीतर ही भीतर असहमत हैं।

दूसरी ओर, मोदी ने अपनी रैलियों में एक ही बात बार-बार दोहराई—
“तेजस्वी आएँगे तो जंगलराज लौटेगा।” भले ही लालू यादव को पोस्टरों से हटाकर राजद ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वे पूरी तरह तेजस्वी के पीछे खड़े हैं, लेकिन जनता पर 1990 के दशक की यादें अभी भी ताज़ा हैं। मोदी की इस रणनीति ने विपक्ष के लिए भारी नुकसान किया।

जातीय गणित: एनडीए की चालाकी, महागठबंधन की चूक

2020 के विधानसभा चुनाव की गलतियों से सबक लेते हुए इस बार एनडीए ने गठबंधन में—

चिराग पासवान की एलजेपी, और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम —दोनों को साथ रखकर जातीय समीकरण को मजबूत किया।

ये दोनों दल 2020 में कुल 7% वोट का हिस्सा रखते थे, और इस बार भी बीजेपी-जेपी (जदयू)-एलजेपी के संयुक्त समीकरण में इनका योगदान निर्णायक रहा। महागठबंधन में वीआईपी और इंडियन इंक्लूसिव पार्टी की एंट्री हुई, लेकिन वे एनडीए के साझा वोट-बैंक के सामने कमजोर साबित हुए।

विपक्ष की उम्मीदें क्यों बिखर गईं?

2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की कमजोर प्रदर्शन से विपक्ष ने उम्मीद की थी कि भाजपा की लहर उतर चुकी है।
लेकिन छह महीने में ही तस्वीर उलट गई।

इसकी वजहें साफ हैं:

महिलाओं को आर्थिक सहायता स्पष्ट नेतृत्व और मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता । एनडीए में मजबूत जातीय संतुलन महागठबंधन में नेतृत्व और संदेश की अस्पष्टता ,तेजस्वी पर पुराने ‘जंगलराज’ की छवि का बोझ बिहार में इन सबने मिलकर महागठबंधन की संभावनाओं को खत्म कर दिया।

अब आगे क्या?

बिहार का यह परिणाम सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों का संकेत है।
विपक्ष को अब एक बात समझनी होगी— महिलाएँ  नए भारत की सबसे निर्णायक राजनीतिक शक्ति बन चुकी हैं। अगर विपक्ष महिला कल्याण, नेतृत्व की स्पष्टता और जमीनी संगठन पर गंभीर रणनीति नहीं बनाता, तो आने वाले चुनाव भी उसके लिए कठिन हो सकते हैं।

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