पूनम शर्मा
ब्राज़ील के बेलें दो पारा शहर में आयोजित COP-30 जलवायु सम्मेलन 2025 ने एक बार फिर दुनिया को याद दिलाया है कि पृथ्वी की रक्षा किसी एक देश का नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज का संयुक्त दायित्व है। अमेज़न वर्षावन—जिसे पृथ्वी के “फेफड़े” कहा जाता है—के बीच आयोजित यह सम्मेलन जलवायु संतुलन, वैश्विक तापमान वृद्धि, कार्बन उत्सर्जन में कटौती और भविष्य के ‘इको-डिप्लोमेसी मॉडल’ पर केंद्रित है। इस बार की विशेषता यह है कि दुनिया केवल ‘ग्रीन इकॉनमी’ की बात नहीं कर रही, बल्कि भारत के ‘हरित सिद्धांत’ को जलवायु शांति का वास्तविक आधार मान रही है।
भारत का ‘हरित सिद्धांत’—प्रकृति के साथ, न कि उसके ऊपर
राष्ट्रों में जब ‘ग्रीन’ शब्द पश्चिमी कंपनियों के लिए बाजार बन गया, भारत ने विश्व को याद दिलाया कि हरित संस्कृति केवल तकनीकी नवाचार नहीं, बल्कि जीवन दर्शन है।
यही कारण है कि COP-30 में भारत द्वारा प्रस्तावित Lifestyle for Environment (LiFE) मॉडल वैश्विक एजेंडा में सबसे आगे है। भारत ने यह रेखांकित किया कि—
जलवायु संकट का हल केवल मशीनों से नहीं, बल्कि मानव व्यवहार में बदलाव, खपत कम करने की संस्कृति, और प्रकृति के प्रति सांस्कृतिक जिम्मेदारी से निकलेगा। भारत ने यह भी स्पष्ट कहा कि पश्चिमी मॉडल केवल ‘ग्रीन बिज़नेस’ है, जबकि भारतीय मॉडल मानव और प्रकृति के सहजीवन पर आधारित है।
अमेज़न की छाया में दुनिया के सबसे कठिन सवाल
COP-30 की थीम दो मुख्य बिंदुओं पर टिकी है:
2030 तक वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C पर रोकने की रणनीति
कार्बन-न्यूनता की विश्व-व्यापी प्रतिस्पर्धा, जो अब राजनीतिक संघर्ष का रूप ले चुकी है
अमेज़न वर्षावन की आग, अवैध कटाई और खनन के कारण ब्राज़ील पर भारी दबाव है। यह क्षेत्र पृथ्वी के ऑक्सीजन उत्पादन का सबसे बड़ा स्रोत है, और इसकी रक्षा वैश्विक जलवायु शांति के लिए आवश्यक है।
भारत ने इसी संदर्भ में कहा कि ग्रह के प्राकृतिक संसाधनों का वैश्विक उपयोग नहीं, बल्कि वैश्विक संरक्षण होना चाहिए।
भारत- ब्राजील साझेदारी—जलवायु संतुलन का नया सूत्र
इस COP में भारत और ब्राजील के बीच हुए कई प्रस्तावों पर दुनिया की नजरें टिक गईं। भारत ने ब्राजील के साथ मिलकर Global Biofuel Alliance को आगे बढ़ाया, जो भविष्य में तेल आधारित अर्थव्यवस्था की जगह हरित जैव-ऊर्जा अर्थव्यवस्था को स्थापित कर सकता है।
इसके अतिरिक्त भारत ने अमेज़न के संरक्षण के लिए—
संयुक्त अनुसंधान, जैव विविधता संरक्षण, आदिवासी जनजातियों के अधिकारों, और सतत कृषि मॉडल के लिए सहयोग विस्तार का प्रस्ताव रखा।
वैश्विक तापमान—क्या 1.5°C लक्ष्य अब भी संभव ?
COP-30 में प्रस्तुत वैज्ञानिक रिपोर्टें स्पष्ट करती हैं कि दुनिया अभी भी 1.5°C लक्ष्य से काफी दूर है।
कारण—
विकसित देशों की लालच-आधारित खपत संस्कृति
विकासशील देशों पर अनुचित जलवायु दबाव
ग्रीन टेक्नोलॉजी को महंगा रखने वाली कॉर्पोरेट नीतियाँ
भारत ने इन सब पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि जलवायु न्याय तभी संभव है जब—विकसित देश ऐतिहासिक उत्सर्जन की जिम्मेदारी स्वीकार करें,
तकनीक और फंड बिना शर्त विकासशील देशों को दें, और वैश्विक अर्थव्यवस्था को जलवायु-संतुलित मॉडल की ओर धकेला जाए।
भारत का मॉडल—‘शांति से विकास’ नहीं, ‘प्रकृति के साथ विकास’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रतिनिधि मंडल ने COP-30 में स्पष्ट कहा कि जलवायु संतुलन के लिए भारत 3-स्तरीय हरित नीति पर काम कर रहा है—
नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार – 2030 तक 500 GW लक्ष्य कार्बन फुटप्रिंट में तीव्र गिरावट – 2070 तक Net Zero लक्ष्य संस्कृति आधारित पर्यावरण संरक्षण – जल संरक्षण अभियान, नदी पुनर्जीवन, प्राकृतिक खेती, और वृक्षारोपण
दुनिया ने पहली बार स्वीकार किया कि भारत जैसे देश जलवायु योद्धा नहीं, बल्कि जलवायु समाधान हैं।
COP-30 का निष्कर्ष—‘हरित भारत’ ही वैश्विक शांति का मार्ग
सम्मेलन में यह विचार उभरकर सामने आया कि—दुनिया को ‘ग्रीन मार्केट’ नहीं, ‘हरित संस्कृति’ चाहिए ,समाधान केवल तकनीक नहीं—जीवनशैली में बदलाव है
भारत की प्राचीन ‘पंच तत्व’ आधारित संस्कृति ही पृथ्वी को संतुलित कर सकती है
अंततः COP-30 ने यह संदेश दिया कि जलवायु शांति केवल वैज्ञानिकों का नहीं, बल्कि समाजों का मिशन है। और इस मिशन का नेतृत्व भारत जैसे सभ्यता-आधारित राष्ट्र ही कर सकते हैं, जिनकी संस्कृति में प्रकृति देवी है, और उसके संरक्षण को धर्म मानकर निभाया जाता है।