महिलाओं ने बदल दी बिहार की सियासत की तस्वीर
इस बार पहले से कहीं ज्यादा वोटिंग कर दिखाई नई सोच की ताकत
पूनम शर्मा
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण के मतदान ने एक अहम संकेत दिया है — इस बार महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से कहीं आगे रही। गाँवों से लेकर कस्बों तक, युवतियों से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक, सभी ने लोकतंत्र के इस महापर्व में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। यह सिर्फ मतदान नहीं था, बल्कि एक सामाजिक जागरण था — जहाँ महिलाएँ अब सिर्फ “घरों की मतदाता” नहीं रहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों की निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं।
महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इस बार पहले चरण में औसतन 62.3% मतदान हुआ, जिसमें महिलाओं का मतदान प्रतिशत 65% से अधिक रहा। कई विधानसभा क्षेत्रों में महिलाओं की वोटिंग दर पुरुषों से 5 से 7 प्रतिशत तक अधिक दर्ज की गई।
यह रुझान नया नहीं है, लेकिन इस बार इसका विस्तार और असर बहुत व्यापक रहा। खासकर बेगूसराय, बखरी, और चेरिया बरियारपुर जैसे इलाकों में महिलाओं की लंबी कतारें देखकर साफ था कि वे अपने भविष्य की दिशा खुद तय करने आई हैं।
मुद्दे बदले, सोच बदली
पहले जहाँ महिलाओं का मतदान परिवार या समाज के दबाव में होता था, अब उन्होंने अपने मुद्दे और प्राथमिकताएँ तय कर ली हैं।
रोज़गार और शिक्षा अब महिलाओं की प्राथमिक चिंता है।
महँगाई और सुरक्षा के सवाल पर भी उन्होंने खुलकर राय दी।
ग्रामीण इलाकों में शौचालय, पानी और सड़क जैसे बुनियादी मुद्दे मतदान का प्रमुख कारण बने।
एक महिला मतदाता ने कैमूर ज़िले में कहा — “अब हम वोट जाति देखकर नहीं देते, अपने बच्चों के भविष्य के लिए देते हैं।”
यह बयान बिहार की नई महिला मतदाता की परिपक्वता का प्रतीक है।
पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का राजनीतिक जागरण
चुनाव आयोग के पिछले आँकड़ों की तुलना करें तो, 2010 में महिलाओं की भागीदारी जहाँ 54% थी, वहीं अब यह 65% से ऊपर पहुँच चुकी है।
इस निरंतर वृद्धि का बड़ा कारण है –
महिला स्व-सहायता समूहों (SHGs) का जागरूकता अभियान,
सरकारी योजनाओं से मिली आत्मनिर्भरता, जैसे उज्ज्वला योजना, जनधन खाता, और हर घर नल योजना,
सामाजिक मीडिया और शिक्षा ने भी महिलाओं को राजनीति से जोड़ा है।
अब गाँव की महिलाएँ सिर्फ “वोट डालने” नहीं, बल्कि “विचार बनाने” आई हैं।
महिला वोट बैंक: अब सबसे निर्णायक
राजनीतिक दलों को अब यह समझ आ गया है कि बिना महिलाओं के भरोसे कोई भी सत्ता तक नहीं पहुँच सकता।
2025 के इस चुनाव में लगभग 6 करोड़ महिला मतदाता हैं — यानी हर दो मतदाताओं में एक महिला।
यह संख्या सिर्फ सांख्यिकीय नहीं, बल्कि राजनीतिक भविष्य का संकेत है।
हर दल अपनी घोषणाओं में महिलाओं को केंद्र में रख रहा है — चाहे वह रोज़गार की गारंटी हो, रसोई गैस सब्सिडी, या महिला सुरक्षा बलों में भर्ती।
ग्रामीण बिहार में जागी नई उम्मीद
ग्राम पंचायतों और स्वयं सहायता समूहों में सक्रिय महिलाओं ने इस बार चुनाव में भी अग्रणी भूमिका निभाई।
उन्होंने अपने गाँवों में मतदान के दिन ‘मेरा वोट, मेरा हक़’ अभियान चलाया, कई जगह पर्दा प्रथा के बावजूद महिलाएँ खुलकर मतदान केंद्रों पर पहुँचीं।
बक्सर की एक महिला ने कहा, “अबकी बार हम खुद तय करेंगे कौन नेता हमारे गाँव की सड़क बनाएगा।”
यह आत्मविश्वास बताता है कि बिहार की महिला अब राजनीतिक विमर्श की धुरी बन चुकी है।
आने वाले परिणामों पर प्रभाव
चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि महिलाओं की यह बढ़ती भागीदारी कई सीटों पर निर्णायक मोड़ ला सकती है।
महिलाओं ने जाति, धर्म या क्षेत्र से ऊपर उठकर विकास और सम्मान के मुद्दे पर वोट किया है।
यदि यही रुझान आगे भी कायम रहा, तो बिहार की राजनीति में ‘महिला फैक्टर’ सबसे बड़ा गेमचेंजर साबित होगा।
निष्कर्ष
2025 का बिहार चुनाव इस मायने में ऐतिहासिक है कि यहाँ महिलाओं ने अपने राजनीतिक अस्तित्व का ऐलान कर दिया है।
अब वे सिर्फ किसी की “बीवी, माँ या बेटी” के रूप में नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सबसे मज़बूत आवाज़ के रूप में सामने आई हैं।
उन्होंने यह साबित कर दिया कि जब महिलाएँ उठ खड़ी होती हैं, तो लोकतंत्र की दिशा भी बदल जाती है।