पूनम शर्मा
भारत में न्यायपालिका और संसद के बीच संतुलन हमेशा संवैधानिक लोकतंत्र की रीढ़ रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों द्वारा किसी मामले की सुनवाई और सरकार की ओर से संवैधानिक पीठ बनाने की माँग ने यह सवाल उठाया है कि क्या संवैधानिक बेंच का गठन समयबद्ध तरीके से होना चाहिए या नहीं। यह मामला विशेष रूप से उस समय गंभीर बन गया जब रिटायरमेंट से केवल तीन हफ्ते पहले न्यायाधीश की सुनवाई और केंद्र सरकार की दलीलों के बीच झड़प देखने को मिली।
सवाल यह है कि अगर कोई कानून संसद में बनता है, तो उसकी संवैधानिक वैधता की जाँच के लिए कितनी बेंच बैठनी चाहिए। संविधान के अनुसार किसी सामान्य कानून की वैधता या मान्यता की जाँच के लिए दो जजों की बेंच पर्याप्त हो सकती है। लेकिन अगर किसी कानून के किसी प्रावधान को पूरी तरह से रद्द करना या उसका संवैधानिक परीक्षण करना हो, तो कम से कम पांच जजों की संवैधानिक बेंच होना अनिवार्य है। यही संवैधानिक प्रक्रिया न्याय की निष्पक्षता और गंभीरता सुनिश्चित करती है।
हाल ही में संसद में बने किसी कानून को चुनौती देने के लिए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा । इसके सुनवाई में दो जजों की बेंच लगी। न्यायपालिका के विशेषज्ञों का कहना है कि केवल दो जजों की बेंच से केवल यह देखा जा सकता है कि कानून में तकनीकी या मामूली खामियां हैं या नहीं। यदि कानून की पूरी संवैधानिक समीक्षा करनी हो, तो इसे संवैधानिक बेंच को सौंपना चाहिए। संवैधानिक बेंच का अर्थ है कम से कम पांच जजों की बैठकी, जिसमें बहस और ओपिनियन दोनों सार्वजनिक और विस्तृत रूप में होते हैं।
इस मामले की गंभीरता इस तथ्य से भी स्पष्ट होती है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल के अधिकारों को समयबद्ध (Time-bound) कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने पहले दो जजों की बेंच के माध्यम से इस पर विचार किया, जबकि संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति और राज्यपाल के अधिकारों से जुड़े मामलों में संवैधानिक बेंच की आवश्यकता होती है। यदि सुप्रीम कोर्ट समयबद्ध निर्णय नहीं देती, तो इससे संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों और जनता के विश्वास पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि केंद्र सरकार इस मामले में संवैधानिक पीठ से बचने की कोशिश कर रही थी। इसे मोदी सरकार की कानूनी रणनीति के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि संवैधानिक मामलों में पाँच जजों की बेंच होने पर फैसले में समय लगता है और परिणाम अनिश्चित होते हैं। वहीं, दो जजों की बेंच के माध्यम से जल्दी सुनवाई और फैसले की संभावना बढ़ जाती है। इस मामले में अटॉर्नी जनरल और अन्य सरकारी अधिकारी सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित थे और उन्होंने संवैधानिक बेंच की मांग की, जिससे यह विवाद और बढ़ गया।
सुप्रीम कोर्ट के भीतर यह भी देखा गया कि दो जजों की बेंच ने अपनी सुनवाई पूरी कर ली, लेकिन संवैधानिक पीठ नहीं बनाई गई। इससे यह सवाल उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक मामलों में मनमानी निर्णय लेने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संवैधानिक मामलों में प्रक्रिया और टाइमलाइन का पालन न हो, तो न्यायपालिका का मजाक बन सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच का गठन केवल कानून की वैधता की जाँच नहीं करता, बल्कि यह सुनिश्चित करता है कि न्यायपालिका स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध निर्णय दे। उदाहरण के लिए, राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए 10 प्रश्नों पर केवल दो जजों की बेंच जवाब दे रही थी, जबकि संवैधानिक रूप से इसके लिए पांच जजों की बेंच आवश्यक थी।
कानून बनाने और उसकी संवैधानिक वैधता की सुनवाई के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है। अगर सरकार संसद में बहुमत से कोई कानून पास कराती है, तो उसकी संवैधानिक जाँच आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वह संवैधानिक मामलों में उचित बेंच के माध्यम से सुनवाई करे। केवल दो जजों की बेंच संवैधानिक मामलों की पूरी गंभीरता को नहीं दिखा सकती।
सुप्रीम कोर्ट की इस प्रक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया कि न्यायपालिका में समयबद्ध और नियमबद्ध प्रक्रिया की कमी से गंभीर संवैधानिक मामलों में न्याय में देरी हो सकती है। यह मामला केवल कानून की वैधता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका के संचालन, संवैधानिक पीठ के गठन, और सरकारी पक्ष की कानूनी रणनीति पर भी सवाल उठाता है।
यदि कोई कानून संसद में पास होता है, तो उसका संवैधानिक परीक्षण करना न्यायपालिका का काम है। लेकिन यह तभी न्यायसंगत और प्रभावी होता है जब संवैधानिक बेंच की संख्या और सुनवाई की प्रक्रिया संविधान के अनुरूप हो। दो जजों की बेंच केवल प्रारंभिक स्तर की समीक्षा कर सकती है, संवैधानिक रूप से यह पर्याप्त नहीं है।
अंततः, यह मामला न्यायपालिका, संसद और सरकार के बीच संवैधानिक संतुलन की आवश्यकता को स्पष्ट करता है। संवैधानिक बेंच का गठन समयबद्ध होना चाहिए ताकि कोई भी कानून, चाहे वह राष्ट्रपति या राज्यपाल के अधिकार से संबंधित हो या आम नागरिकों के हित से जुड़ा हो, उसकी समीक्षा निष्पक्ष और गंभीरता के साथ हो सके। न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और संविधान की सर्वोच्चता इस प्रक्रिया में निहित हैं।
इस विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि सुप्रीम कोर्ट को संवैधानिक मामलों में समयबद्ध, नियमबद्ध और निष्पक्ष निर्णय लेने के लिए संवैधानिक बेंच के गठन पर जोर देना चाहिए। केवल इस प्रकार ही लोकतंत्र में कानून, संविधान और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखा जा सकता है।