पूनम शर्मा
तमिलनाडु में हाल ही में फॉक्सकॉन को लेकर हुई घोषणा ने राज्य की उद्योग नीतियों और एम.के. स्टालिन सरकार की शैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अक्टूबर 2025 में राज्य सरकार ने बड़े धूमधाम से कहा कि फॉक्सकॉन तमिलनाडु में ₹15,000 करोड़ का निवेश करेगा और 14,000 उच्च-मूल्य इंजीनियरिंग नौकरियों का सृजन करेगा। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और उद्योग मंत्री टी.आर.बी. राजा ने इस घोषणा को मीडिया के माध्यम से बड़े उत्साह के साथ प्रचारित किया, साथ ही फॉक्सकॉन के भारत प्रतिनिधि रॉबर्ट वू के साथ फोटो साझा किए गए।
लेकिन इस ‘बड़ी उपलब्धि’ का जश्न बहुत जल्दी ही सच्चाई की चाकू पर चलने वाली तलवार साबित हुआ। फॉक्सकॉन ने तुरंत स्पष्ट किया कि तमिलनाडु सरकार के साथ कोई नई निवेश योजना पर चर्चा नहीं हुई और ₹15,000 करोड़ का निवेश केवल सरकार के दावे में था। इसने साबित कर दिया कि राज्य सरकार ने पुराने या चल रहे प्रोजेक्ट्स को नए और भव्य आंकड़ों के साथ पेश कर, जनता और मीडिया को गुमराह किया।
स्टालिन सरकार की प्रचार-प्रधान मानसिकता
यह घटना दिखाती है कि स्टालिन सरकार की निवेश नीति प्रचार-प्रधान है, न कि नीति-प्रधान। तमिलनाडु का औद्योगिक मंच, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र, पहले से ही मजबूत है। लेकिन राज्य सरकार ने इसे अवसर बनाने के बजाय संख्या बढ़ा-चढ़ाकर और पुरानी परियोजनाओं को नया रूप देकर मीडिया में चमकाया।
टी.आर.बी. राजा का बचाव भी हास्यास्पद और गैर-जिम्मेदाराना था। उन्होंने कहा कि ₹15,000 करोड़ फॉक्सकॉन की पुरानी प्रतिबद्धताओं का हिस्सा है, और जिसने नकार दिया वह उसी कंपनी की सब्सिडियरी नहीं थी। इस तर्क ने केवल सरकार की विश्वसनीयता को और कमजोर किया और दिखाया कि स्टालिन प्रशासन खुद की बनाई गई कहानी में फंस गया है।
मीडिया और सत्यापन की कमी
इस पूरे मसले ने यह भी उजागर किया कि व्यापार और वित्तीय पत्रकारिता का कमजोर होना कैसे झूठे दावों को हवा देता है। कई प्रमुख व्यापार पोर्टल्स ने मंत्री के बयान को लगभग बिना जांच-पड़ताल के प्रकाशित कर दिया। जब सरकार पारदर्शिता और सत्यापन की बजाय प्रचार और PR पर निर्भर होती है, तो जवाबदेही का तंत्र स्वतः ही ध्वस्त हो जाता है।
प्रचार के कारण वास्तविकता की हानि
तमिलनाडु की सरकार ने फॉक्सकॉन की वास्तविक उपस्थिति और निवेश को नजरअंदाज करके केवल आंखों में धूल झोंकने का प्रयास किया। असल में फॉक्सकॉन श्रीपेरुम्बुदूर में 2017 से आई फोन असेंबली कर रहा है और 2024 में युज़हन टेक्नोलॉजी इंडिया ने ₹13,180 करोड़ के प्रोजेक्ट के लिए अनुमति पाई, जिससे लगभग 14,000 नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है। यह सब वास्तविक और दस्तावेजीकृत निवेश हैं, जिन्हें स्टालिन सरकार ने पुराने डेटा को नया रूप देकर विज्ञापन का माध्यम बनाया।
स्टालिन सरकार की छवि पर चोट
इस घटना ने राज्य सरकार की विश्वसनीयता पर गंभीर चोट पहुँचाई । प्रचार के कारण जो संभावित सकारात्मक छवि बननी थी, वह पूरी तरह उलट गई। स्टालिन प्रशासन की यह रणनीति — “हेडलाइन पहले, नीति बाद में” — केवल अस्थायी ध्यान आकर्षित कर सकती है, लेकिन लंबे समय में निवेशकों और उद्योग जगत में भरोसा खोने का कारण बनती है।
शिक्षा और नीति में सुधार की आवश्यकता
तमिलनाडु का औद्योगिक इतिहास और संरचना मजबूत है, लेकिन स्टालिन सरकार को अब यह समझना होगा कि सफल निवेश नीति केवल PR और मीडिया प्रचार से नहीं बनती। इसके लिए स्पष्ट योजना, पारदर्शिता और विश्वसनीय संचार की आवश्यकता है।
यदि राज्य सरकार भविष्य में इस तरह के प्रचार-प्रधान दावों को जारी रखती है, तो यह न केवल निवेशकों का भरोसा खोने का कारण बनेगा, बल्कि तमिलनाडु की औद्योगिक साख को भी खतरे में डालेगा।
निष्कर्ष
फॉक्सकॉन के ₹15,000 करोड़ निवेश के विवाद ने स्पष्ट कर दिया है कि स्टालिन सरकार अपने PR और मीडिया कौशल में इतनी व्यस्त है कि वास्तविक नीति और निवेश की समीक्षा करना भूल गई।
यह घटना तमिलनाडु के लिए एक सख्त सबक है कि वास्तविक विकास और निवेश आकर्षण वास्तविकता, विश्वसनीयता और रणनीति पर आधारित होना चाहिए, न कि केवल बड़े आंकड़ों और फोटो-ऑप पर।
स्टालिन सरकार को यह समझना होगा कि जनता और निवेशक अब झूठे दावों और प्रचार-प्रधान घोषणाओं को आसानी से पहचान सकते हैं। यदि विश्वसनीयता खो जाएगी, तो ₹15,000 करोड़ की कोई भी घोषणा केवल शब्दों का खेल साबित होगी।