पूनम शर्मा
भारत की अवज्ञा बनाम वॉशिंगटन का शक्ति नाटक
कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसे दृश्य सामने आते हैं जिन्हें देखकर लगता है जैसे पूरा विश्व मंच किसी नाटक में बदल गया हो—जहाँ असली रणनीति से ज़्यादा ‘ड्रामा’ होता है। अमेरिका, भारत, पाकिस्तान और इज़राइल के बीच जो भू-राजनीतिक खेल इन दिनों चल रहा है, वह ऐसा ही एक नाटक है।
भारत अपनी स्वतंत्र रणनीति पर चल रहा है—सस्ता रूसी तेल खरीद रहा है, चीन के खिलाफ अमेरिकी मोर्चे में शामिल होने से इंकार कर रहा है और BRICS व शंघाई सहयोग संगठन जैसे बहुध्रुवीय मंचों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। यही स्वतंत्रता वॉशिंगटन को सबसे ज़्यादा परेशान कर रही है। अमेरिका अब इस स्वतंत्रता को तोड़ने के लिए पाकिस्तान और यहां तक कि इज़राइल को भी “मोहरे” के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता: अमेरिका के लिए चुनौती
भारत की विदेश नीति दशकों से एक सिद्धांत पर टिकी रही है — स्वायत्तता। नेहरू की ‘गुटनिरपेक्षता’ से लेकर मोदी की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ तक, भारत ने हमेशा किसी का अधीन बनने से इंकार किया है।
आज जब अमेरिका चीन के खिलाफ अपने ‘कोल्ड वॉर’ अभियान में सहयोगी ढूंढ रहा है, भारत किसी के ब्लॉक में बंधना नहीं चाहता। बल्कि भारत रूस से तेल खरीद रहा है, बीजिंग से संवाद जारी रख रहा है और वॉशिंगटन की ‘वन लाइन’ रणनीति को ठुकरा रहा है।
अमेरिकी रणनीतिकारों को यह ‘अवज्ञा’ असहनीय है, क्योंकि वे ऐसे सहयोगी के आदी हैं जो आदेश पर चलते हैं। भारत की स्वतंत्र नीति इस “लोकतांत्रिक गठबंधन” की कल्पना को खोखला बना रही है।
पाकिस्तान का पुनरुत्थान — केवल एक ‘हथियार’
अमेरिका की इस नाराज़गी का सबसे बड़ा लाभार्थी पाकिस्तान बन रहा है। जिसकी अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है, राजनीतिक व्यवस्था मज़ाक बन चुकी है और सेना भ्रष्टाचार का पर्याय है — वही पाकिस्तान आज अचानक अमेरिकी मंच पर वापस बुला लिया गया है।
अमेरिका जानता है कि पाकिस्तान कोई रणनीतिक संपत्ति नहीं है, लेकिन भारत को अनुशासित करने के लिए “एक पुराने मोहरे” को चमकाकर पेश किया जा सकता है। यही वजह है कि आज पाकिस्तान की सेना को एक बार फिर “स्पॉटलाइट” दी जा रही है।
इज़राइल की ‘माफी’ — एक प्रतीकात्मक तमाशा
सबसे हैरान करने वाला दृश्य वह था जब इज़राइल ने पाकिस्तान से माफी मांगी। एक ऐसा देश जो शायद ही कभी किसी से माफी मांगता हो। असल में यह न तो कूटनीति थी और न ही कोई नया अध्याय—यह सिर्फ अमेरिका द्वारा भारत को भेजा गया एक संकेत था।
“देखो, अगर तुम अमेरिकी लाइन से हटोगे तो हम तुम्हारे विरोधी पाकिस्तान को भी मंच पर खड़ा कर देंगे, और इज़राइल को भी माफ़ी मांगने पर मजबूर कर देंगे।”
रावलपिंडी के जनरल — वही पुराना नाटक
पाकिस्तान की सेना दशकों से विदेशी शक्तियों की चरण वंदना में लगी रही है। इस्लामी एकता की बातें करने वाले वही जनरल पर्दे के पीछे इज़राइल से रिश्तों के सपने देखते हैं। देश की जनता बदहाल है, लेकिन सैन्य तंत्र विदेशी स्वीकृति पाने में मग्न है।
अमेरिका जानता है कि यह सेना न तो विश्वसनीय है और न ही कोई असली ताकत। लेकिन भारत को दबाव में लाने के लिए यही ‘नकली ताकत’ काम में लाई जा रही है।
वॉशिंगटन की याददाश्त
जिस पाकिस्तान को दशकों तक अमेरिका ने आतंकवाद, धोखे और दोहरे खेल के लिए कोसा, आज उसी को गले लगाया जा रहा है। और यह सब सिर्फ इसलिए ताकि भारत को दिखाया जा सके — “अगर तुम न माने तो हम तुम्हारे पड़ोसी को तुम्हारे खिलाफ खड़ा कर देंगे।”
इतिहास मिटाया नहीं जा सकता। पाकिस्तान की हकीकत वही है—भ्रष्ट तंत्र, जनविरोधी नीतियाँ और विदेशी आकाओं के सामने झुकी सत्ता।
भारत की राह: स्वतंत्रता का मूल्य
भारत के लिए यह खेल अपमानजनक जरूर है, लेकिन नया नहीं। वॉशिंगटन हमेशा वही करता है जो उसके हित में हो। अगर भारत चीन और रूस के करीब जाएगा तो पाकिस्तान के जनरल ‘हीरो’ बना दिए जाएंगे। और अगर भारत अमेरिका की लाइन में आ गया तो वही जनरल फिर “आतंकवाद के स्रोत” कहे जाएंगे।
असल लड़ाई पाकिस्तान से नहीं, बल्कि अमेरिकी नियंत्रण के खिलाफ है।
अंतिम दृश्य: नाटक का पर्दा गिरेगा
जब यह भू-राजनीतिक नाटक खत्म होगा तो पाकिस्तान एक बार फिर हाशिए पर होगा, इज़राइल फिर अपने पुराने तेवर में लौट आएगा और अमेरिका फिर भारत के साथ सौहार्द्र की बातें करेगा।
भारत ने साम्राज्यों और कोल्ड वॉर दोनों झेले हैं। वह इस नाटक को भी झेल जाएगा। असली दुख पाकिस्तान की जनता का होगा—जिसके नेता सिर्फ विदेशी इशारों पर नाचते रहेंगे। और असली मज़ाक वॉशिंगटन का—जो इस तमाशे को रणनीति समझता है।भारत की स्वतंत्र विदेश नीति ही वॉशिंगटन के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है। पाकिस्तान और इज़राइल का इस्तेमाल सिर्फ एक अस्थायी ‘शक्ति नाटक’ है। असली ताकत भारत की रणनीतिक स्वायत्तता में है—और यही इस पूरे नाटक का केंद्र बिंदु है।