सुप्रीम कोर्ट बवाल: ‘सनातन का अपमान नहीं सहेंगे’ – CJI गवई पर जूता उछालने वाले वकील डॉ. राकेश किशोर ने दी खुली चुनौती

न्यायपालिका पर गंभीर आरोप, ‘दलित बनाम गैर-दलित’ प्रोपेगंडा पर पलटवार; बोले- किया दैवीय कार्य, कोई पछतावा नहीं

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  • डॉ. राकेश किशोर ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई के समक्ष उनके एक कथित बयान के विरोध में जूता उछालने का प्रयास किया।
  • उन्होंने कहा कि CJI गवई ने सनातन धर्म से जुड़े एक मामले में याचिकाकर्ता का मज़ाक उड़ाया, जिससे वे ‘बहुत आहत’ थे और यह उनकी ‘प्रतिक्रिया’ थी।
  • डॉ. किशोर ने न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार, पक्षपात और मामलों को लंबित रखने का आरोप लगाया, और कहा कि उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 13 अक्टूबर: बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट परिसर में हुई एक अप्रत्याशित और सनसनीखेज घटना ने देश की न्याय प्रणाली की गरिमा और कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 6 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट के एक वकील डॉ. राकेश किशोर ने मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की कोर्ट में कथित तौर पर उनकी ओर जूता उछालने का प्रयास किया। यह घटना एक धार्मिक याचिका पर CJI द्वारा की गई टिप्पणी को लेकर हुई। इस घटना के बाद, डॉ. किशोर ने मीडिया को दिए अपने बयानों में न्यायपालिका की कार्यशैली पर कड़े शब्दों में हमला किया है, और कहा है कि उनका यह कृत्य किसी व्यक्तिगत विरोध के बजाय ‘दैवीय आदेश’ से प्रेरित था। उन्होंने खुले तौर पर घोषणा की है कि उन्हें अपने इस कृत्य के लिए कोई पछतावा नहीं है और वे भविष्य में भी ‘दैवीय इच्छा’ के अनुसार काम करने को तैयार हैं।

CJI गवई की टिप्पणी बनी विरोध का कारण

डॉ. राकेश किशोर के अनुसार, उनके इस कदम की शुरुआत 16 सितंबर को हुई, जब उन्होंने या किसी अन्य व्यक्ति ने मुख्य न्यायाधीश की अदालत में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की। यह याचिका संभवतः किसी धार्मिक प्रतिमा या सनातन धर्म से जुड़े मामले से संबंधित थी।

डॉ. किशोर ने आरोप लगाया कि सुनवाई के दौरान CJI गवई ने याचिकाकर्ता का मज़ाक उड़ाया। उन्होंने कथित तौर पर कहा, “जाओ और मूर्ति से प्रार्थना करो,” या “जाकर मूर्ति से कहो कि वह अपना सिर खुद लगा ले।” डॉ. किशोर ने इसे सनातन धर्म का अपमान और एक याचिकाकर्ता का जलील करना बताया। उन्होंने इस बात पर दुःख व्यक्त किया कि सुप्रीम कोर्ट अक्सर जल्लीकट्टू, दही हांडी की ऊंचाई जैसे हिंदू धर्म से जुड़े छोटे-बड़े मामलों पर आदेश पारित करता रहता है, लेकिन जब किसी धार्मिक मामले में राहत देने की बात आती है, तो अदालत मज़ाक बनाती है।

उन्होंने कहा, “अगर आप किसी को भिक्षा नहीं दे सकते, तो कम से कम उसका कटोरा मत तोड़िए। उनको इस हद तक अपमानित मत कीजिए कि आप उन्हें भगवान के सामने ध्यान करने के लिए कहें। आप केवल इतना कहकर चले गए कि कुछ नहीं हुआ।” डॉ. किशोर के अनुसार, यह अपमानजनक टिप्पणी ही उनकी ‘प्रतिक्रिया’ का मूल कारण बनी।

न्यायपालिका पर गंभीर आरोप: भ्रष्टाचार और पक्षपात

डॉ. राकेश किशोर ने अपने बयानों में भारतीय न्यायपालिका पर कई गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए हैं, जिनमें भ्रष्टाचार, पक्षपातपूर्ण निर्णय और मामलों को जानबूझकर लटकाना शामिल है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश के लिए सबसे बड़ा खतरा न्यायपालिका में बैठे ‘संगठित अपराधी’ हैं।

लंबित मामले और छुट्टियों पर सवाल:

डॉ. किशोर ने देश की न्याय व्यवस्था में 5 करोड़ से अधिक मामलों के लंबित होने का मुद्दा उठाया और न्यायाधीशों द्वारा तीन महीने की लंबी छुट्टियां लेने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में मामले लंबित होने के बावजूद न्यायाधीशों की संवेदनशीलता क्यों नहीं बढ़ रही है।

आतंकवादियों, बलात्कारियों को राहत और ‘सनातनियों’ पर सख्ती:

उन्होंने आरोप लगाया कि न्यायपालिका कठोर आतंकवादियों, बलात्कारियों और बाल यौन अपराधियों को मुक्त कर रही है, जबकि नूपुर शर्मा जैसी लोग जो कथित तौर पर “लव-जिहाद और लैंड-जिहाद” के पीड़ितों के लिए आवाज़ उठाती हैं, वे “जेल के जीवन में सड़ रही हैं।” उन्होंने सवाल उठाया कि जब अन्य समुदायों के मामले आते हैं तो अदालतें बड़े ‘स्टे’ (रोक) देती हैं, लेकिन सनातन धर्म से जुड़े मामलों पर अजीब आदेश पारित किए जाते हैं।

हल्द्वानी और बुलडोजर कार्रवाई पर विरोधाभास:

डॉ. किशोर ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बुलडोजर कार्रवाई का समर्थन किया, और कहा कि यह कार्रवाई उन लोगों के खिलाफ है जिन्होंने अवैध रूप से सरकारी जमीन पर कब्जा किया है। उन्होंने सीधे CJI पर सवाल उठाते हुए कहा कि आप मॉरीशस जैसे देशों में जाकर कहते हैं कि देश बुलडोजर पर नहीं चलेगा, लेकिन आपको हल्द्वानी की वह जमीन क्यों नहीं दिखाई देती, जिस पर एक विशेष समुदाय का कब्जा है और सुप्रीम कोर्ट ने पिछले तीन साल से अतिक्रमण हटाने पर रोक लगा रखी है। उन्होंने न्यायपालिका पर ‘अवैध संपत्ति’ के मामलों में जानबूझकर स्टे लगाकर भूमि माफिया को संरक्षण देने का आरोप लगाया।

‘दलित बनाम गैर-दलित’ प्रोपेगंडा पर पलटवार

इस घटना के बाद सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक हलकों में इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि डॉ. किशोर ने एक दलित जज (CJI गवई) पर हमला किया। इस पर पलटवार करते हुए डॉ. राकेश किशोर ने इस मुद्दे को ‘एकतरफा’ प्रोपेगंडा करार दिया।

उन्होंने कहा, “मेरा नाम है डॉ. राकेश किशोर। क्या कोई मेरी जात बता सकता है? हो सकता है मैं भी दलित हूँ।”

उन्होंने तर्क दिया कि CJI गवई पहले सनातनी हिंदू थे, और बाद में उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया। डॉ. किशोर ने सवाल उठाया कि अगर वह बौद्ध धर्म अपनाने के बाद खुद को हिंदू धर्म से बाहर मानते हैं, तो उन्हें अभी भी दलित कैसे कहा जा सकता है? उन्होंने कहा कि यह मानसिकता का मामला है और ये लोग (विपक्षी नेता) इस तथ्य का फायदा उठाकर केवल देश में अस्थिरता पैदा करना चाहते हैं और मौजूदा सरकार को गिराना चाहते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी पहचान सबसे पहले सनातनी और हिंदू की है, जाति की नहीं।

कार्यवाही और प्रतिक्रिया: ‘ना पछतावा, ना माफ़ी’

घटना के तुरंत बाद दिल्ली पुलिस ने डॉ. राकेश किशोर को हिरासत में लिया और तीन-चार घंटे की पूछताछ के बाद बिना किसी औपचारिक शिकायत के छोड़ दिया, जिसके लिए उन्होंने पुलिस अधिकारियों का आभार व्यक्त किया।

हालांकि, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने इस घटना को ‘कानूनी बिरादरी पर धब्बा’ बताते हुए डॉ. राकेश किशोर का लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की।

इस पर डॉ. किशोर ने बार काउंसिल के आदेश पर सवाल उठाया और आरोप लगाया कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Principle of Natural Justice) का उल्लंघन है। उन्होंने कहा, “बार काउंसिल ने मेरे मामले में नियमों का उल्लंघन किया है। उन्होंने मुझे कोई नोटिस नहीं दिया। मुझे नोटिस दिया जाएगा, और हम उसका जवाब देंगे।” उन्होंने कहा कि वह इस कार्रवाई को चुनौती देंगे।

अपने कृत्य पर पछतावा न जताते हुए उन्होंने कहा, “मैं माफी नहीं मांगने जा रहा हूँ, और न ही मुझे कोई पछतावा है। मैंने कुछ नहीं किया है। भगवान ने मुझसे जो करवाया, मैंने वह किया।” उन्होंने कहा कि वह 72 साल के हैं और अगर भगवान की इच्छा है कि उन्हें जेल जाना पड़े या फांसी हो जाए, तो उन्हें कोई डर नहीं है।

सनातन के विरुद्ध बढ़ती आवाज़ें और देश का भविष्य

सनातन धर्म के खिलाफ बढ़ती आवाज़ों पर टिप्पणी करते हुए डॉ. किशोर ने भारत के इतिहास का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हम हजारों सालों तक गुलाम रहे क्योंकि हम बहुत सहिष्णु रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि आज भी हम सहिष्णु हैं, “लेकिन जब हमारी अस्मिता खतरे में है, तब हम अपने हितों की देखभाल करना चाहते हैं।”

उन्होंने 1947 के विभाजन का जिक्र करते हुए कहा कि तब सात राष्ट्र थे, जो आज सत्तावन हो गए हैं, और अब देश का एक और विभाजन होने की आशंका है। उन्होंने सवाल किया कि यदि देश का चौथा टुकड़ा भी हो गया, तो हम कहाँ भागेंगे? उन्होंने देश के नेताओं, पुलिस और न्यायपालिका से अपील की कि वे इस खतरे को समझें और देश की रक्षा करें।

 

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