सीजेआई पर जूता फेंकने की घटना : क्या अब सुप्रीम कोर्ट को भी आत्ममंथन की ज़रूरत है ?

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पूनम शर्मा
दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट में 71 वर्षीय वकील राकेश किशोर द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ के उत्तराधिकारी CJI बी.आर. गवई पर जूता फेंकने का प्रयास केवल एक “हाई-प्रोफाइल कोर्टरूम ड्रामा” नहीं था — यह उस गहराते जन-आक्रोश का संकेत भी है जो बीते कुछ वर्षों में हिंदू सनातन धर्म से जुड़े मामलों में न्यायपालिका के व्यवहार को लेकर लगातार पनप रहा है। यह घटना ऐसे समय में हुई जब यूट्यूबर और मीडिया इनफ्लुएंसर अजीत भारती पर सीजेआई गवई के खिलाफ “उकसाने और अपमानजनक टिप्पणी” करने का आरोप लगा है।

कौन हैं अजीत भारती?

बिहार के बेगूसराय निवासी अजीत भारती खुद को ‘मीडिया पर्सनैलिटी’ और ‘पत्रकार’ बताते हैं। उनके यूट्यूब पर 7 लाख से अधिक सब्सक्राइबर और एक्स (X) पर करीब 5 लाख फॉलोअर्स हैं। वे अपनी तीखी और व्यंग्यात्मक शैली के लिए जाने जाते हैं। वे अक्सर वामपंथी विचारधारा और कांग्रेस पार्टी पर हमलावर रहते हैं।

हाल ही में एक पॉडकास्ट में अजीत भारती और उनके दो मेहमानों ने सीजेआई गवई को लेकर कथित रूप से आपत्तिजनक और भड़काऊ टिप्पणी की। उन्होंने गवई को “अयोग्य” करार देते हुए उन पर जातिगत तंज भी कसे। इसी दौरान वकील राकेश किशोर द्वारा अदालत में जूता फेंकने का प्रयास हुआ। इसके बाद अजीत भारती ने सोशल मीडिया पर वीडियो डालकर सीजेआई को लेकर कटाक्ष किया और लिखा — “गवई एक निकृष्ट और अयोग्य जज है, उस पर कंटेम्प्ट केस चलना चाहिए।”

कई लोगों ने अजीत भारती पर आरोप लगाया कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से सीजेआई के खिलाफ लोगों को भड़काया।

घटना क्या थी?

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान राकेश किशोर नामक वकील अचानक न्यायाधीशों के मंच (डायस) की ओर बढ़े और अपना जूता निकालकर फेंकने की कोशिश की। लेकिन कोर्ट में तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें तुरंत काबू में कर लिया और हमले को नाकाम कर दिया।

इस घटना ने पूरे देश में बहस छेड़ दी — क्या कोई व्यक्ति भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर हमला करने की हिम्मत यूं ही कर लेता है? ज़ाहिर है, ऐसा कदम अचानक नहीं उठाया जाता। इसके पीछे गहरी नाराज़गी, अविश्वास और क्षोभ की परतें होती हैं।

न्यायपालिका और हिंदू भावनाओं के टकराव की बढ़ती खाई

बीते कुछ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट की कई टिप्पणियां और फैसले हिंदू सनातन परंपरा के अनुयायियों के बीच विवाद का कारण बने हैं। चाहे सनातन धर्म को लेकर की गई टिप्पणियां हों, मंदिरों से जुड़े प्रबंधन मामलों में राज्य के हस्तक्षेप को वैध ठहराना हो, या धार्मिक मान्यताओं को “संवैधानिक कसौटी” पर कसने की परंपरा — इन सबसे एक बड़ा तबका आहत महसूस कर रहा है।

कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायपालिका धर्म और संस्कृति से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और संतुलन की बजाय आलोचनात्मक और हस्तक्षेपकारी रवैया अपनाती है। यही कारण है कि अदालत के आदेश और टिप्पणियां सड़कों और सोशल मीडिया तक जन आक्रोश में तब्दील हो रही हैं।

क्या अदालत को आत्ममंथन की ज़रूरत है?

लोकतंत्र में न्यायपालिका सर्वोच्च संस्था मानी जाती है, परंतु उसका सम्मान किसी व्यक्ति के डर से नहीं, उसकी निष्पक्षता और जनविश्वास से आता है। जब आम नागरिक को यह लगे कि न्याय के मंदिर में उसकी आस्था का मज़ाक उड़ाया जा रहा है, तब किसी भी संस्था का नैतिक अधिकार कमजोर होने लगता है।

जूता फेंकने जैसी घटना को किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता, परंतु इसके पीछे छिपे भावनात्मक ज्वालामुखी को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। जब जनता का एक बड़ा वर्ग न्यायपालिका के व्यवहार को “हिंदू विरोधी” या “सनातन के प्रति अपमानजनक” मानने लगे, तब अदालत को खुद में झांककर देखना चाहिए — क्या कहीं संवाद और संवेदनशीलता की कमी तो नहीं?

अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम न्यायपालिका की गरिमा

अजीत भारती का मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम न्यायपालिका की गरिमा की बहस को फिर से जगा रहा है। एक ओर सुप्रीम कोर्ट ‘कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट’ के नाम पर किसी भी आलोचना को रोकने की कोशिश करता है, वहीं दूसरी ओर नागरिक समाज में यह भावना बढ़ रही है कि न्यायपालिका को भी सवालों के घेरे में लाया जा सकता है।

लोकतंत्र में कोई संस्था अचूक नहीं होती — न संसद, न मीडिया और न ही न्यायपालिका। जब जनता बोलना बंद कर दे, तब संस्थाएँ  बेलगाम हो जाती हैं। परंतु आलोचना और हिंसा में फर्क होता है। अजीत भारती के बयान और जूता फेंकने की घटना — दोनों ही इस नाजुक सीमा रेखा पर सवाल खड़े करती हैं।

संवेदनशीलता से ही बचेगा सम्मान

सीजेआई गवई पर जूता फेंकने की घटना भारतीय न्यायपालिका के लिए एक चेतावनी की तरह है — जनता और न्यायपालिका के बीच विश्वास की डोर कमजोर पड़ रही है। अदालतें अगर जनभावनाओं को अपमान समझने की बजाय समझने की कोशिश करें, तो इस खाई को पाटा जा सकता है।

सनातन परंपरा करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। अदालतों को इस भावनात्मक और सांस्कृतिक वास्तविकता को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

संविधान का तकाज़ा केवल तर्क नहीं — संवेदनशीलता भी है। इसलिए ज़रूरत है कि सुप्रीम कोर्ट और न्यायपालिका संवाद, पारदर्शिता और आत्ममंथन की राह अपनाए। तभी संस्थाओं का सम्मान बना रहेगा और कोई नागरिक क्रोध में जूता फेंकने जैसा कदम नहीं उठाएगा।

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