बांग्लादेश को तोड़ो और चिट्टागाँव वापस लो : त्रिपुरा के प्रद्युत देबबर्मा के विवादित बयान पर रिपोर्ट

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पूनम शर्मा
त्रिपुरा के शाही वंश के नेता और टिप्रा मोथा पार्टी के संस्थापक प्रद्युत बिक्रम मणिक्या देबबर्मा ने 5 अक्टूबर को कोकराझार में मीडिया से बातचीत के दौरान दिए गए एक बयान में बांग्लादेश के साथ ‘मजबूत’ न होने की वकालत करते हुए कहा, “बांग्लादेश को तोड़ो और चिट्टागाँव वापस लो। अगर हम उन्हें कड़ा जवाब नहीं देंगे तो वे हमें हल्के में लेंगे।” यह टिप्पणी नागरिक और राजनीतिक विमर्श के रेखापट पर तेज बहस पैदा कर रही है।

मुख्य बिंदु

देबबर्मा ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए बांग्लादेश के साथ दोस्ताना व्यवहार का कोई लाभ नहीं है और उन्होंने चिट्टागाँव हिल पोर्ट पर नियंत्रण की बात कही।

वे इस बात से भी चिंतित दिखे कि असम की स्थानीय पहचान, भाषा और भूमि पर वोटबैंक राजनीति के कारण बड़ा खतरा है; उन्होंने भविष्यवाणी की कि अगले 10-15 वर्षों में असम का मुख्यमंत्री एक ‘बांग्लादेशी’ हो सकता है।

देबबर्मा ने असमियों में राजनीतिक एकजुटता की कमी को इसकी जड़ बताया और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा, पहचान व सांस्कृतिक संरक्षण को राजनीतिक दलों से ऊपर रखने का आह्वान किया।

बयान का संदर्भ और आशय

प्रद्युत देबबर्मा का यह बयान कोकराझार में BTC (बर्धमान टिबेट लोक परिषद या स्थानीय प्रशासन — लेख के संदर्भ के अनुसार) की शपथ ग्रहण सभा के मौके पर आया। उन्होंने कहा कि “हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में है — क्रिकेट खेलने से क्या फायदा जब हमारी सीमाएँ असुरक्षित हैं। चिट्टागाँव हिल पोर्ट पर नियंत्रण लेकर वहां से चल रहे एंटी-इंडियन तत्वों को रोकना चाहिए। अगर हम उन्हें कड़ा जवाब नहीं देंगे तो वे हमें हल्के में लेंगे। बातचीत की कोई जरूरत नहीं है।” यह शब्दांकन स्पष्ट रूप से तीखा और आक्रामक था और इससे हिन्दु-न्युकरण और सीमाओं से जुड़ी संवेदनशील राजनीतिक भावनाएँ उभरकर आई हैं।

आइडेंटिटी और वोटबैंक राजनीति पर चिंता

देबबर्मा ने असम की आंतरिक राजनीति पर भी गम्भीर टिप्पणियाँ कीं। उनका कहना था कि वोटबैंक राजनीति ने असम की पहचान और भूमि को नुकसान पहुँचाया है और इसी कारण अगले 10-15 वर्षों में असम का मुख्यमंत्री ‘नॉन-लोकल’ या ‘नॉन-असामी भाषी’ होने की आशंका है। वे यह संदेश दे रहे थे कि किसी भी राजनीतिक दल (बीजेपी, कांग्रेस, एजीपी आदि) से पहले स्थानीय समुदायों की पहचान, सांस्कृतिक और भाषाई सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्होंने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, केंद्रीय मंत्री सरबानंद सोनोवाल और असम कांग्रेस प्रमुख गौरव गोगोई से भी इस विषय पर बातचीत की है और उनसे समुदाय की रक्षा के लिए कार्रवाई की उम्मीद जताई है।

संदेश की राजनीतिक और संवैधानिक संवेदनशीलता

देबबर्मा जैसे राजनीतिक व्यक्तित्व द्वारा की गई ऐसे आक्रामक, क्षेत्रीय दावे और बयान पर राजनीतिक, कूटनीतिक और संवैधानिक स्तर पर गंभीर विचार आवश्यक हैं। किसी भी प्रकार की सीमागत दावेदारी या हिंसक भाषा पड़ोसी देश के साथ द्विपक्षीय सम्बन्धों को झटका देती है और क्षेत्रीय शांति व सुरक्षा के लिए परिलक्षित जोखिम बढ़ाती है। साथ ही ऐसे वक्तव्य स्थानीय स्तर पर सामुदायिक तनाव और धर्म/जाति-आधारित विभाजन को भी बढ़ा सकते हैं। इसलिए मीडिया रिपोर्टिंग और राजनीतिक बहस में यह बात स्पष्ट रूप से रखनी चाहिए कि अलोकतांत्रिक या हिंसक आह्वान संवैधानिक रूप से संभव और वैध सीमाओं के दायरे में नहीं आते। (प्रासंगिक विश्लेषण — स्रोत का वर्णन)

समाज और नेतृत्व के लिए चुनौतियाँ

देबबर्मा ने असमियों में एकजुटता की कमी को समस्या बताया — “पार्टी लाइन के नाम पर असमिया समाज में एकता नहीं है।” उनका तर्क है कि छोटी-छोटी राजनीतिक प्राथमिकताओं और भागीदारी ने सामूहिक हितों को पीछे छोड़ दिया, जिसके कारण भूमि, भाषा और सांस्कृतिक पहचान का क्षरण हुआ है। उनका आह्वान यह था कि पहले अपनी समुदायिक सुरक्षा और पहचान को बचाइये, फिर पार्टी व राजनीति का विकल्प अपनाइए — वरना जमीन व पहचान खो दी जाएगी ।

 संतुलित नज़रिए  की आवश्यकता

प्रद्युत देबबर्मा के बयानों ने सीमाओं, पहचान और राजनीतिक नेतृत्व पर तीखी बहस छेड़ दी है। ये बयान एक तरफ़ स्थानीय असमिया भय और असंतोष को प्रतिबिंबित करते हैं, तो दूसरी ओर ये अंतरराष्ट्रीय संबंधों और घरेलू संवैधानिक सीमाओं के प्रश्न भी उठाते हैं। रिपोर्टिंग और सार्वजनिक बहस में यह ज़रूरी रहेगा कि इन बयानों को तथ्यात्मक रूप में उजागर किया जाए, मगर किसी प्रकार की हिंसा या क्षेत्रों के जब्ती के प्रचार-प्रसार का पक्ष न लिया जाए। लोकतांत्रिक विमर्श का तरीका संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए — न कि कूटनीतिक तनाव या सैन्य आह्वान से।

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