अखिलेश यादव : लोकतांत्रिक संस्थाओं को संदेह के घेरे में घेरने की सियासत

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पूनम शर्मा
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि क्या विपक्षी नेताओं की बयानबाजी केवल चुनावी रणनीति है या फिर यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख को कमजोर करने का सुनियोजित प्रयास? हाल ही में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा दिया गया बयान इसी बहस को हवा दे रहा है। उन्होंने दावा किया कि पंचायत चुनावों में लगभग 18 हजार से अधिक शपथ पत्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से फर्जी तरीके से तैयार किए गए। यह आरोप सीधे तौर पर निर्वाचन आयोग और प्रशासनिक मशीनरी पर अविश्वास का प्रतीक है।

लेकिन जब उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा ने तथ्यों के आधार पर इसे खारिज किया, तब सवाल यह उठा कि आखिर अखिलेश यादव के इन बयानों के पीछे मंशा क्या है?

संस्थाओं पर बार-बार हमले की राजनीति

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत इसकी संस्थाएं मानी जाती हैं। चाहे वह चुनाव आयोग हो, न्यायपालिका हो या संवैधानिक निकाय—इनकी निष्पक्षता पर भरोसा ही जनता को व्यवस्था से जोड़े रखता है। ऐसे में जब कोई बड़ा राजनीतिक नेता इन पर बेबुनियाद आरोप लगाता है, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में संदेह गहराने लगता है।

अखिलेश यादव इससे पहले भी कई मौकों पर चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठा चुके हैं। कभी EVM पर अविश्वास जताते हैं तो कभी मतगणना प्रक्रिया में हेरफेर की बात करते हैं। अब AI और फर्जी शपथ पत्रों का नया मुद्दा खड़ा कर उन्होंने एक बार फिर संस्थाओं को शक की नजर से देखने की परंपरा को आगे बढ़ाया है।

लोकतंत्र की नींव पर चोट

यह समझना जरूरी है कि चुनाव आयोग पर लगाए गए हर आरोप का असर केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह लोकतंत्र की बुनियादी संरचना पर सीधा आघात करता है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब जनता संस्थाओं पर विश्वास करे।

यदि बार-बार राजनीतिक दल जनता के मन में यह धारणा बैठा दें कि “संस्थाएं बिक चुकी हैं, चुनाव निष्पक्ष नहीं होते”, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होने लगती है। इसका सीधा फायदा उन ताकतों को मिलता है जो लोकतंत्र को कमजोर करना चाहती हैं।

क्या यह केवल चुनावी रणनीति है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव के इस बयान को केवल भावनात्मक रणनीति के तौर पर देखा जाना चाहिए। चुनावी मौसम नजदीक है और विपक्ष जनता में यह संदेश फैलाना चाहता है कि सत्ता पक्ष प्रशासन और चुनावी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर रहा है।

इस तरह की राजनीति अल्पकालिक रूप से पार्टी समर्थकों को उत्साहित कर सकती है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। क्योंकि एक बार यदि जनता संस्थाओं से भरोसा खो दे, तो उसे वापस पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

सत्तापक्ष का पलटवार

भारतीय जनता पार्टी ने अखिलेश यादव के आरोपों को चुनावी स्टंट करार दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जब भी विपक्षी दल हार की आशंका देखते हैं, तो वे चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर सवाल उठाना शुरू कर देते हैं।

बीजेपी प्रवक्ताओं का कहना है कि अखिलेश यादव को यदि सचमुच कोई गड़बड़ी मिली है तो उसे सबूतों के साथ सामने लाना चाहिए। बिना प्रमाण के केवल सनसनीखेज दावे करना जनता को गुमराह करने जैसा है।

जनता की धारणा पर असर

आज का मतदाता केवल नेताओं की बयानबाजी से प्रभावित नहीं होता, बल्कि वह सोशल मीडिया और अन्य स्रोतों से तथ्यों को भी जांचता है। यही वजह है कि अखिलेश यादव के 18 हजार वाले दावे पर आम लोग सबूत मांग रहे हैं। निर्वाचन अधिकारी की सफाई के बाद जनता में यह संदेश गया है कि आरोप निराधार थे।

लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि बार-बार ऐसे आरोप लगने से संस्थाओं की साख पर धूल जरूर जमती है। चाहे वह गलतफहमी के कारण हो या राजनीतिक स्वार्थ के चलते—परिणाम अंततः लोकतंत्र को ही कमजोर करते हैं।

लोकतंत्र का भविष्य और जिम्मेदारी

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में यह बेहद जरूरी है कि सभी राजनीतिक दल संस्थाओं पर भरोसा करें और जनता को भी भरोसा दिलाएं। आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन आलोचना तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए, न कि कल्पना और प्रचार पर।

अखिलेश यादव जैसे वरिष्ठ नेता यदि बेबुनियाद आरोप लगाते हैं तो इससे न केवल उनकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है, बल्कि वे उन संस्थाओं को भी कमजोर करते हैं, जो हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा करती हैं।

निष्कर्ष

अखिलेश यादव का यह ताज़ा बयान लोकतांत्रिक संस्थाओं पर संदेह की राजनीति का नया अध्याय है। यह केवल सत्ता पक्ष को घेरने की कोशिश नहीं, बल्कि उस भरोसे को भी चोट पहुंचाता है, जिस पर भारतीय लोकतंत्र खड़ा है।

विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली पर कठोर सवाल पूछे, लेकिन संस्थाओं की निष्पक्षता पर बार-बार हमला करना लोकतंत्र को खोखला करता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी राजनीतिक दल समझें कि संस्थाओं की साख व्यक्तिगत या दलगत राजनीति से कहीं अधिक बड़ी है। यदि जनता संस्थाओं पर से विश्वास खो देगी, तो लोकतंत्र केवल एक ढांचा बनकर रह जाएगा।

कुल मिलाकर, अखिलेश यादव के बयानों से यह स्पष्ट है कि सियासी फायदे के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं को संदेह और अविश्वास के घेरे में खड़ा किया जा रहा है—जो न केवल खतरनाक है बल्कि लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ भी।

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