मलबे तले महिलाएँ : तालिबानी कानूनों से कुचलती इंसानियत

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पूनम शर्मा
पूर्वी अफगानिस्तान की पहाड़ियों में आए 6 तीव्रता के भूकंप ने चारों ओर तबाही मचा दी। अब तक 2200 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और 3600 से ज्यादा घायल बताए जा रहे हैं। लेकिन इस प्राकृतिक आपदा का सबसे भयावह और अमानवीय चेहरा महिलाओं की त्रासदी है—वे महिलाएँ, जिनकी ज़िंदगी न सिर्फ़ पत्थरों के मलबे में दब गई, बल्कि तालिबानी कानूनों और पितृसत्तात्मक सोच की बेड़ियों ने भी उन्हें मौत से बदतर खामोशी में कैद कर दिया।

बचाव दल पहुँचे, औरतें ग़ायब

भूकंप के तुरंत बाद राहत और बचाव कार्य शुरू हुआ। पुरुषों और बच्चों को प्राथमिकता मिली, लेकिन महिलाएँ कतार में सबसे पीछे धकेल दी गईं। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट ने यह सच्चाई उजागर की कि महिलाएँ ज़िंदा थीं, मदद माँग रही थीं, लेकिन “नो स्किन कॉन्टैक्ट” यानी पुरुषों द्वारा महिलाओं को छूने पर तालिबानी पाबंदी ने उनका जीवन छीन लिया। कई घायल महिलाओं को जानबूझकर अनदेखा कर दिया गया और मृत महिलाओं को कपड़ों से खींचकर बाहर निकाला गया, ताकि उनका शरीर छूना न पड़े।

33 वर्षीय स्वयंसेवक ताहज़ीबुल्लाह मुहाज़ेब ने कहा—
“ऐसा लग रहा था मानो महिलाएँ इस समाज में मौजूद ही न हों। पुरुषों का इलाज तुरंत हुआ, जबकि महिलाएँ खून बहाती रहीं और किसी ने परवाह तक नहीं की।”

रीति-रिवाज बनाम इंसानियत

यह कोई आकस्मिक लापरवाही नहीं थी, बल्कि सदियों से जड़ जमाए सामाजिक रवैये और तालिबानी शासन की कठोर नीतियों का नतीजा है। इंसानियत की जगह यहाँ पितृसत्ता हावी है। धर्म और रीति-रिवाजों के नाम पर महिलाओं को इतना पिछड़ा दिया गया है कि उनका अस्तित्व ही “अदृश्य” हो गया है।

तालिबान के चार साल के शासन ने महिला को हर स्तर पर कैद कर दिया है—

छठी कक्षा के बाद शिक्षा पर रोक

बिना पुरुष अभिभावक के यात्रा पर रोक

अधिकांश नौकरियों से प्रतिबंध

संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में काम करने वाली अफ़ग़ान महिला कर्मचारियों तक पर धमकियाँ

इन बंदिशों का सीधा असर राहत कार्यों पर पड़ा है। जब महिलाएँ डॉक्टरी, नर्सिंग या राहत संगठनों में काम ही नहीं कर सकतीं, तो आपदा की घड़ी में उनका बचाव कौन करेगा?

मौत से भी गहरी खामोशी

भूकंप में दबे पत्थरों का दर्द एक तरफ़ था, लेकिन उनका  असली दर्द वह खामोशी थी, जिसमें उनकी चीखें दबा दी गईं। जब मददगार हाथ पाबंदियों की जंजीरों में जकड़े हों, तब उम्मीद भी मर जाती है। यह स्थिति मौत से भी डरावनी है—क्योंकि यहाँ न इंसानियत की गर्माहट है, न करुणा, न बराबरी का हक़।

तालिबान का झूठा वादा

2021 में सत्ता में लौटते समय तालिबान ने दावा किया था कि वे पुराने तालिबान से अलग होंगे—“नरम और आधुनिक।” लेकिन सच्चाई यह है कि शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक स्वतंत्रता, हर स्तर पर महिलाओं को और भी अधिक दमन झेलना पड़ा। भूकंप ने इस झूठ को पूरी तरह उजागर कर दिया।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ज़िम्मेदारी

आज दुनिया भर से राहत सामग्री अफगानिस्तान पहुँच रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या महिलाएँ उस राहत तक पहुँच पाएँगी? जब तक स्थानीय स्तर पर औरतों को राहत कार्यों और निर्णय प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जाएगा, यह मदद अधूरी ही रहेगी। अंतरराष्ट्रीय संगठन और संयुक्त राष्ट्र को यह सुनिश्चित करना होगा कि अफगान महिलाओं के लिए न सिर्फ़ राहत पहुँचे बल्कि उन्हें इज़्ज़त और सुरक्षा भी मिले।

मानवीय त्रासदी का आईना

भूकंप जैसी आपदाएँ किसी समाज का असली चेहरा दिखाती हैं। अफगानिस्तान का यह हादसा बता रहा है कि महिलाएँ केवल प्राकृतिक आपदाओं की शिकार नहीं हैं, बल्कि वे तालिबानी नियमों और सामंती सोच की जकड़न में भी रोज़ाना मर रही हैं। मलबे से दबा हर पत्थर उन अदृश्य महिलाओं की चीखों का प्रतीक है, जिन्हें तालिबानी कानूनों ने इंसानियत से बाहर कर दिया है।

निष्कर्ष

अफगानिस्तान का यह भूकंप एक चेतावनी है—यह केवल भूगोल की नहीं, बल्कि समाज की दरारों की त्रासदी है। दुनिया अगर इसे सिर्फ़ प्राकृतिक आपदा मानेगी, तो यह औरतों की सच्चाई से मुँह मोड़ना होगा। सवाल यह है कि क्या हम धर्म और रीति-रिवाज के नाम पर महिलाओं की जान यूँ ही कुर्बान होते देखते रहेंगे?

अब समय आ गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय तालिबान की अमानवीय नीतियों को खुलकर चुनौती दे और उन अफगान महिलाओं की आवाज़ बने, जिनकी ज़िंदगी तालिबानी पाबंदियों की जेल में कैद है। क्योंकि जब औरतें इंसानियत से बाहर कर दी जाती हैं, तब पूरी मानवता शर्मसार होती है।

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